Wednesday, August 19, 2009

क्या घोस्ट बस्टर को "सूरमा भोपाली" सम्मान नहीं मिलना चाहिये?

ऊँ श्री फ़ुरसतियाय नमः

गई जून में जब हफ़्ते भर की इन्दौर, उज्जैन और भोपाल की यात्रा से लौटे थे तो मनभर मंसूबे बांधे थे कि इस बार एक यात्रा विवरण लिखकर ब्लॉग पर चिपका ही देंगे. मगर जैसा कि हर उच्च कोटि के विचार के साथ होता आया है, क्रियान्वयन की राह में सतत बाधाएँ आती चली गयीं और लेख टलता रहा. उस यात्रा पर पोस्ट ठेलने का विचार अभी पूरी तरह ड्रॉप भी नहीं हो पाया था कि इस बीच एक बार फ़िर भोपाल का फ़ेरा लग गया. हालांकि इस बार का दौरा कुछ छोटा रहा, केवल साढ़े चौबीस घंटे का, लेकिन पोस्ट ठेलने लायक पर्याप्त अनुभव बटोर लिये गये. इससे पहले कि अभी दिमाग में दंड-बैठक करते ये अनुभव इधर-उधर रस्ता देखकर कहीं भाग निकलें और पोस्ट के लिये छटपटाते विचार का फ़िर पहले जैसा हश्र हो ले, कुछ कर ही गुजरने का मन बनाया है. सो, अब हमने एक मग सामने टेबल पर और दो मग बंद थर्मस में कॉफ़ी भरकर पीसी के सम्मुख आसन जमा लिया है. आप झेलने-भुगतने की तैयारी कीजिये.

यात्रा-विवरण सुनाने वालों की बात करें तो अपने ज़हन में पहला अक्स उभरता है फ़ुरसतिया जी का. तो लाज़मी है कि कुछ भी लिखने से पहले प्रथम सुमिरन उन्हें ही किया जाये, किया भी है. वैसे इसमें एक लाभ की आशा और भी है. पूरी सम्भावना दिख रही है कि पोस्ट लम्बी रहेंगी. ऐसे में पाठक अगर धिक्कारेंगे तो पोस्ट की लम्बाई का दोष फ़ुरसतिया जी को किये प्रणाम पर डालने की सुविधा रहेगी. इसी आशा से...

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भाई साहब का पहला संदेश कोई पन्द्रह-बीस दिन पहले मिला था. धीरे-धीरे संदेश आदेशों का और आदेश चेतावनियों का रूप लेते रहे लेकिन हमारा बलवान आलस्य इन सभी क्रमश: अधिक गम्भीर होते जाते बुलावों पर भारी पड़ता रहा. ये सिलसिला थमा ८ अगस्त, २००९, शनिवार की उस अन्यथा खुशनुमा संध्या को जब अंतत: आशंका के अनुरूप, चेतावनियों ने हड़काई का आकार ले लिया और अंतिम प्रहार के रूप में ब्रह्मास्त्र दाग दिया गया, "तुम्हारी बहानेबाजियों का कोई अंत नहीं, एक जरा से काम में दो हफ़्ते लगा दिये और आगे भी कोई कुछ करोगे इसकी सम्भावना नहीं दिखती. तुम्हारे भरोसे रहना बेकार है, कल मैं स्वयं वहां पहुंच रहा हूं."

पानी गर्दन तक आ गया था. अब तो आलस्य की चादर से पाँव बाहर निकालने ही होंगे. एक बार फ़िर से तीन-चार दिन की मोहलत के लिये आवेदन किया गया, जो आशा के विपरीत तुरन्त स्वीकृत भी हो गया. या तो इस बार मेरे स्वर में निहित गम्भीरता को भांप गये होंगे या फ़िर एक संभावना ये भी कि श्रीमान जी खुद भी यूं ही खाली-पीली ब्लफ़ मार रहे थे. खैर, अब इस सब के बारे में सोचने विचारने का समय नहीं था. इस बार वाकई हिलने-डुलने का समय था. तय रहा कि १४ अगस्त को भोपाल पहुंचूंगा और १५ को वापसी. दोनों दिन छुट्टी के थे, पहले दिन जन्माष्टमी और दूसरे दिन राष्ट्रीय पर्व स्वतंत्रता दिवस. तुरत-फ़ुरत रिज़र्वेशन करवाया गया और खुद को एक नयी चिन्ता के हवाले किया गया.

