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Wednesday, September 10, 2008

अनुराग अन्वेषी जी का बेसुरा(ग) अन्वेषण

अपडेट: १० सितम्बर २००८, ०१:१५ दोपहर बाद

तेजी से बदलते घटनाक्रम में दो नयी घटनाएँ जुड़ गयी हैं. पहली तो ये कि कुछ नाटकीय टिप्पणियों के माध्यम से अनुराग अन्वेषी जी ने अपने दिमागी संतुलन के खो जाने की ओर इशारा किया है. इन्होने कहा है कि घोस्ट बस्टर के नाम से दरअसल श्री ज्ञानदत्त पाण्डेय जी लिख रहे हैं. नीचे इनकी टिप्पणियां देखिये और इनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना कीजिये. कुछ ऐसी ही टिप्पणी ये रख्शंदा जी के ब्लॉग पर भी लिख आए हैं.

दूसरी बात यही है कि रख्शंदा जी के ब्लॉग पर अनाम टिप्पणियां (जिनका जिक्र पिछले अपडेट में किया गया है) देने वाले यही अनुराग अन्वेषी जी हैं, इसका पर्दाफाश हो गया है. अपनी नयी टिप्पणी में कोई भी तर्क और मेरे किसी भी सवाल का जवाब देने में ये पूरी तरह विफल रहे हैं. पर इसके बावजूद इनकी भाषा देखिये और प्रिंट मीडिया के गिरते स्तर पर एक बार फ़िर अफ़सोस कीजिये. वहां भी ये ज्ञानदत्त जी की ओर साफ़ इशारा कर रहे हैं.

इनकी तर्क क्षमता देखिये. इन्होने फ़रमाया कि अमर उजाला में २००७ में भड़ास पर कई लेख छपे थे. जब इन लेखों के लिंक मांगे तो क्या कह रहे हैं:
"इन्हें इतना टाइम हैं तो भड़ास पर जा के ढुंढ लें जानकारी की कब कब छपी है नहिं तो अपने दोस्त यशवंत जी से पूछ लें"
जब आप किसी बात की जानकारी दे रहे हैं तो सबूत देना तो आपकी जिम्मेदारी बनती है अनुराग जी, न कि ये पाठक का काम हुआ कि वो लिंक ढूंढता बैठे. चलिए फ़िर भी मैंने भड़ास को अच्छी तरह सर्च किया और मुझे ऐसी कोई भी पोस्ट २००७ की पोस्ट्स में नहीं मिली. अगर कोई ढूंढ कर बता सके तो मैं आभारी रहूँगा.

अब मैं पूछता हूँ. जब मैंने रख्शंदा की आईडी पर शंका जताई (बाकायदा कारण बताते हुए) तो मुझे इतना जलील किया गया. (डॉ. अमर कुमार जी और दिनेशराय द्विवेदी जी की टिप्पणियां देखी जा सकती हैं). आज अनुराग अन्वेषी, ज्ञानदत्त जी जैसे वरिष्ठ और सम्माननीय ब्लॉगर पर खुले आम बिना किसी तर्क के ये घिनौना आरोप लगा रहे हैं तो क्या इनकी भी ख़बर लेने वाला कोई है? या ब्लॉग जगत केवल धिम्मियों की बस्ती बनकर रह गया है?

मैं बिना तर्क के कोई बात नहीं करता. तो अंत में इस बात का भी सबूत पेश कर दूँ कि रख्शंदा जी के अनाम शुभचिंतक टिप्पणीकार अनुराग अन्वेषी जी ही हैं. जरा मेरे ब्लॉग पर अनुराग जी की इस टिप्पणी को देखें, और रख्शंदा जी के ब्लॉग पर इस अनाम टिप्पणी को. एक ही भाषा, एक ही संगीन आरोप और टिप्पणी पोस्ट करने का समय. ११:३४ AM IST वहां और ११:३५ AM IST यहाँ.

