काफ़ी सारी काम की जानकारियाँ जो साइटमीटर उपलब्ध करवाता है, उनमें से एक है आपके ब्लॉग पर आने वाले ट्रैफिक का ब्राउजर उपयोग. हमने पाया कि इस ब्लॉग पर आने वाले ६०% लोग इंटरनेट एक्सप्लोरर का प्रयोग कर रहे हैं. और भी ज्यादा अचरज यह देखकर हुआ कि ४१% लोग अभी भी तकनीकी रूप से अति दुर्बल IE-६ या उससे भी पुराने वर्जन पर टिके हैं.दुनिया भर में वेब ब्राउजर्स का मार्केट शेयर देखें तो इंटरनेट एक्स्प्लोरर का साम्राज्य पहले की तुलना में भले ही कमजोर हुआ हो पर अभी भी लगभग पैसठ प्रतिशत के साथ निर्विवाद रूप से कायम है. दूसरे नंबर पर फायरफॉक्स लगभग बीस प्रतिशत के साथ काफी पीछे है. बाकी पन्द्रह प्रतिशत में अन्य सभी सिमट जाते हैं.
मुझे थोड़ा आश्चर्य होता है. बेहतरीन फीचर्स के साथ जब आधुनिक ब्राउजर्स मुफ्त में उपलब्ध हैं तो लोग इनका उपयोग क्यों नहीं करते? शायद लंबे समय से किसी एक सॉफ्टवेयर से काम लेते-लेते एक खास किस्म की एफिनिटी जुड़ जाती है. नए इंटरफेस को समझने की कवायद मुश्किल जान पड़ती है. और काम तो चल ही रहा है तो क्यों झंझट में पड़ा जाए?
सन् २००० में जब हमने अपना पहला ई मेल आई डी बनाया था तब दो ही मुख्य ब्राउजर मैदान में होते थे. एक इंटरनेट एक्स्प्लोरर जो कि विंडोज के साथ प्री इंस्टाल्ड आता था और दूसरा नेट्स्केप नेविगेटर जो कमजोर प्रतिद्वंदी था और धीरे-धीरे पिछड़ता चला गया. IE का एकछत्र राज्य हो गया. जल्दी ही कई सारी परेशानियाँ भी सामने आने लगीं. सबसे बड़ी दिक्कत थी पॉप-अप विंडोस की जो बिना इजाजत टप्प से खुलकर विज्ञापन परोसने लगती थीं. फिर IE के सुरक्षा प्रबंधों की खामियों की रिपोर्ट्स आने लगी. कई सारे सिक्योरिटी होल्स की वजह से ये हैकर्स का आसान निशाना था. (अब भी है.)
फ़िर एक दिन (शायद २००२ में) पता चला नेट-केप्टर के बारे में. यह एक शानदार ब्राउजर था जो कि काम तो मूल रूप से IE के ही प्लेटफॉर्म पर करता था पर यूजर को एक नए खूबसूरत इंटरफेस के अलावा कई नए फीचर्स देता था. पॉप-अप ब्लॉकर के साथ साथ पहली बार टैब्ड ब्राउजिंग की सुविधा भी इसमें पायी. (टैब्ड ब्राउजिंग जैसी चीज को अपनाने में IE को और कई साल लगे और वर्जन ७ में जाकर वो इसे दे पाए हैं.) तुंरत ही नेट-केप्टर हमारा मनपसंद ब्राउजर बन गया.
कई और अच्छे ब्राउजर उसके बाद आए - अवंत ब्राउजर, एडवांस्ड ब्राउजर आदि, पर अगला पड़ाव जिस पर हम रुके वो था MyIE. बाद में इसका नया वर्जन MyIE 2 नाम से आया और अंततः इसका नाम हो गया मैक्सथन. ये भी एक जबरदस्त ब्राउजर है.
पर IE के लिए अगर कोई चुनौती बन कर आया तो वो है फायरफॉक्स. साथ ही ऑपेरा ने भी अपनी आमद दर्ज कराई. नेट्स्केप नेविगेटर भी बाजार में बना हुआ है. इसके अलावा एक ब्राउजर जो हमें पसंद आया वो है सफारी. पर इन सबके बीच जो पहली पसंद बन गया है वो है ऑपेरा.
