Wednesday, August 26, 2009

बोट क्लब, मल्होत्रा जी और १५ अगस्त पर डांस पे चांस (भोपाल यात्रा - ३)

रात भर रुक-रुक कर हल्की फ़ुहार पड़ती रही. खिड़की से ठंडी हवा के मस्त मद्धम झोंके आकर तन को हिलोरते रहे और भोर की पहली किरण के साथ जब निद्रा देवी की शरण से बाहर आये तो विगत दिवस की यात्राओं की थकान छू हो चुकी थी. रात मोबाइल को ड्यूटी पर तैनात करके सोये थे कि प्रातः छैः तीस पर याद से जगा दिया जाये मगर उसे सेवा का अवसर ही नहीं मिला और छैः बजे स्वतः ही आँख खुल गयी. (वस्तुतः दोनों आँखें एक साथ ही खुल गयी थीं पर लिखना एकवचन में ही पड़ रहा है. कुछ मुहावरों ने सच्ची अभिव्यक्तियों का रास्ता रोक रखा है. :)

१५ अगस्त, शनिवार, स्वतंत्रता दिवस

प्रातः ०७:०० बजे


आज का प्रोग्राम कुछ यूं था कि पहले एक परिचित के यहाँ पहुंचना था. उसके बाद सोचा था कि थोडा और शहर देख लेंगे. फ़िर दोपहर बाद २:४० की वापसी ट्रेन पकड़नी थी. सुबह ये भी ओवरकास्ट ही थी. आसमान में हल्के बादल थे जो शनैः-शनैः अपने और भी साथियों को इकट्ठा करते जा रहे थे. बारिश के आसार बनते दिख रहे थे. घर के बगीचे की ओर दृष्टि दौड़ाई तो कुछ मनोहर पौधों ने अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्शायी. किस्म-किस्म के पुष्प सुसज्जित पौधे. कुछ चित्र लिये बिना रहा नहीं गया. अगले कुछ दिन पीसी के डेस्क्टॉप पर यही फ़ूल-पौधे विराजेंगे.

भाई साहब सुबह जल्दी ही ऑफ़िस के लिये निकल लिये थे. झंडावंदन वगैरह होगा. हम तैयार शैयार होकर घर के सामने के गलियारे में टहल रहे थे. तभी नजर आया कि सामने के बड़े से स्कूली मैदान में कुछ बच्चे एकत्र हो रहे हैं, पन्द्रह अगस्त मनाने के लिये. मनभावन दृश्य थे. छोटे-बड़े सभी प्रकार के नौनिहाल राष्ट्रीय पर्व पर बड़े जोश से भरे हुए नजर आ रहे थे. भांति-भांति के रंगों वाली टी-शर्ट्स में बच्चे, इनमें से कुछ अपने हाथों में छोटे-छोटे तिरंगे लिये हुए, ऊँचे स्वर में देशभक्ति गीत गा रहे थे. देख कर लग रहा था कि कार्यक्रम के लिये लम्बी तैयारी करवाई गयी है. मैडम लोग भी उसी उत्साह के साथ जुटी थीं. इन सब को देख कर हमने भी अपने अंदर ऊर्जा का संचार होते महसूस किया. इतने में लगभग ९ बजने आ गये थे.




"मैने कहा, जैन साहब नहीं हैं तो आप ही उनकी हाजरी लगा दीजिये." पर हम स्कूली बच्चों के चित्र खींचने में व्यस्त थे, आवाज पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. वही वाक्य जस का तस दुबारा उच्चारित हुआ, इस बार थोड़े ज्यादा डेसीबल के साथ. देखा तो एक बुजुर्ग से सज्जन हमीं को पुकार रहे थे. (जैन साहब, भाई साहब के मकान-मालिक हैं और उक्त दिवस पर शहर से बाहर थे). सामने खूबसूरत से पार्क में कॉलोनी वासियों का स्वतंत्रता दिवस पर मिलन समारोह आयोजित था. आमंत्रण पाकर हम भी बाखुशी शामिल हो लिये.