है कोई दिमाग से सोचने वाला?

अपडेट: १० सितम्बर २००८, १०:३० प्रातः

एक और काबिले गौर घटनाक्रम कल से घट रहा है. कोई जनाब बार-बार रक्षंदा के ब्लौग पर कमेंट्स में उन्हें ज्यादा जवाब न देने की नसीहत दे रहे हैं. ये कहकर कि आपसे कोई स्पष्टीकरण नहीं माँगा जा रहा है, बस चुप रहिये. ये बहुत समझदारी की सलाह है. क्योंकि जितना ज्यादा अपने बारे में सफाई दी जायेगी, शक की वजहें उतनी ही ज्यादा बढ़ती जायेंगी. अनजाने में कोई न कोई संदेहास्पद बात आपसे निकल जाने का डर बना रहता है.

कमाल की बात तो ये है कि इस संकट की घड़ी में एक (घोषित रूप में) महिला का साथ देने का पुनीत कर्तव्य निभाने वाले ये सज्जन अपनी ख़ुद की पहचान छुपाकर अनाम कमेन्ट कर रहे हैं. भाई हमारे जैसे दुष्टों का तो समझ में आता है, पर आपके जैसे शरीफ लोग भला क्यों अपने नाम से सामने आकर बात नहीं करते? क्या घोटाला है? इस पूरी कॉन्सपिरेसी में कहीं आप भी तो शामिल नहीं?

एक और मूर्खतापूर्ण तर्क से इन्होंने ब्लॉग जगत को बरगलाने की चेष्टा की है. जब रख्शंदा ने ख़ुद साफ़-साफ़ कहा है कि अमर उजाला के रविवार के परिशिष्ट में पढ़कर उन्होंने भड़ास के बारे में जाना, (रविवारीय परिशिष्ट ०२ मार्च २००८ का है) तो फ़िर पहले छपे किसी और लेख का हवाला क्यों दिया जा रहा है? लोगों को कनफ्यूस करने के लिए ही ना. और ये किस लेख की बात की रही है? यह कब छपा था? जरा विस्तार से बताइए. कोई लिंक विंक दीजिये. अगर भड़ास के बारे में अमर उजाला में इतने लेख छपते रहे तो जरूर भड़ास पर भी इसकी चर्चा जोर शोर से अवश्य हुई होगी. जरा उसका लिंक भड़ास के ही ब्लॉग से दे दीजिये जैसे मैंने दिया है.

और चलिए आपकी इस बात पर एक बार यकीन कर भी लिया जाए कि नवम्बर २००७ में कोई लेख छपा भी था तो जनाब नवम्बर तो अक्टूबर के बाद ही आता है ना. रख्शंदा की आईडी तो अक्टूबर २००७ की है. अगर अक्टूबर २००७ या उससे पहले के भड़ास के बारे में अमर उजाला के लेख की कोई लिंक हो तो बताइए. हम भी जानें क्या लिखा था उस लेख में जो रख्शंदा जी भड़ास की ओर आकर्षित हुईं. जानकारी लेकर आइये साहब. ब्लॉग जगत इन्तजार में है. और अपने नाम के साथ आयेंगे तो और भी बेहतर होगा.

अनुराग जी, पिछली पोस्ट पर आपकी टिप्पणी का शुक्रिया. सचमुच बड़ा मजेदार रहा आपका कमेन्ट पढ़ना. ये देखना भी अच्छा लगा कि चलिए किसी ने तो कोरी भावनाओं में ना बहकर दिमाग से काम लेने की कोशिश की. लेकिन अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि कुल मिलाकर आपके ब्लॉगिंग सम्बंधित तकनीकी ज्ञान ने बहुत प्रभावित नहीं किया.