लेकिन ये चिन्ता हमारे नहीं बल्कि श्रीमती जी के सर पर अवतरित हुई. सुना है कि भोपाल में भी स्वाइन-फ़्लू के कुछ केस निकले हैं. स्वास्थ्य मंत्री आजाद गुलाम साहब एक ही रामबाण उपाय सुझा रहे हैं कि जहाँ तक हो सके भीड़-भाड़ वाली जगहों से दूर रहें. रेलवे स्टेशन्स पर तो बड़ी भीड़ होगी. कहीं कुछ कैच ना कर बैठो. ट्रेन से जाना जरूरी है क्या? क्या टैक्सी करके नहीं जा सकते? लेकिन बाय रोड सफ़र करना अपने को कभी पसंद नहीं आया, खास कर अगर डेढ़-दो घंटे से अधिक का सफ़र हो तो. तो हम भी अड़े रहे. अंत में कई उपदेशों-प्रवचनों के बाद ट्रेन से जाने पर रजामंदी की मुहर लगा दी गयी. एहतियातों की सूची लोकल स्तर पर (घर में ही) तैयार की गयी पर चार-पांच डिस्पोसेबल फ़ेस-मास्क बाज़ार से लाकर थमाए गये.

१३ अगस्त की शाम को यात्रा में आवश्यक सामान भी एक एयर बैग में डालकर रख दिया गया. हमने डॉ. प्रवीण चोपड़ा जी के ब्लॉग से स्वाइन-फ़्लू सम्बन्धित कुछ आलेख श्रीमती जी को पढ़ाये और उनके भय को कुछ विश्वस्त और अच्छी जानकारियों द्वारा कम करने की चेष्टा की. रात को देर तक हिन्दी के ब्लॉग्स पढ़ते रहे. पता नहीं फ़िर मौका मिले ना मिले. :-). साथ ही अपनी शूरवीरता को भी आप नमन करने का मन होता रहा. दुनिया फ़्लू प्रभावित इलाकों से दूर भागती है, एक हम हैं जो गैर प्रभावित क्षेत्र से प्रभावित की ओर सब कुछ जानते-बूझते हुए भी गमनोत्सुक हैं. इन भोपालियों में अगर जरा भी वीरता की पहचान और सम्मान हुआ तो जरूर किसी उपाधी से नवाजेंगे. शायद 'सूरमा भोपाली' बतर्ज 'ऑर्डर ऑव फ़्रांस'.

१४ अगस्त, शुक्रवार, जन्माष्टमी

प्रातः ०८:०० बजे


चार-पांच मिनिट फ़ोन पर रेलवे इन्क्वायरी से मत्था फ़ोड़ी में गुजारे. अन्य दिन शताब्दी का नम्बर २००२ रहता है पर शुक्रवार के दिन ये '२००२ए'  नम्बर से चलती है और समय भी कुछ अलग रहता है. मैनुअल इन्क्वायरी पर कोई रिस्पांस नहीं था, ऑटोमैटिक वाला गाड़ी नम्बर पूछ रहा था. अब ये समझना मुश्किल कि बीएसएनएल के लैंडलाइन फ़ोन से २००२ का पुछल्ला 'ए' कैसे डायल करें. अंत में हार कर रिसीवर पटका और नियत समय पर स्टेशन की ओर रवाना हो गये.

गाड़ी लगभग समय पर ही थी. अन्य यात्रियों के साथ हमारा भी सफ़ल लदान हुआ और छुक-छुकिया सफ़र की शुरुआत हो गयी. दो मिनिट के बाद ही बगल की सीट पर विराजमान सज्जन की ओर से सीटों के एक्स्चेंज का अनुरोध, नहीं-नहीं, ऑफ़र आया जिसे हमने क्षण भर भी गंवाये बिना स्वीकार कर लिया. इस तरह के किसी भी सहयोग के लिये हम आम तौर पर हमेशा ही तैयार रहते हैं. यदि ये सज्जन साढ़े छै: फ़ुट के ना भी होते और कमर में पुलिसियों वाला सर्विस रिवॉल्वर ना भी खोंसे होते तो भी इस निर्णय में हमें ना तो कोई ज्यादा वक्त लगने वाला था और ना ही इसका स्वरूप दूसरा होता, आप यकीन रखिये. तो सीटों की अदला-बदली हुई. चार दिन से जिस टिकिट को बारम्बार निहार कर कोच नम्बर और सीट नम्बर याद करने का काम चल रहा था, वह सीट दो मिनिट में पराई हो गयी. उनपर इंस्पेक्टर साहब की माताजी और श्रीमती जी काबिज हो गयीं. "सीट-सीट पर लिखा है जाने वाले का नाम".

तभी अचानक इंस्पेक्टर साहब के मंहगे से (लगने वाले) मोबाइल से सस्ती सी धुन फ़ूट पड़ी. पूरा मुखड़ा सुन लेने के बाद उन्होंने कॉल रिसीव करने का मन बनाया. बोले, "आज रात की गाड़ी से भोपाल के लिये निकलूंगा, कल सुबह आपसे मुलाकात हो पायेगी." हम थोड़े भौंचक्के से हुए और उनके मुख की ओर निहारने की प्रबल इच्छा ने मन में जन्म लिया. लेकिन तभी उनकी रोबदार कम घुमावदार मूंछें याद आ गयीं और हमने जबरन गर्दन को बाहर खिड़की की ओर मोड़ दिया. मरोड़ दी जाये उससे अच्छा कि मोड़ ली जाये.

