Monday, September 22, 2008

सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट के पन्नों से भारत के आगामी वामपंथी सुशासन की एक झलक

बात पुरानी है, मगर इतनी भी नहीं कि स्मृति पटल से ओझल हो सके, उम्र कम थी, पर इतनी भी नहीं कि कुछ समझ न आए. स्थान था बीजिंग, वही बीजिंग जहाँ इस साल ओलंपिक गेम्स की चकाचौंध हम सबने देखी. इसी शहर के एक मुख्य स्थान थेन आनमन चौक पर जून १९८९ में जो कुछ हुआ वो सारी मानवता की रूह कंपकंपा देने के लिए काफी है.

दूरदर्शन के समाचारों में वहां की तत्कालीन गतिविधियों की हल्की सी झलक देखने को मिलती थी. वैसे तो मीडिया सेंसरशिप के चलते पूरी और सच्ची तस्वीर कभी सामने नहीं आ सकी, पर जो कुछ भी थोड़ी बहुत जानकारी छिप छिपाकर चीन से बाहर आ पाती थी वही उसकी नीचता की पराकाष्ठा का भरपूर परिचय देती थी.

अभी भी आंखों के आगे है वो मंजर जो दूरदर्शन के समाचारों में दिखता था. हजारों लेबर एक्टिविस्ट्स, कॉलेज के छात्र छात्राएं और बुद्धिजीवी इकठ्ठा थे. सरों पर सफ़ेद पट्टियाँ बांधे हँसते गाते बच्चे. तालियाँ बजा बजा कर एक दूसरे का उत्साह बढाते. मन में उम्मीद की किरण कि शायद इस बार कुछ कदम उठाने को मजबूर कर ही देंगे भ्रष्टाचार के शिकंजे में जकदी हुई चायनीज कम्युनिस्ट पार्टी को किसी हद तक ही सही लेकिन लोकतंत्र की ओर. धीरे धीरे आन्दोलन फैल गया छोटे छोटे शहरों में. वर्षों से कुचली हुई आजादी की हसरत एक नई अंगडाई लेकर जाग उठी जनता के मन में. पूरी दुनिया साँस रोक कर देख रही थी जो थोडी बहुत जानकारी बाहर आ पाती थी उसे. हम भी देख रहे थे. बड़ा अनूठा दृश्य होता था. जवान उत्साह से भरे बच्चे-बच्चियां. रात-रात भर चौक पर अपनी जायज मांगों के लिए हठ करते. अभी भी आँखों के सामने हैं वो चेहरे.

फिर आई वो काली रात जब कम्युनिस्ट लीडरशिप ने महसूस किया कि बस इससे ज्यादा आज़ादी नही दी जा सकती इन भोले लोगों को. कुछ ही पलों में पचासों टेंक्स दौड़ने लगे बीजिंग कि सड़कों पर. मशीन गन लेकर दौड़ती सेना.

कुछ दृश्य तो अमर हो गए हैं. जैसे कि यह फोटोग्राफ जिसमें इक अनजान बहादुर वीरता से सामना कर रहा है बढ़ती आती चीनी (पढ़ें नीच) टेंक सेना का.

हजारों निहत्थे बच्चों को कुचल दिया गया या तो टेंक्स के नीचे या बिछा दिया गया गोलियों की बौछार से. लाल रंग से धुली हुई उन सड़कों के दृश्य अभी तक जेहन में बसे हुए हैं. इंडिया टुडे का वो अंक जिसमें ये फोटोग्राफ छपे थे लंबे समय तक झुरझुरी पैदा करता रहा.

पूरी घटना इस विकीपीडिया लिंक पर क्लिक करके जानें.

दो दिन बाद लीडरशिप का सेना अधिकारियों के लिए संदेश था:
शाबाश कामरेडों! आपने बहुत बढ़िया काम किया है.

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कुछ दिन पूर्व पुरानी किताबों के बक्सों को खंगालते हुए सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट (हिन्दी में रीडर्स डाइजेस्ट इसी नाम से प्रकाशित होती थी, और इसकी वार्षिक ग्राहकी हमारे यहाँ ली हुई थी) का सितम्बर १९८९ का अंक हाथ में आ गया. थेन आनमन चौक की घटनाओं की पूरे विश्व में हुई भर्त्सना और दुस्साहसी चीन की नीचता की कहानी एक बार फ़िर से आंखों के सामने घूम गयी.

सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट (सितम्बर १९८९) के ये दस पेज एक पीडीऍफ़ फाइल के रूप में डाउन लोड करने के लिए यहाँ क्लिक करें. (२ MB)

यू ट्यूब पर इस घटना के कई वीडियो मौजूद हैं. एक मर्मस्पर्शी और झकझोर देने वाला वीडियो मैं यहाँ दे रहा हूँ. बेहद शानदार गीत है. अवश्य सुनिए. केवल ऑडियो सुनना चाहें तो वो भी सुन सकते हैं. ऑडियो गीत की डाउन लोड लिंक भी साथ में दे रहा हूँ.