आप लिखते हैं:
"रख्शंदाजी के प्रफाइल को मैं झांकने गया। वहां मेंशन कि यह ब्लॉग अक्टूबर 2007 में क्रिएट किया गया है। गौर करें कि क्रिएशन का यह समय है ब्लॉगर वहां फीड नहीं करता, बल्कि जब आप ब्लॉग क्रिएट करते हैं तो यह सूचना खुद-ब-खुद वहां आ जाती है। यह अलग बात है कि अक्टूबर में क्रिएट करने के बाद रख्शंदाजी की पहली पोस्ट 7 मार्च 2008 को आई। यह भी देखना रोचक होगा कि इनकी शुरुआती पोस्ट पर टिप्पणियां या तो नहीं है या उनकी संख्या बेहद कम हैं."
बड़ा समय और शक्ति खर्च किए आपने इस अन्वेषण में. लेकिन आपके इस समूचे वक्तव्य से आख़िर निष्कर्ष क्या निकलता है? ये आईडी अक्टूबर २००७ में बनाई गई पर रक्षंदा नाम से इसके इस्तेमाल की जरूरत मार्च २००८ में पडी. बस इतनी बात. इससे क्या साबित होता है? आप को तो पता ही होगा कि आईडी का नाम कभी भी बदला जा सकता है. यह पूरी तरह सम्भव है कि अक्टूबर २००७ मैं इस आईडी को किसी और नाम से बनाया गया हो और मार्च २००८ में इस नाम से बदल दिया गया हो. (मैं सिर्फ़ संभावनाओं की बात कर रहा हूँ, यह नहीं कह रहा कि ऐसा वास्तव में हुआ ही होगा) लेकिन आपका तर्क तो औंधे मुंह गिरता ही है.

अन्वेषी जी, अब जरा रक्षंदा आईडी से आए आज के इस कमेन्ट का भी (खुले दिमाग से) कुछ विश्लेषण कीजिये जिसमें रख्शंदा जी अपनी ब्लॉग यात्रा के प्रारम्भ और "भड़ास" से अपने जुड़ाव की जानकारी दे रही हैं.
".एक बार अख़बार में...हाँ, वो अमर उजाला का रविवार का पन्ना था जिस में मैंने ब्लॉग के बारे में पढ़ा, बस एक ब्लॉग देखा नाम था भड़ास...मैंने देखा इसके बहुत सारे सदस्य हैं,,,मेरी बहन ने कहा क्यों न तुम भी इसकी मेंबर बनकर ब्लोगेर बन जाओ, बस मजाक मजाक में उस ब्लॉग के यशवंत जी को मेल किया और दूसरे दिन ही मेंबर बन गई, अपना ब्लॉग तो बस यूंही बना लिया, जो बहन ने नाम सजेस्ट किया, रख दिया..."
ये घोषणा कर रही हैं कि ब्लॉग जगत की जानकारी इन्हें अमर उजाला के रविवार के अंक से मिली जिसमें भड़ास के बारे में छपा था. उसी से इन्हें अपना ब्लॉग बनाने की भी प्रेरणा मिली. इससे पहले ये ब्लॉग जगत से अनजान थीं. क्या आप जानते हैं कि अमर उजाला की संडे मेग्जिन (संडे आनंद) में ये भड़ास से सम्बंधित लेख कब छपा था? वो तारीख थी ०२ मार्च, २००८. भड़ास पर यशवंत जी की ये पोस्ट देखिये. अब आप जरा मुझे बताइए कि जिस शख्स को ०२ मार्च, २००८ तक ब्लॉग दुनिया की जानकारी ही नहीं थी वह अक्टूबर २००७ में अपना ब्लॉग कैसे बनाकर बैठा था? जरा इसका भी अन्वेषण कीजिये और हम सभी को बताइए.

इस तरह की ढेरों कांट्राडिकटरी बातें क्या इन्हें शक के घेरे में नहीं लातीं? ऐसे में अगर मैंने अपना शक जाहिर किया तो क्या ग़लत किया?