अगर फीचर्स की तुलना करें तो सभी ब्राउजर्स लगभग समान रूप से सशक्त हैं. फायरफॉक्स और ऑपेरा के नए वर्जन्स (क्रमशः ३ और ९.५) इस वर्ष कुछ ही दिनों के अन्तराल पर जारी हुए हैं और कई सारी साइट्स पर इनकी तुलनात्मक विवेचना तकनीकी दृष्टिकोण से देखने को मिल सकती है. पर हम यहाँ बात करेंगे कि ऑपेरा हमें ज्यादा पसंद किन कारणों से है. आइये देखते हैं.
एक बात स्पष्ट कर दूं कि यहाँ मेरा उद्देश्य ऑपेरा की किसी एक अन्य ब्राउजर से तुलना करना नहीं है बल्कि उन फीचर्स की चर्चा करना है जिनके कारण यह मेरा पसंदीदा ब्राउजर है.
१. स्पीड डायल: ऑपेरा के मुख्य पृष्ठ पर नौ थम्बनेल आइकोंस एक तरह से तस्वीर वाले बुक-मार्क्स की तरह हैं. इन पर क्लिक करके आप किसी भी वेब-पेज को सिर्फ़ एक क्लिक से खोल सकते हैं. यह कई मायनों में सामान्य बुकमार्क्स से ज्यादा सुविधाजनक होता है.

२. तस्वीरों का प्रदर्शन डिसेबल करना: विंडो में नीचे की ओर दिए बटन पर क्लिक करके आप अपने ब्राउजर को टेक्स्ट ओनली मोड़ में ले जा सकते हैं. तस्वीरों के डाऊनलोड को डिसेबल करके आप न सिर्फ़ समय की बचत कर सकते हैं बल्कि डाऊनलोड होने वाले डाटा के अमाउंट की भी. इसी में एक बढ़िया चीज है केवल केश्ड इमेजेस को दिखाने का विकल्प. यानी अगर आपने एक बार पेज को तस्वीरों के साथ लोड होने दिया तो पेज की तस्वीरें केश मेमोरी में सेव हो जाती हैं. फिर अगली बार उसी पेज को खोलने पर बिना दुबारा तस्वीरों को इंटरनेट से डाऊनलोड किए पहले की तरह ही प्रदर्शित किया जा सकता है, (यदि इस बीच आपने अपनी केश मेमोरी साफ़ नहीं की हो तो.)
इसकी तुलना में अगर फायरफॉक्स में किसी पेज को कुछ समय अंतराल से दुबारा लोड करना हो तो सभी चित्र दुबारा इंटरनेट से डाऊनलोड होते हैं जो ज्यादा समय भी लेता है और खामखाह डाटा डाऊनलोड भी बढ़ता है.हमने अपने ब्राउजर में डिफौल्ट सेटिंग में केश्ड इमेजेस का ऑप्शन सेलेक्ट किया हुआ है. (Tools >> Preferences... >> Web Pages >> Images {select cached images}) अगर किसी पेज पर देखने लायक तस्वीर हो तो मुख्य पृष्ठ पर दिए इस बटन पर क्लिक करके तुंरत तस्वीरें प्रदर्शित कर लेते हैं.
३. डिसेबल फ्लैश एनिमेशन: अधिकांश वेब पेजेस पर अब विज्ञापन फ्लैश फाइल्स के रूप में दिखाए जाते हैं. इन की तुलना टीवी के विज्ञापनों से की जा सकती है जिन्हें देखने के लिए आप समय भी खोटा करते हैं और ऊपर से जेब भी ढीली करते हैं. ऑपेरा में इन फ्लैश फाइल्स का डाऊनलोड बड़ी आसानी से रोका जा सकता है. कैसे?
Tools >> Quick Preferences >> Enable Plug-ins
ये बहुत कमाल का ऑप्शन है. काफ़ी सारा व्यर्थ का डाटा डाऊनलोड बचाता है, पेज लोडिंग को तीव्र करता है और डिसेबल/इनेबल करना भी बहुत आसान है.

४. अन्तःनिर्मित फीडरीडर: ऑपेरा का अपना ख़ुद का फीडरीडर है जिसमें आप अपने पसंदीदा ब्लॉग्स पर आने वाली नयी प्रविष्टी को सीधे पढ़ सकते हैं. अलग से कोई रीडर इंस्टाल करने की आवश्यकता नहीं.