एक लम्बे से डंडे में मोटी फ़ूल माला से ढंका और पतले से धागे से बंधा हुआ राष्ट्रीय ध्वज रखा था. आठ-दस कॉलोनीवासी बुजुर्ग और चार-पाँच बच्चे वहां पहले से मौजूद थे. सर्वप्रथम एक दुबले-पतले से सज्जन से हमारा नमस्कार, तत्पश्चात परिचय का आदान-प्रदान हुआ और उसके बाद बाकियों की भी हिम्मत खुल गयी. सवा नौ हो चुके थे. ज्ञान जी की भांति गुरु-गम्भीर से दिखने वाले एक सज्जन ने राय जाहिर की - "निर्धारित समय से पन्द्रह मिनिट ऊपर हो चुके हैं. मेरा ख्याल है अब कार्यक्रम प्रारम्भ कर देना चाहिये." दो - तीन लोगों ने तुरन्त अनुमोदन किया. हाल ही में अधेढा़वस्था से बुजुर्गियत के अहाते में दाखिला पाये एक सज्जन ने किसी चिड़चिड़े ब्लॉगर की भांति बड़बड़ाना शुरु कर दिया - "सब को अच्छे से जानकारी है. ऊपर से सर्कुलर भी घुमाया गया था. लेकिन लोग हैं कि आने को तैयार ही नहीं हैं. साल में दो बार ही मौका होता है, छब्बीस जनवरी और पन्द्रह अगस्त. लेकिन बिल्कुल मिलना-जुलना ही नहीं चाहते." कुछ ने हां में हां मिलाई और अन्य ने केवल हाथ-घड़ी की ओर निहार कर मौन सहमति की मुहर लगाई. एक कद्दावर व्यक्तित्व ने, जो कद-काठी से काफ़ी हद तक समीर जी की तरह नजर आ रहे थे, एक कदम आगे जाकर सलाह दी, "आगे से होना ये चाहिये कि बिना किसी बुलावे के सभी को समय से उपस्थित होना चाहिये. चाहे सर्कुलर पहुंचे अथवा नहीं." एक बार फ़िर सभी सहमत थे.

झंडे का डंडा जमीन में गाड़ दिया गया और झंडा गेंदे के सेहरे में मुंह ढांपे ऊपर की ओर उठ गया . सोसायटी के सबसे सीनियर सदस्य, मल्होत्रा जी को आमंत्रित किया गया कि वे आएँ और अपने कर-कमलों से धागा खींच कर झंडे को फ़हरायें. थोड़ी बहुत रस्मी ना-नुकुर के बाद बुजुर्गवार एक बार फ़िर तैयार हो गये. वे हौले-हौले झंडे की ओर बढ़ रहे थे कि तभी एक अतिउत्साही नौजवान ने इसे उनके प्रति अपनी श्रद्धा के प्रदर्शन का अच्छा अवसर समझ कर टिप्पणी छोड़ दी, "जब तक मल्होत्रा जी हम लोगों के बीच हैं, ये दायित्व तो उन्हीं का रहेगा. उसके बाद चाहे जो हो." अपनी जान में तो उसने मल्होत्रा जी का मान ही बढा़या था, पर मल्होत्रा जी पर इसका असर ये हुआ कि उनकी रीढ़ की हड्डी में अचानक दृढ़ता आ गयी और चाल में तेजी. किसी नवयुवक की सी चपलता से उन्होने रस्सी को खींच कर झंडे को हवा में फ़ड़फ़ड़ाने के लिये आजाद कर दिया. सब लोगों ने राष्ट्रगान शुरु कर दिया. बच्चों का स्वर सबसे ऊँचा था.

इस बीच पार्क की चारदीवारी फ़ांद-फ़ांद कर और भी कुछ लोग मजलिस में शरीक हो लिये थे. दुबले-पतले सज्जन ने, जिनसे हमारा सबसे पहले दुआ-सलाम हुआ था, और जो सबसे बड़ी गर्मजोशी से मिल रहे थे, झंडे के सामने जगह बनाई और बिना माइक के भी सभी को सुनाई देने योग्य बुलंद आवाज में कुछ कहना शुरु किया. ज्यादा लोग उनकी बातों में इण्ट्रेस्टेड नहीं लग रहे थे. इसे भांप कर उन्होंने औरों को भी बोलने का मौका देना शुरु किया. एक-एक कर चार-पाँच लोगों के नाम उन्होंने पुकारे. कुछ आगे आये, बाकियों ने जगह पर बैठे-बैठे सिर्फ़ हाथ जोड़ लिये. इसके बाद ईनाम का लालच देकर बच्चों को पुकारा गया और उनसे गीत, कविता आदि सुनाने को कहा गया. एक ने 'झंडा ऊँचा रहे हमारा' सुनाया, दूसरे ने 'वन्दे मातरम'. फ़िर फ़िल्मी देशभक्ति गीतों का नम्बर आया. 'भारत हमको जान से प्यारा है'. जल्दी ही स्टॉक खत्म हो गया. एक छोटी बच्ची ने, जो काफ़ी शरमा रही थी, मासूमियत से पूछा, "अंकल, 'डांस पे चांस मार ले' सुना सकती हूं?" स्वीकृति मिलते ही इंडियन आयडल स्टाइल में झूम-झूम कर गाना शुरु किया. इसके तुरंत बाद सभा समाप्त कर दी गयी.