इसके आगे आप मेरे बारे में लिख रहे हैं:
"भूतजी का ब्लॉग '2008 में क्रिएट हुआ है। ध्यान रहे कि यह वही वक्त है जब मोहल्ला और भड़ास अपनी-अपनी पोल खोल रहे थे। यह अलग बात है कि भूतजी की पहली पोस्ट मजदूर दिवस के दिन आई। साथ ही 35 कमेंट भी मिले। यानी, एक स्ट्रैटजी के तहत यह जनाब दूसरों के ब्लॉग पर टिपियाते रहे और पहली पोस्ट में ही चर्चित भी हुए।"
अब आप क्या कहना चाह रहे हैं? क्या आप मुझे भी भड़ास या मोहल्ला से जोड़ कर देख रहे हैं? बड़ा सम्मान बख्शा आपने मुझे, मैं कृतार्थ हुआ. लेकिन अनुराग जी मैं आपको बता दूँ कि मैं मूल रूप से कम्युनिटी ब्लॉग के विचार के ही खिलाफ हूँ. गिरोह्बद्द होकर काम करना और प्रेशर ग्रुप क्रिएट करना सामजिक जीवन की बुराइयाँ हैं और इनसे ब्लॉग जगत को दूर ही रखा जाना चाहिए. आप देख सकते हैं कि अपने ब्लॉग पर भी मैंने किसी कम्युनिटी ब्लॉग का लिंक नहीं लगाया है, सिवाय "चोखेर बाली" के.

और जैसा कि आप देख ही आए हैं मेरी ये आईडी जनवरी २००८ की बनी है, यानी जब मुझे हिन्दी ब्लॉग्स की जानकारी मिली उससे दो महीने पहले की. पहले दिन से ही ये आईडी इसी नाम से है. आप चाहें तो मैं आपको इस आईडी से एक अंगरेजी ब्लॉग पर किए गए कुछ कमेंट्स का लिंक बता सकता हूँ जो जनवरी २००८ में किए गए थे. हिन्दी के ब्लॉग्स तो काफी बाद फरवरी अंत में जानकारी में आए.

आपके अनुसार मैंने एक स्ट्रेटेजी के तहत और लोगों के ब्लॉग्स पर कमेन्ट किए और अपनी पहली ही पोस्ट में उसका प्रतिफल ३५ कमेंट्स के रूप में पाया. मजेदार बात रही ये भी. अनुराग जी, इन पैंतीस में से आधे से ज्यादा लोग (कहिये तो नाम गिनाऊँ) ऐसे थे जिनके ब्लॉग पर मैंने अपनी पहली पोस्ट लिखने से पहले कभी कोई कमेन्ट किया ही नहीं था. बाकी में से अधिकतर के साथ तो इससे भी बुरा सुलूक किया था और बिना किसी लाग लपेट के अच्छी बुरी कैसी भी टिप्पणियां छोड़ता रहा था. अगर आप मेरी उस दौरान की टिप्पणियां देखें तो पायेंगे कि अधिकांश का स्वर आलोचनात्मक ही था ना कि लल्लो-चप्पो वाला, वाह जी क्या बात है टाइप. फ़िर भी लोगों ने मुझपर अपना स्नेह लुटाया तो वो मेरा सौभाग्य है. शायद ऐसा कमेंट्स की ईमानदारी की वजह से ही रहा होगा.

अब चलिए एक सेकंड को आपका आरोप सत्य मान भी लें कि मैंने ऐसा लोकप्रियता कमाने के लिए किया. (काश, मुझमें सचमुच इतनी बुद्धि होती) तो ये बताइए कि इस भारी कमाई को मैंने किस तरह भुनाया? जब मुझे लोग इतना प्यार दे रहे थे तो मुझे तो हवा में उड़ते हुए रोज एक पोस्ट पेल देनी चाहिए थी. आख़िर आपके ब्लॉग पर ट्रैफिक तो तभी आएगा जब आप नियमित लिखेंगे. १ मई से लेकर ३१ अगस्त तक चार महीनों में कुल नौ पोस्ट मैंने लिखीं. अब आप मुझे समझाइए कि कौन सी स्ट्रेटेजी लेकर मैंने जनवरी में ब्लॉग बनाया और जबकि सबकुछ सोचे समझे अंदाज में आगे बढ़ रहा था उसके बावजूद आठ महीने में केवल नौ पोस्ट लिखीं?

