आइये पिछली पोस्ट की अधूरी बात को आगे जारी करते हैं और जानते हैं कि डॉ. एल्स्ट के विचार.
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बौद्धिक स्तर पर हिंदू जल्द ही आजादी की साँस लेने में सक्षम होंगे. वे सनातन धर्म की अनेक मूल्यवान अभिव्यक्तियों को एक बार फ़िर पहचानने और समझने में भी समर्थ होंगे. सनातन धर्म की एकता और अखंडता को उसके मूल रूप में स्थापित करने में वे कामयाब होंगे और जब वे इस वैज्ञानिक तथ्य को दोहराएंगे कि बौद्ध, जैन और सिख धर्म, स्कूलों और सम्प्रदायों के एक ही हिंदू राष्ट्रमंडल के पूर्ण सदस्य हैं तो ऐसा कहने पर उन्हें किसी सांप्रदायिक निशाने पर नहीं रखा जा सकेगा. हिंदू समाज के दुश्मनों द्वारा जिस छद्म-ऐतिहासिक आधार (pseudo-historical basis) पर जातीय और क्षेत्रीय अलगाववाद को बढ़ावा दिया जाता है, वे उसका भण्डाफोड़ करने और हिंदू समाज की एकता और अखंडता को सुनिश्चित करने में पूरी तरह कामयाब रहेंगे. वे हिंदू समाज की बुराइयों को भी वास्तविक तथ्यों के आधार पर सही ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य (historical perspective) में देखने में और उन्हें सार्वभौमिक मानकों (universal standards) के आधार पर परखने में सक्षम होंगे बजाय उन शत्रुतापूर्ण तदर्थ मानकों (hostile ad hoc standards) के जो हिंदू समाज के दुश्मनों द्वारा लागू किए जाते हैं.
एक नवीकृत स्व-जागरूकता से सुसज्जित हिंदू बढ़ते हुए उग्रवादी मुस्लिम विश्व की चुनौती का सामना करने में सक्षम होंगे. अब तक, वामपंथियों की मदद से इस्लाम भारत पर एक प्रकार का आपातकाल थोपने में कामयाब रहा है. इंदिरा गांधी के आपातकाल के दौरान, हर कोई नेहरू की बेटी के स्तुति गान के लिए तो पूर्णतः स्वतंत्र था लेकिन उनकी आलोचना करना एक खतरनाक काम था. सभी भारतीय बुद्धिजीवी इस प्रकरण (जिसके दौरान संविधान संशोधन कर भारत को धर्मनिरपेक्ष समाजवादी गणराज्य बनाया गया था) का उल्लेख रोष के साथ करते हैं. कुछ इसी प्रकार की स्थिति आज देखने में आती है जब हम ये पाते हैं कि इस्लाम को शान्ति और भाईचारे का रिलिजन बताकर उसकी सराहना करने की तो अनुमति है पर इस्लामी इतिहास और सिद्धांतों की छानबीन करना और उसे परखना, या केवल कुछ असुविधाजनक प्रश्न भर पूछना भी सोच से बाहर की बात है. उन किताबों पर जो इस दिशा में कार्य करती हैं, पाबंदी की सम्भावना रहती है और इसमें इन्हीं सेकुलरवादियों का मौन या प्रत्यक्ष अनुमोदन रहता है. अखबारों के संपादकों ने इस्लाम के प्रति आलोचनात्मक लेखन से पूर्ण परहेज बना रखा है. बौद्धिक रूप से इस्लाम को सुरक्षात्मक स्तर पर धकेल कर उसके अंहकार भाव को ठंडा किया जाना काफी आसान है. इसके लिए उन्हीं क़दमों को उठाना होगा जिन्हें ये "आपातकाल" रोकना चाहता है. अगर हिंदू इस्लाम के मूल ग्रंथों का संज्ञान ले लें, वास्तव में जिन सिद्धांतों का ये प्रतिपादन करते हैं उसे समझ लें, पैगम्बर के मिशन और कैरियर की कहानी को जान लें और भारतवर्ष पर इस्लाम के हमलों और प्रभुत्व में इन सिद्धांतों के अनुप्रयोग की असली कहानी को समझ लें, तो वे इस साम्राज्यवादी विचारधारा के यशोगान की अपनी आदत से जल्दी ही छुटकारा पा जायेंगे. इसके अतिरिक्त, यदि वे उन सटीक मनोवैज्ञानिक श्रेणियों का प्रयोग कर, जो हिंदू परम्परा ने विकसित की हैं, इस्लाम के केन्द्रीय ग्रंथों और सिद्धांतों का प्रतिपादन करने वाली चेतना की गुणवत्ता को समझें, तो उन्हें इस्लाम की मानसिक चापलूसी की बीमारी से उबरने में अधिक समय नहीं लगेगा.
यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि इस्लाम बहुत लंबे समय तक नहीं टिकेगा. किसी भी तर्कसंगत भावना, जो कि हिन्दुओं में सहस्त्राब्दियों से विद्यमान है, और जो पश्चिम की आधुनिक संस्कृति और शिक्षा के प्रसार के दौर में केन्द्रीय रूप ले चुकी है, के साथ टकराव में इस्लाम का तर्कहीन, तानाशाहीपूर्ण और आत्म-मुग्ध रवैया कहीं टिक ही नहीं सकता. विज्ञान का यूनिवर्सलिस्ट दृष्टिकोण इस दोषपूर्ण विश्वास के ख़िलाफ़ विद्रोह करता है कि कोई एक आदमी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के रचनाकार से सीधे एक विशेष संदेश प्राप्त कर सकता है, जबकि अन्य सभी लोग ऐसे किसी प्रत्यक्ष संपर्क से बहुत दूर रखे जाते हैं. विज्ञान का आलोचनात्मक दृष्टिकोण इस मांग को अस्वीकार करता है कि हम मुहम्मद के पैगम्बरी के दावे को बगैर किसी सत्यापन के स्वीकार कर लें. इस्लाम के पास विज्ञान और तर्कशीलता की इस चुनौती का कोई उत्तर नहीं है.
इसके अलावा, इस्लामी सक्रियता में वर्तमान उत्थान, चाहे कितना भी खतरनाक क्यों न लगता हो, स्वयं मुस्लिमों को किसी भली दिशा में ले जाने वाला नहीं है. यह दुनिया भर के गैर-मुस्लिमों के खिलाफ लोकप्रिय आक्रामकता भले ही जुटा ले, पर जब किसी राष्ट्र का शासन सँभालने की बात आती है तो यह साम्यवाद से भी बदतर साबित होगा. बेशक इसकी जड़ें लोगों की आत्मा में कहीं अधिक गहरे में जमीं हैं, लेकिन इसका सामना उन भौतिक आवश्यकताओं और लोकप्रिय नजरिये एवं आकांक्षाओं से है, आज जिनका प्रसार आधुनिकता ने विश्व के समस्त देशों में कर दिया है. यहाँ तक कि इस्लामी शासकों को भी, चाहे वे तानाशाह ही क्यों न हों, अपने लोगों की इच्छाओं का ध्यान रखना होता है और इसके लिए उन्हें आधुनिक भौतिक संसाधनों की आवश्यकता होती है, क्योंकि आज के जनसंख्या बहुल देशों में जीवन के लिए आवश्यक आधुनिक बुनियादी सुविधाओं का होना अपरिहार्य बन चुका है. (उल्लेख करना आवश्यक नहीं कि आज आधुनिक हथियारों के प्रति इस्लामी शासकों का लगाव उतना ही है, जितना कि 'काफिर' शासकों का). तो वे आधुनिक प्रौद्योगिकी से मुंह नहीं मोड़ सकते, इसलिए आधुनिक विज्ञान, और इसलिए आधुनिक सोच. हालांकि आधुनिक सोच मानवता की प्रगति में कोई अन्तिम शब्द नहीं है, लेकिन यह इस्लाम के केन्द्रीय विश्वासों को झकझोरने के लिए पर्याप्त है.