५. माउस जेस्चर्स: एक समय था जब कि माउस में सिर्फ़ दो बटन हुआ करते थे. पेजेस को ऊपर नीचे करने के लिए स्क्रोलबार को घसीटना पड़ता था. फिर तीसरा बटन आया जो बाद में व्हील में बदल गया. अब पेज को स्क्रोल करने के लिए सिर्फ़ व्हील को घुमाना होता है. ये एक आदत लगाने वाली चीज है. एक बार व्हील माउस का उपयोग कर लेने के बाद आप शर्तिया उसके बिना काम नहीं कर सकते.
कुछ ऐसा ही कैची है ऑपेरा का माउस जेस्चर्स को रिकग्नाइज करने वाला फीचर. कई सारे छोटे छोटे काम जैसे नया टेब खोलना, पिछले या अगले पेज पर जाना आदि सिर्फ़ माउस से किए जा सकते हैं. उदाहरण के तौर पर पिछले पेज पर वापस जाने के लिए राइट बटन को (पेज पर कहीं भी) होल्ड करके माउस को थोड़ा सा पीछे की ओर घसीटना होता है. अगर फिर अगले पेज पर जाना हो तो राइट बटन को होल्ड करके माउस थोड़ा सा दायीं ओर घसीटना होगा.
इसकी इतनी आदत पड़ जाती है कि विंडोज के एक्स्प्लोरर में भी कभी कभी गलती से ऐसा करने की कोशिश कर बैठते हैं.
६. डाउनलोड मेनेजर: बेहतरीन काम करता है. एक साथ कई फाइल्स को डाउनलोड करना हो या किसी फाइल का डाउनलोड बीच में टूटने पर पुनः प्रारम्भ करना हो सारी सुविधाएँ मौजूद हैं. अगर सर्वर इजाजत देता हो तो डाउनलोड को बीच में पॉज भी कर सकते हैं और बचा हुआ डाटा बाद में कभी डाउनलोड कर सकते हैं.
इनके अलावा और भी कई खूबियाँ हैं जैसे कि टूलबार में हिन्दी को सपोर्ट करना (संजय बेंगाणी जी बता चुके हैं कि फायर फॉक्स यहाँ निठल्ला है), कम मेमोरी खाना, शीघ्र प्रारम्भ होना (अन्य की तुलना में), वेंड पासवर्ड मेनेजर आदि आदि.
और कुछ खामियां
लेकिन जहाँ इतनी अच्छाइयां हैं वहीं कुछ कमियों का होना भी लाजमी है. इनका जिक्र किए बिना बात पूरी नहीं होगी. सबसे बड़ी दिक्कत है कि गूगल ट्रांसलिटरेशन ऑपेरा पर काम नहीं करता. इसलिए हिन्दी में लिखने के लिए फायरफॉक्स की जरूरत बनी रहेगी जब तक कि इन्स्क्रिप्ट टाइपिंग में हाथ पूरी तरह सध नहीं जाता.
एक और परेशानी कभी कभी देखने में आती है. ब्लॉगर डॉट कॉम ने यह सुविधा दे दी है कि कमेन्ट की फील्ड को पोस्ट पेज पर ही प्रदर्शित किया जा सकता है. कई ब्लॉगर्स ने इसका उपयोग करते हुए ऐसा कर भी लिया है. हमारा अनुभव है कि कुछ ब्लॉग्स पर ऑपेरा से कमेन्ट करने में दिक्कत आ रही है. इस फील्ड में कमेन्ट करने से पहले एक आई डी को चुनना पड़ता है. पर ऑपेरा में ड्राप डाउन लिस्ट के ऑप्शन दिखते ही नहीं हैं. ऐसा सभी ब्लॉग्स पर नहीं होता पर कहीं कहीं होता है. उदाहरण के तौर पर ज्ञानदत्त जी के ब्लॉग पर यह परेशानी है मगर अजित वडनेरकर जी के यहाँ मामला टनाटन है. रवि रतलामी जी के एक ब्लॉग पर गड़बड़ है तो बाकी पर चकाचक. कारण-वारण अपन नहीं जानते पर कमेन्ट करना हो तो फिर फायरफॉक्स की शरण में जाना होता है.