कुल मिलाकर आपकी बात (हास्यास्पद नहीं कहूँगा) हास्यप्रद लगी. मुझे पढ़कर बड़ा मजा आया. कभी आप भी दुबारा इसे पढ़कर देखिये, शायद आप ख़ुद भी मुस्कुरा उठेंगे.
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चलिए, काफी हुआ. अनुराग अन्वेषी जी का बहुत बहुत शुक्रिया जो उन्होंने मुझे ख़ुद अपने बारे में इतनी बकवास करने के लिए उकसाया. मुझे अंदाजा नहीं था कि अपनी हांकने में इतना भी मजा आ सकता है. सचमुच बड़ा आनंद आया.

Tuesday, September 9, 2008

कौन लिख रहा है रख्शंदा के नाम से?

बौखलाहट बताती है कि दाल में कुछ काला जरूर है.

आप बड़े जतन से एक फर्जी आइडेंटिटी रचते हैं. महीनों के कड़े परिश्रम से उसे लोकप्रिय बनाते हैं, लोग धीरे-धीरे आपके झांसे में आना शुरू होते हैं. और फ़िर एक दिन अचानक कहीं से आपकी हरकत का भंडाफोड़ हो जाता है. बना-बनाया महल इस तरह मिट्टी में मिलता देख गुस्से से आग-बबूला हो जाना स्वाभाविक प्रतिक्रिया है. इससे इतर और उम्मीद भी क्या की जा सकती है, लेकिन आप को अंदाजा नहीं है कि शब्दों की कड़वाहट भी कई राज खोल देती है.

इंटरनेट की वर्चुअल दुनिया एक विचित्र जगह है. इस आभासी लोक में जब आप किसी को ब्लॉग पर लगातार पढ़ते हैं तो उसके व्यक्तित्व के बारे में धीरे-धीरे एक सोच कायम कर लेते हैं. निश्चित रूप से इस सोच में आपका अपना पर्सपेक्टिव और अपनी विचारधारा भी एक अहम् भूमिका निभाती है. कोई ऐसा, जिसके विचार आपके विचारों से मिलते-जुलते लगें, उसे आप जल्द ही अपने काफी नजदीक महसूस करने लगते हैं.

लेकिन यह आभासी संसार कई तरह के खतरों से भी भरा पड़ा है. टेक्नोलॉजी ने जहाँ इंसान को कई बेहतरीन और नायाब तोहफे बख्शे हैं, वहीं साथ ही साथ इनका दुरूपयोग करने वालों की एक पूरी जमात भी तैयार हो गयी है. अपनी कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बैठकर आप जिससे मुखातिब हो रहे हैं, क्या वह वास्तव में वही इंसान है जो अपने आप को बता रहा है या फ़िर एक फर्जी आइडेंटिटी का इस्तेमाल करके लोगों को बरगलाने वाला कोई बहुरूपिया, इसका फ़ैसला आपका विवेक, { ओबेरॉय नहीं :-) }, ही कर सकता है. इंटरनेट पर बढ़ते खतरों के बीच आपका इस बारे में अतिरिक्त एहतियात बरतना न सिर्फ़ जायज है बल्कि अपेक्षित भी.