ऐसी ही कुछ और बातों के बाद मोबाइल बंद कर दिया गया. मगर उनकी मोबाइल शांति थोड़ी ही देर कायम रह सकी. फ़िर बज उठा. इस बार किसी को आश्वासन दे रहे थे, "मैं अभी डीआईजी साहब से बात करता हूं. आप जरा पाँच मिनिट से मुझे फ़िर से काल करें". फ़ोन कट हुआ. दस मिनिट पूर्ण शांति, फ़िर वही कॉलर. इस बार बोले, " मेरी बात हो गयी है. आपका पूरा मामला मैंने उन्हें समझा दिया है. आप निश्चिन्त रहिये." हम फ़िर चकित. फ़िर खिड़की की ओर.

अगली सीट पर नजर गयी. दो बुजुर्ग आजू-बाजू बैठे थे. एक कुछ कहे जा रहे थे, दूसरे सुनने का अभिनय करते हुए सर हिला रहे थे मगर सर घुसाये थे "दैनिक भास्कर" में. अखबार की ओट से उनके सर के कुछ खड़े हुए बाल भर नजर आ रहे थे जो सर से जुड़े होने की वजह से उसी गति से उठक-बैठक कर रहे थे और जिनकी डोलनावस्था पहले सज्जन को अपनी बोलनावस्था जारी रखने का संकेत दे रही थी. "मैंने तो कह दिया अपने बेटे से, देखो अगर एजुकेशन में ही रहना है तो पीएचडी जरूर कर डालो. उसके बिना आगे बढ़ना मुश्किल है"

"हूं-हूं-हूं".

पीछे की साइड वाली सीटों पर नजारा कुछ युवा था. दो जोशीले नौजवान, उम्र कोई बाईस-चौबीस के लगभग, किसी निहायत ही जरूरी लगने वाली चर्चा में डूबे थे. दोनों बोलते कम थे, हंसते ज्यादा थे. एक बात बोलते और दो बार हंसते. मुझे ज्योति पाराशर और रजनी इसरानी की याद आई जो कक्षा पाँचवी में मेरी सहपाठिनियाँ हुआ करती थीं. दोनों दिन भर ऐसे ही पास बैठी खी-खी करती रहती थीं और अगर पूछो कि क्या बात है तो कुछ नहीं. अरे भाई अगर कुछ नहीं तो फ़िर ये संगीतमय दंत प्रदर्शनी क्यों? एक बार मुझे शक हुआ था कि हो ना हो ये मुझे ही टार्गेट करके आपस में कुछ बोलती हैं. क्या बोलती हैं? उगलवाने की मासूम सी कोशिश में कुछ ऐसा कह दिया था जिसके जवाब में रजनी ने बिना कोई चेतावनी के सीधे कक्षा अध्यापिका से शिकायत कर दी थी. मामले की गंभीरता आप इससे समझिये कि कक्षा अध्यापिका महोदया ने मुझसे एक शब्द भी नहीं कहा, बल्कि दौड़ी गयीं प्रधान अध्यापिका के कक्ष की ओर. थोड़ी देर में दो चपरासियों को साथ लिये प्रधान अध्यापिका की डरावनी सी आकृति प्रकट हुई और मुजरिम का मुकदमा भरी कक्षा में ही चालू हुआ. पूरी कक्षा की गवाही मेरे खिलाफ़ गई. लेकिन साहस और हौंसले की तब उस उम्र में भी अपने में कोई कमी नहीं थी. डांट-फ़टकार से लेकर मार-पिटाई तक सब मुस्कुराते हुए झेल गये, लेकिन टसुए बहाए तो तभी जब घरवालों को बुलवाने और स्कूल से निकाल बाहर करने की धमकी मिली.

उफ़्फ़... बात कहाँ से कहाँ निकल गयी. मगर क्या कीजिये, ट्रेन के लम्बे सफ़र में फ़ालतू बैठा इंसान करे भी तो क्या? थोड़ा सा नॉस्टेल्जिक तो हुआ ही जा सकता है. हम भी हुए. पर अब लौटते हैं. तो दोनों नौजवान लगे थे बातों में.

"तूने कोई नई फ़िल्म देखी क्या?"

"एक वो देखी थी डेल्ही सिक्स, हा-हा, हा-हा. क्या फ़िल्म थी यार."