video

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या केवल ऑडियो गीत सुनें




A song was heard in china
in the city of beijing
in the spring of 1989
you can hear the people sing
and it was the song of freedom
that was ringing in the square
the world could feel the passion
of the people gathered there
all children bodies on the square

for many nights and many days
waiting in the square
to build a better nation
was the song that echoed there
we are china's children
we love our native land
for brotherhood and freedom
we are joining hand-in-hand
all children bodies on the square

then came the peoples army
with trucks and tanks and guns
the government was frightened
of their daughters and their sons
but in square was courage
and a vision true and fair
the army of the people would not
harm the young ones there
all children bodies on the square

on june of 3rd in china
in the spring of 89
an order came from high above
and passed on down the line
the soldiers opened fire
young people bled and died
the blood of thousands on the square
that lies can never hide
all children bodies on the square

for four more days of fury
the people faced the guns
many thousand slaughtered
when their grizzly work was done
they quickly burnt the bodies
to hide their coward shame
but blood stick up on their hands
and darkness on their names
all children bodies on the square

there are tears that flow in china
for the children that are gone
there is fear and there is hiding
for the killings still goes on
and the iron hand of terror
can buy silence for today
but the blood that lies upon square
cannot be washed away
all children bodies on the square.



सिंगूर, कुन्नूर, नंदीग्राम तो बहुत छोटे स्तर के थेन आनमन हैं. इन्तजार कीजिये दिल्ली में पूर्ण वामपंथी शासन का. सच्चा (चाइना स्टायल) लोकतंत्र तभी देखने को मिलेगा. बांग्लादेशी वोटों के चलते वो दिन दूर नहीं.

18 comments:

गौरव सोलंकी said...

मैं सर्वोत्तम के पुराने अंक तलाश रहा हूं। कहाँ मिल सकते हैं?

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

फोटो बढ़िया है.. काफ़ी मेहनत से लिखी गयी पोस्ट है.. बधाई

Suresh Chiplunkar said...

कम्युनिस्टों का असली चेहरा ऐसे ही उजागर करते रहिये, बधाई… बढ़िया लिखा है

Gyandutt Pandey said...

मुझे याद नहीं आ रहा कि रीडर्स डाइजेस्ट का थियानमेन स्क्वायर वाला लेख मैने अंग्रेजी में पढ़ा या सर्वोत्तम में। पर वह प्रति अब जरूर मेरे पास नहीं है।
यह पीडीएफ में प्रस्तुत करने को बहुत धन्यवाद।
मैं आपकी प्रशंसा अधिक करूंगा तो विद्वत्जन कहेंगे कि आत्मवंचना कर रहा हूं! :-)

Shiv Kumar Mishra said...

ये हुई शानदार पोस्ट. पीडीऍफ़ के लिए धन्यवाद.
यू आर ए .....बस्टर.

हूतूतू लाऊ लाऊ said...

घोस्ट बस्टर जी
अब आपके ब्लाग पर आने का मन नहीं करता.

ज्ञानबांचू खुचुर खुचुर said...

सही लिखा है मित्र
मैं आपकी प्रशंसा अधिक करूंगा तो विद्वत्जन कहेंगे कि आत्मवंचना कर रहा हूं!

Udan Tashtari said...

सही है-बेहतरीन लिखा!!

कम से कम इस ब्लॉग पर ज्ञान जी वाला डर अभी मुझे नहीं. :)

जितेन्द़ भगत said...

nice information

Tarun said...

haan woh bahut sharmnaak ghatna thi, ise phir se readers digest se nikaal ke ek sahi post ki shakal di... Behtarin

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

Very well written article - Thank you !

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

इस रोचक और सत्‍य के करीब पोस्‍ट को पढ कर अच्‍छा लगा।

Lovely kumari said...
This comment has been removed by the author.
''ANYONAASTI '' said...

बड़ा पुराना घाव उधेड़ दिया , धर्म को समाज की अफीम कहने वाले साम्यवादियों के लिए साम्यवाद ही धर्म (अफीम ) हो गया है ,विशेष रूप से भारत में ,जहाँ वास्तविक सिद्धान्ती को (दादा सोमनाथ : माननीय लोक सभा अध्यक्ष ) देश की संविधानिक परम्परा का पालन करने पर पुरा जीवन पार्टी को देने वाले को पार्टी से निकाल दिया जाता है ,जो किसी से उस की जीवन भर की कमाई लूट लेने जैसा ही है |

arun prakash said...

आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आया और चाइना के शाषकों या कहे सोषकों की याद तजा करा दी आपने ये लाल झंडे वालों का इतिहास ही रक्तरंजित रहा है भारत में बलात बैलट के जरिये सत्ताशीन वामपंथी अपने दादा चीन की राह पर चल कर ही जनभावनाओं को कुचल रहे हैं केन्द्र की मजबूरियों का इन्होने खूब फायदा उठाया है

राजेन्द्र अवस्थी said...

बहुत बढ़िया....अच्छा लिखा।

Inderpal SIngh said...

Main bhi yar
1985 ka ank
Jis main
Rail yatri kutta
Lampo ki storie hai
Mile to batana
08427259007(punjab)

Inderpal SIngh said...

Main bhi yar
1985 ka ank
Jis main
Rail yatri kutta
Lampo ki storie hai
Mile to batana
08427259007(punjab)

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