अब जरा स्पेसिफिक बात की जाए. रख्शंदा के नाम से लिखने वाले दुर्जन (पहले मैंने इन्हें गलती से सज्जन लिखा था) ने अपनी आग-बबूला पोस्ट में ढेर सारा जहर उगला है. इन जनाब के तंग मजहबी जेहन में जितना विष हो सकता था, लगता है सारा का सारा बेचारे एक घोस्ट बस्टर के ऊपर ही खर्च कर डाला है. :-)

जरा एक बार फ़िर से देखें कि ये सारा मामला आख़िर है क्या जिस पर इतनी हाय-तौबा मचाई जा रही है. दुनिया भर के सारे आरोप गंदी से गंदी भाषा में जड़े जा रहे हैं. समूची ब्लॉगर बिरादरी का आह्वान किया जा रहा है कि चलिए और इस धृष्ट की ख़बर लीजिये. खास तौर पर महिला ब्लॉगर्स को उकसाया जा रहा है कि इतना बड़ा मुद्दा हुआ और किसी महिला ने इसके खिलाफ आवाज नहीं उठायी?

आप किसके बारे में क्या धारणा बनाते हैं ये आपका व्यक्तिगत अधिकार है. इस मामले में कोई आपको अपनी राय बनाने या बदलने के लिए बाध्य नहीं कर सकता. मैंने इन जनाब के कुछ लेख पढ़े, इनकी असलियत और सही नीयत को लेकर मुझे कुछ शक हुआ. इंटरनेट पर थोड़ी सर्च की, शक और पुख्ता हुआ. उचित समय पर इसके बारे में अपने ब्लॉग पर मैंने संतुलित शब्दों में अपनी बात रख दी.

अब जरा इन साहब के शब्दों पर गौर कीजिये:
"जब आप सड़क पर खड़े हो कर किसी को गाली देने लग जाएँ, यहाँ तक कि गांधी जी को, तो थोडी देर के लिए लोग आपकी तरफ मत्वज्जा तो हो ही जायेंगे"
दो गलतियाँ हैं इसमें जनाब, एक तो ये कि मैंने आपकी तरह किसी को गाली नहीं दी, केवल आपके झूठ से परदा उठाया, दूसरे ये कि इसके लिए मैंने किसी सड़क का रुख नहीं किया, कहीं और किसी के ब्लॉग पर जाकर चीख-चिल्लाहट नहीं मचाई. बल्कि अपने ख़ुद के ब्लॉग पर दो शब्द कहे, जो कि मेरा जायज हक़ है.

एक और मुद्दा जो बनाने की दिलो-जान से कोशिश की जा रही है, वो ये कि इन साहब को पुरूष बताकर मैंने महिलाओं का कोई अपमान किया है. बाकायदा सुजाता जी तक को पुकारा जा रहा है. खासा हास्यास्पद प्रयास है यह. जरा घटनाक्रम को ध्यान से देखिये और सोचिये. किसी ब्लॉगर पर मुझे नकली आइडेंटिटी वाला होने का शक होता है. मुझे लगता है कि इस प्रकार के लेख लोगों को मूर्ख बनाने के लिए और अपनी दूकान चलाने के लिए लिखे जा रहे हैं. कई लेखों और टिप्पणियों की गैरजरूरी आक्रामकता और इनमें झलकते मजहबी जूनून से ऐसा शक होता है कि कोई महिला शायद इस तरह की भाषा और व्यवहार को अपनाने में इतनी सहज नहीं रह पाती. ऐसा सोचने की सामान्य वजह यही है कि इस देश में अभी भी महिलाऐं पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक सभ्य और शालीन हैं. पान की दूकान पर महिलाओं के गोल बाँध कर खड़े हुए और आते जाते पुरुषों पर फब्तियां कसने की कल्पना कर सकते हैं क्या आप? कुछ निचले स्तर के कारनामे अभी तक केवल पुरूष ही अंजाम देते आए है और आगे भी उन्हीं का अधिकार रहने वाला है. तो जब इनकी हरकत को मैंने महिला जनित ना समझते हुए पौरुषिक लम्पटता से जोड़ा तो ये महिलाओं के लिए अपमान की बात कैसे हुई? आप स्वयं विचारिये.