तो यहाँ हमने केवल इस्लाम की कमजोरी का प्रदर्शन किया है. संभवतः यह समझदारी और मानवता की संस्कृति के ख़िलाफ़ जीत नहीं सकता. हालांकि यह कुछ और समय के लिए टिका रह सकता है और शायद तब तक अपनी संख्या और सत्ता को बढ़ाना जारी रख सकता है, लेकिन अंततः इसका खंडित होना तय है. यह किस प्रकार टूटेगा यह आंशिक रूप से लोगों के उद्भव पर निर्भर करता है, विशेष रूप से उन जन्म से मुस्लिम लोगों के जो अन्य मुस्लिम समुदाय के साथ मंच पर इस्लाम की सक्रिय आलोचना करते हैं. साथ ही यह निर्भर करता है उन गैर-मुस्लिमों पर जो मुस्लिम समुदाय के साथ सतत संपर्क में हैं, जैसे कि हिंदू, कि वे इस्लाम के केन्द्रीय दावों के प्रति अपने संदेहों को कितनी स्पष्टता और दृढ़ता से प्रकट करते हैं और किस तर्क और मानवीयता के साथ वैकल्पिक विचारों को प्रकट करते हैं. इस्लाम की तर्कसंगत आलोचना इन्सानी सोच को इक ऐसा नाजुक मगर महत्वपूर्ण मोड़ देगी जिससे कतई कन्नी नहीं काटी जा सकेगी. पर अंततः इस्लाम के अवश्यम्भावी पराभव में जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक होगा, तो वह बेहतर (यानी अधिक तर्कसंगत और मानवतावादी) सोच और संस्कृति के प्रति सकारात्मक मानवीय आकर्षण ही रहेगा.
इस्लाम को हिंदू उत्तर मुख्यतः समझदारी से भरे उस सकारात्मक दृष्टिकोण से ही प्रेरित होना चाहिए जिसकी जड़ें हिंदू मानवतावादी सोच में गहराई से जमी हुई हैं और जिसकी शाखाएं उस आत्मज्ञान से फूटती हैं जो हिंदू परम्परा सदियों से पोषित करती आयी है. उसे, उदाहरण के तौर पर, वर्तमान इस्लामी चढ़ाव के दो सांस्कृतिक घटकों के मध्य एक भेद सावधानीपूर्वक समझना होगा: इनमें से एक तो पश्चिम की न्यूनकारी (reductionist) संस्कृति, जो स्वयं आत्मिक रूप से गरीब है, के बढ़ते दवाब के विरुद्ध आवाज उठाना है, ये एक ऐसी सोच है जिससे शायद हिंदू भी सहमत होंगे. वहीं दूसरी ओर है इस्लामी विश्वास प्रणाली का कट्टर अतिवादी अध्यारोपण. हिन्दुओं को उन मानसिक और सामजिक संरचनाओं को समझना चाहिए जो लोगों को ऐसी तर्कहीन विश्वास प्रणालियों से जुड़ने को प्रेरित करती हैं. उन्हें अपने व्यवहार और सोच में उस सूक्ष्म अन्तर को बनाये रखना होगा जो इस विश्वास प्रणाली में फंसे हुए लोगों और स्वयं इस्लामिक विश्वास प्रणाली के मध्य है. और ऐसा करना आसान, अधिक विश्वसनीय और कम आक्रामक हो जाएगा, यदि वे अपनी स्वयं की संस्कृति पर भी एक समान रूप से गंभीरतापूर्वक दृष्टिपात करें, उन दोनों प्रकार की सोच को तिलांजलि देते हुए जो या तो आत्महीनता या फ़िर आत्मस्तुति का पल्ला पकड़ती हैं, और दुर्भाग्यवश यह स्थिति वर्तमान हिंदू लफ्फाजियों में आम तौर पर प्रचलित है.
यहाँ पर यह भली-भांति समझ लिया जाना चाहिए कि इस्लाम की यह आलोचना एक विश्वास प्रणाली और उससे सम्बंधित व्यवहारिक नियमावली की आलोचना है, ना कि किसी समुदाय के लोगों पर कोई आक्रमण. और यह अपने आप में कोई लक्ष्य भी नहीं है. राजनीतिक स्तर पर यह केवल एक गंभीर समस्या के व्यवहारिक कारणों की पड़ताल में उभरने वाला निष्कर्ष है: भारत में निरंतर जारी रहने वाले सांप्रदायिक तनाव का कारण इस्लाम है. आखिरकार, कोई भी दो समुदाय, धार्मिक अथवा अन्य, कभी आपस में उलझ भी सकते हैं, पर ऐसा कभी-कभार ही होता है, जबकि मुसलमानों और अन्य सभी धर्मावलम्बियों के मध्य तनाव हमेशा तीव्र और लगातार बने रहने वाली स्थिति है. बौद्धिक स्तर पर इस्लाम की यह आलोचना केवल धार्मिक बुनावट की एक केस स्टडी का प्रयास भर है, जो मानव के धार्मिक इतिहास के सामान्य अध्ययन और अन्वेषण का अंग है और जो आने वाले कल की वैश्विक सभ्यता में अविभाज्य मानव शिक्षा के लिए आधार का हिस्सा है. मैं स्वयं इस्लाम या अन्य किसी के ख़िलाफ़ किसी धर्मयुद्ध (crusade) में जीवन पर्यंत लगे रहने का कोई इरादा नहीं रखता. बात सिर्फ़ इतनी है कि हमें कुछ दखलंदाज और कपटपूर्ण विश्वास प्रणालियों के प्रति अपने भ्रम से अपने आप को मुक्त करने की आवश्यकता है और एक बार यह हो गया तो हम सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन के अधिक सकारात्मक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे.