"अरे क्या बात है उसकी तो. मुझे तो ऐसी चुलबुली फ़िल्मों में बड़ा मजा आता है. ही-ही, ही-ही"

"मुझे तो रिशी कपूर का कैरेक्टर बड़ा पसंद आया. क्या बोलता है अभिषेक को... एक लड़की पसंद की थी मैंने. उसे भी साला तेरा बाप भगा कर ले गया. हे-हे-हे, हे-हे-हे. क्या मस्त डायलॉग थे यार."

ऐसी पकाऊ फ़िल्म की ऐसी तारीफ़. कुछ और भी फ़िल्मों के बारे में बतियाते रहे दोनों, जो अपनी जानकारी के दायरे से बाहर थीं. लिहाजा कुछ समझ नहीं आया. अच्छा ही रहा.

इस बार ट्रेन में खान-पान के स्तर में जरूर कुछ सुधार दिखायी दिया. सर्विस अच्छी थी और खाना भी. अटेंडर बार-बार आकर पूछता रहा, और कुछ लेंगे सर? अंत में लंच के बाद जब प्लेट में सौंफ़ मिश्री लेकर आया तो लोगों की जेब झड़ाई शुरू हुई. मन में विचार आया कि ये किस बात की उगाही? क्या सरकारी मुलाजिमों को इस तरह का नाजायज काम शोभा देता है? लेकिन प्रत्यक्षतः कुछ कहने वाला माहौल नहीं था. इंस्पेक्टर साहब की श्रीमती जी शान से पचास का नोट थमा चुकी थीं. हमने भी लजाते हुए बिना नजरें मिलाए केवल बीस रुपये टिकाये और मुक्ति पाई.
(पहला भाग समाप्त, दो और बाकी)

13 comments:

Arvind Mishra said...

लगता है आज सूरज पश्चिम में निकला है -आफिस के लिए घर से बाहर निकलते समय पुष्टि भी हो जायेगी ! आप क्या लिख रहे हैं इससे ज्यादा हर्ष इस बात का है की Saturday, January 10, २००९ के बाद आप आज दिखे हैं जबकि मैं कब का आपकी बाट जोह रहा था -अब नियमित बने ! रही फुरसतिया की बात तो मैंने भी कुछ टटका उन्ही का सुमिरन करते लिखा है -आपका यात्रा वृत्तांत अब पूरा पढने जा रहा हूँ !
सुस्वागतम !

अनूप शुक्ल said...

जय हो! अरे धांस के लिखिये ! हमारी बात हो गयी है! कोई टोंकेगा नहीं। ये वाला लेख धांसू लगा। मन बार-बार ज्योति पाराशर और रजनी इसरानी में अटक रहा है लेकिन चूंकि टिपियाना भी है सो जबरियन इसे खैंच के टिप्प्णी बाक्स तक लाया हूं!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

लौट कर आने पर आप का स्वागत है।

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

स्वागत! ..क्या संयोग है कल मैंने दिनों बाद पोस्ट लिखी ..आज आपने ...खुसी हुई आपको देखकर ..अब नियमित ही रहें ..अब पोस्ट पढ़ती हूँ.

हाँ गूगल फ्लोवर वाला विजेट लगाइए जरा ब्लॉग में(ये अनुरोध है).

PD said...

सुस्वागतम.. दबा कर लिखिये.. हम पढ़ने को तैयार हैं.

नरेश सिह राठौङ said...

स्वागत है आपका, आप्ने दुबारा लेखन शुरू किया । आपका हिन्दी लेखन प्रेम बहुत है यह जल्दी नही छुटेगा । आशा है आप अब लगातार लिखेंगे व हमारे जैसे नये लोगों का मार्ग दर्शन भी करेंगे । अगली पोस्ट का इंतजार है ।

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

साढ़े छ फुट के शूरवीर को यूं घोना क्या उचित है? ये भारतकी सभ्यता-संस्कृति-व्यवस्था और न्याय के वाहक हैं। उनके लिये अपनी तनिक सी असुविधा को वर्णित करना ठीक नहीं है। :)
फिल्म वाले अंश पर टिप्पणी नहीं - वह समझने के लिये किसी विद्वान से पूछना होगा!
अन्य अंशों की प्रतीक्षा है।

Udan Tashtari said...

aa jao maidann main.

जितेन्द़ भगत said...

धमाकेदार पर्दापण, पोस्‍टर फाड़ के:)

yunus said...

जे तो फुरसतिया पोस्‍ट हो गई । लगे रहिए हम पढ़ रहे हैं ।

सागर नाहर said...

मजा आ रहा है, आप लिखते रहें बस।

अभिषेक ओझा said...

ये कहा क्या था जी आपने लड़कियों से?
बड़े दिनों बाद दिखे?

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

भूत भगावन जी, बहुत-बहुत बधाई।
आप तस्लीम चित्र-पहेली में लगातार दूसरी बार विजेता चुने गये हैं।

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