ये साहब एक पहुंचे हुए कलाकार और कथाकार हैं. ढेर सारे प्रभावकारी अल्फाजों की इनके पास कोई कमी नहीं है, हलाँकि तर्कों और विचारों से ज्यादा काम नहीं लेते क्योंकि वहां इनके मजहबी जूनून में खलल पड़ेगा. अभय जी से सम्बंधित मेरे लेखों के बारे में जो इन्होने लिखा है उससे भी ये बात स्पष्ट हो जाती है.

और भी बहुत कुछ कहा जा सकता है, मगर ये सब सिर्फ़ समय की बर्बादी होगी. इनके बारे में मैं जो कुछ सोचता हूँ, बता दिया. अब इस मुद्दे को और आगे बढ़ाने का मेरा कोई इरादा नहीं है. दूसरा और बहुत काम अभी बाकी है.
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अंत में बस कुछ प्रश्न छोड़ता हूँ, आप ब्लॉगर साथियों के विचारने के लिए.

१) फरवरी माह के अंत में मैंने हिन्दी ब्लॉग्स को डिस्कवर किया था. उस समय एक बड़ा विवाद अपने अंत की ओर अग्रसर था. मुझे पूरी तरह जानकारी नहीं है, मगर ऐसा लगता है कि भड़ास नामक ब्लॉग को लेकर "मोहल्ला" और "चोखेर बाली" का कोई झगड़ा था. जब समूचा ब्लॉग जगत भड़ास की भाषा को लेकर कराह रहा था और महिलाओं की तो छोडिये, अधिकांश भद्र पुरुषों तक ने अपनी नाक पर रूमाल रख कर उस ओर से मुंह फेर लिया था, तब कई फर्जी महिला आइडेंटिटी बनाई गयीं, जिन्हें हम सब जानते हैं. इन फर्जी महिला चरित्रों के अलावा ब्लॉग जगत से और कोई महिला वहां कभी नहीं दिखी. इस बात की असलियत पूरे ब्लॉग जगत को पता थी सिवाय उन भड़ासियों के जो इन्हें बना और चला रहे थे और इन महिलाओं के जो आपस में एक दूसरे को असली मानकर कमेन्ट देती थीं.

रख्शंदा एक ऐसा ही नाम है. इस नाम से वहां कई पोस्ट्स और ढेरों कमेन्ट लिखे गए जो अब भी मार्च अप्रैल की भड़ास की पोस्टों पर देखे जा सकते हैं. क्या शक नहीं होता कि यह श्रीमान भड़ास से जुड़े हुए कोई पत्रकार हैं?

२) इनकी ब्लॉगर प्रोफाइल के अनुसार ये एक राईटर हैं. ब्लॉग पर लेख भी बड़े संजीदा किस्म के होते हैं. बात बात में नैतिकता में गिरावट के लिए अमरीका को कोसने का काम चलता रहता है. लेकिन ब्लॉग का नाम रखने की बात आती है तो वो चुना जाता है, "प्रेटी वूमन". कोई गंभीर महिला अपने ब्लॉग का इस तरह का छिछोरा नाम रखेगी इसमें मुझे शक है. मुझे तो ये सस्ती लोकप्रियता बटोरने का कोई नुस्खा ज्यादा दिखता है. साथ में किसी सुंदर महिला की तस्वीर लगी हो तो भीड़ अच्छे जुट ही जायेगी.

ऐसे और भी कई प्रश्न हैं. मगर ज्यादा कुछ कहना बेकार है.
इस्राइल का नाम भर ले लिया जाय तो लोग आपको ख़ुद इस्राइल बना देते हैं. एक साथ कई फ्रंट खुल जाते हैं. लोग मिलकर हमला बोल देते हैं. इतने सारे फ्रंट पर एक साथ खड़े रहना मेरी क्षमता से परे है. विचलन से बचना चाहता हूँ, इसलिए अब इस मुद्दे को यहीं दफ़न करूंगा.

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