हमें काफ़ी दूर जाना था. एक्टिवा उठाई और निकल पड़े. टू व्हीलर पर मौसम का पूरा आनंद लेने का इरादा था. मौलाना आजाद नेशनल इंस्टीट्यूट ऑव टेक्नोलॉजी (MANIT) के सामने से निकले तो फ़िर कुछ यादें तरोताजा हो आयीं. १९९२ में कॉलेज एडमिशन के समय काउंसलिंग हेतु यहां आना हुआ था. तब इसका नाम मौलाना आजाद कॉलेज ऑव टेक्नोलॉजी (MACT) होता था. मेन ऍन्ट्रेंस का गेट बड़ा शानदार बना दिया गया है अब तो. शहर का विस्तार होता जा रहा है. कोलार रोड पर दोनों ओर बड़ी-बड़ी इमारतें उठ आयी हैं. रिलायंस फ़्रेश का भी अच्छा स्टोर है. कुछ देर वहीं खरीदारी की.

१५ अगस्त, शनिवार

दोपहर ०१:०० बजे


परिचित के यहां से फ़ारिग होकर निकलते हुए यही वक्त हो चला था. पौने तीन की ट्रेन पकड़नी थी. पर लौटते हुए जब वीआईपी रोड से निकले तो एक नजर बोट-क्लब पर डाले बिना लौटने का मन नहीं हुआ. जा ही पहुंचे. क्या शानदार मौसम था, क्या अद्भुत नजारा. छुट्टी के दिन जनसैलाब उमढ़ा था या रोज का यही दृश्य होता है, पता नहीं. झील में पानी का स्तर काफ़ी ज्यादा था. बहुत सारे लोग परिवार सहित बोटिंग का आनन्द ले रहे थे. अभी भी बादल घिरे हुए थे और लग रहा था कि कभी भी बूंदा-बांदी प्रारम्भ हो सकती है. कुछ देर वहां बिताकर वापसी की राह पकड़ी. घर पहुंचते-पहुंचते दो बजने को आ गये थे. स्टेशन के लिये तुरंत निकलना होगा. लेकिन क्या पता था कि स्टेशन तक का सफ़र कितना लम्बा और मुश्किल होने वाला था.
(तीसरा भाग समाप्त, एक और बाकी)
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जाहिर सी बात है कि नाम बदले हुए हैं.

9 comments:

Arvind Mishra said...

झंडे में केशरिया रंग वाली पट्टी ऊपर ही थीं न ? लगता है चैक करना भूल गए !

Udan Tashtari said...

ये भी अजब रहा!

अनूप शुक्ल said...

फ़ूल, बच्चों और मैडमों के चलते फ़ोटू बहुत अच्छी लग रही हैं। विवरण मस्त! अब दूसरा भाग बांचने के लिये उलट-पुलट करेंगे। परेशान मती होना। और ये डा.अरविन्द मिसिरजी लगता है आपकी सटाई फ़ोटॊ ठीक से देखे बिना टिपिया दिये हैं। कुछ एक्शन लिया जायेगा इन पर या आजादी के मौके पर छोड़ दिया जायेगा। :)

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

रपट अच्छी लगी।
बधाई!

yunus said...

'तालों में ताल भोपाल ताल बाकी सब तलैंया' जे भी याद आया । और जे भी कि भोपाल के लाल परेड ग्राउंड पर हम पंद्रह अगस्‍त और छब्‍बीस जनवरी को अपने एक 'अंकल' के सौजन्‍य से जाते थे परेड वगैरह देखने ।

आप लगे रहिए हम पढ़ रहे हैं । फोटू-वोटू भी देख रहे हैं । कहने की जरूरत नहीं कि हम मुग्‍ध हैं जी ।

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

(वस्तुतः दोनों आँखें एक साथ ही खुल गयी थीं पर लिखना एकवचन में ही पड़ रहा है. कुछ मुहावरों ने सच्ची अभिव्यक्तियों का रास्ता रोक रखा है. :)

- कितना सही है ...विवरण रोचक रहा.

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

पर मल्होत्रा जी पर इसका असर ये हुआ कि उनकी रीढ़ की हड्डी में अचानक दृढ़ता आ गयी और चाल में तेजी. किसी नवयुवक की सी चपलता से उन्होने रस्सी को खींच कर झंडे को हवा में फ़ड़फ़ड़ाने के लिये आजाद कर दिया.
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वाह, बुजुर्ग का सम्मान शिलाजीतयुक्त होता है - रेनबेक्सी का रीवाइटल!
बढ़िया लगा वर्णन!

अर्शिया said...

Rochak sansmarad.
( Treasurer-S. T. )

Science Bloggers Association said...

Bahut kuchh nayaa jaanne ko mil raha hai.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

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