और ठीक ऐसी ही बात सेकुलरवादियों के विरोध पर भी लागू होती है. असल समस्या विचार हैं, लोग नहीं. लेकिन जो लोग लगातार अपनी पूरी ऊर्जा और शक्ति के साथ अपने खोखले विचारों की डुगडुगी बजाते हुए विरोधियों को सिर्फ़ बदनाम करने को ही तत्पर दिखते हैं, तो इन लोगों को इन्हीं की भाषा में समझाने के लिए इनके विचारों की आलोचना के साथ कुछ नेम-टेग्स जोड़ना आवश्यक हो जाता है. इस किताब में मैंने इन सेकुलरवादियों को गहराई में डील किया है और कहीं भी इन्हें बख्शा नहीं है. ये लोग आधुनिकता, तार्किकता और लोकतंत्र के चैम्पियन होने का नाटक करते हैं और इसी वजह से तथ्यों की इनकी तोड़-मरोड़ इन्हें और भी अधिक अलोकतांत्रिक एवं अधिनायकवादी रंग देकर इनके विचारों को अस्वीकार्य बनाती है. इनका पर्दाफाश किया जाना जरूरी है और इस अप्रिय कार्य में मैंने अपना योगदान दे दिया है. मैं यही इरादा रखता हूँ, और ऐसी ही आशा करता हूँ कि इनके विरोध में खड़े होने का यह मेरे लिए अन्तिम अवसर साबित हो. एक बार हिंदू समाज इन हिंदू-विरोधी जोंकों को झाड़ कर अलग कर देगा, यानी इनके मानसिक प्रभाव से अपने आप को मुक्त कर लेगा, तो वह अपने समृद्ध खजाने को और विकसित कर मानवजाति के विकास में समर्पित करने एवं वास्तविक राष्ट्रीय एकता को प्राप्त करने की दिशा में ध्यान केंद्रित कर सकेगा.
दरअसल यह राष्ट्रीय एकता, जिसके कि बारे में भारत में हरेक व्यक्ति बात करता दिखता है, अपने आप में एक बहुत ही स्वाभाविक सी स्थिति है और कोई ऐसी चीज नहीं है जिसकी प्राप्ति किन्हीं विशेष प्रयासों की दरकार रखती हो. बल्कि आवश्यकता तो कुछ चीजों को छोड़ने की है. आवश्यकता है उन हिंदू-विरोधी अलगाववादी सिद्धांतों को धराशायी करने की जिनका निर्माण ही साम्राज्यवादी उद्देश्यों से किया गया है और अब जिन्हें तोड़-मरोड़ पूर्ण बौद्धिक एवं प्रोपेगेंदिस्त प्रयासों द्वारा जिलाए रखा जा रहा है. बस इस कुचक्र को तोड़ना होगा और राष्ट्र अपनी एकता को स्वाभाविक रूप से प्राप्त कर लेगा.
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इस लेख का अनुवाद मेरे अंदाजे से कहीं अधिक कठिन साबित हुआ है. मेरे जैसे सामान्य व्यक्ति के लिए, जिसका हिन्दी और अंग्रेजी दोनों पर ही केवल सामान्य अधिकार भर है, और इस प्रकार के कार्य का कोई अनुभव भी नहीं, इस अनुवाद का कार्य वाकई समय खपाऊ रहा. अनुवाद का स्तर भी सामान्य से ऊपर नहीं उठ सका. फ़िर भी हिन्दी में इस लेख को देते हुए मुझे प्रसन्नता अनुभव हो रही है. वैसे यदि आप अंग्रेजी में कम्फर्टेबल हैं तो मूल लेख को अंग्रेजी में यहाँ पढ़ सकते हैं.
डॉ. एल्स्ट की कुछ किताबें एवं लेख नेट पर भी उपलब्ध हैं. इस साईट को देखें. बहुत बढ़िया सामग्री है.




