Saturday, September 27, 2008

मैं जिंदगी से आँख चुराता चला गया, बस मौत को गले से लगाता चला गया.

कॉलेज का द्वितीय या शायद तृतीय वर्ष था. चार - पाँच मित्र एम् ई वान् वल्केन्बर्ग की नेटवर्क एनालसिस बुक की किसी समस्या में उलझे हुए थे. शर्त थी कि कौन पहले सही हल ढूंढ निकालता है. प्रश्न कुछ ज्यादा ही कठिन रहा होगा, इसलिए ब्रेन स्टोर्मिंग सेशन कुछ लंबा खिंचता जा रहा था. अचानक महफिल में कहीं से एक सिगरेट नमूदार हुई और दो - तीन मित्रों के बीच घूमने लगी. मेरे जैसे नॉन स्मोकर्स के लिए इस धुएँ को इतने नजदीक से बर्दाश्त कर पाना कठिन होता है. तो मैंने इशारे में ही सामान्य विरोध दर्ज किया.

ठीक सामने बैठे मित्र ने एक गहरा कश लेते हुए मुझे कुछ देर घूरा, फ़िर चालू हुए, "देख मेरे भाई! जितना जल्दी हो सके इस आदत को अपना ले, वरना बड़ा नुक्सान उठाएग तू."

दूसरे मित्र ने विद्वत्तापूर्वक संशोधन किया, "और अगर इसका आनंद लेना न भी सीखे तो कम से कम औरों को झेलना तो सीख ही ले."

इन लती लोगों से बहस का कोई मूड नहीं था. तो मैंने सर को जल्दी जल्दी हिला कर बात वहीं समाप्त करने की चेष्टा की. "ठीक है यार, कोशिश करता हूँ. मगर अभी समय लगेगा. तब तक के लिए उस दूसरी बेंच पर बैठने जा रहा हूँ."

सिगरेट के महत्त्व से दूसरा परिचय तब हुआ जब पहला पहला जॉब ज्वाइन किया. मेरे डिपार्टमेंट में शायद ही कोई ऐसा सीनियर हो जो ये शौक ना रखता हो. एक दिन उनमें से एक, जो मुझ पर कुछ विशेष स्नेह रखते थे, ने एक दिन प्रेमपूर्वक समझाया, "भाई तुम अगर स्मोक नहीं करते तो कोई बात नहीं. लेकिन जेब में एक पेकेट जरूर रखा करो. जब मौका मिले, पेश कर दो. सबके साथ मिक्सप होने में बड़ी मदद मिलेगी."

कमाल की बात है. इंसान जिस काम को ख़ुद भला नहीं मानता, उसमें दूसरों को शरीक करने का कितना ख्वाहिशमंद रहता है. खैर मुझे ये हुनर ना आना था, ना आया. ये बात अलग है कि मैंने साथियों से परिचय बढ़ाने के दूसरे बेहतर तरीके तलाश लिए.

खैर, वो तो पुरानी बातें हुईं. स्मोकिंग को लेकर सुकून भरी ताजा ख़बर ये है कि सरकार आने वाले २ अक्टूबर से सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषेध का सख्ती से पालन करवाने को लेकर कमर कस रही है. हालांकि इस बारे में नियम तो कोई ढाई-तीन साल पहले ही बनाया जा चुका था, पर कई लूपहोल्स की वजह से कभी ठीक से लागू नहीं किया जा सका. इस बार संशोधित रूप में इसे ज्यादा प्रभावशाली रूप से लागू किए जाने की योजना है.

नए नियमों के तहत शॉपिंग मॉल्स, सिनेमा हॉल्स, सभी पब्लिक और प्राइवेट कार्यस्थल, होटल्स, डिस्कोथेक्स, केंटीन, कॉफी हाउस, पब्स, बार्स, एरपोर्ट लौंज एवम् रेलवे स्टेशनों पर भी स्मोकिंग पर पाबंदी रहेगी. स्मोकर्स अगर चाहें तो सड़क पर अपनी तलब मिटा सकते हैं, या फ़िर अपने घरों में, लेकिन अन्य सार्वजनिक स्थलों पर नहीं. सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान करते पकड़े जाने पर २०० रुपए के जुर्माने का प्रावधान है जिसे आगे १००० रुपए तक बढाया जा सकता है.

पुराने नियम में निजी कार्यस्थलों पर विशेष स्मोकिंग जोन्स की अनुमति थी जहाँ स्मोकर्स देव आनंद साहब की स्टाइल में जिंदगी का साथ निभाने के भ्रम में जिंदगी को धुएँ में उडाने के लिए स्वतंत्र थे. लेकिन इस छूट का ग़लत इस्तेमाल होते देखकर अब सभी निजी कार्यस्थलों पर स्मोकिंग पर रोक लगा दी गयी है. जो कम्पनियां कर्मचरियों को स्मोकिंग की अनुमति देंगी, उनपर प्रति स्मोकर ५००० रुपए का जुर्माना होगा.

जाहिर है सिगरेट कम्पनियों को इसपर आपत्ति होनी है. ITC (इंडियन टोबेको कम्पनी) ने इसके खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायलय में याचिका दायर की है. इसके अलावा इंडियन होटल असोसियेशन ने भी अदालत का दरवाजा खटखटाया है. लेकिन खुशी की बात है कि इस बार सरकार बैन को लेकर ज्यादा गंभीर नजर आ रही है और इस तरह की तमाम अड़ंगेबाजी की संभावनाओं को भाँपते हुए उसने सुप्रीम कोर्ट में एक अपील दायर कर बैन को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं की सुनवाई केवल उच्चतम न्यायलय में ही करने की अपील की है.

दूसरी तरफ़ आम जनता की और से सरकार के इस कदम का जबरदस्त स्वागत हुआ है. मुंबई, दिल्ली, चेन्नई और कोलकाता में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार ९२% लोगों ने धूम्रपान निषेध के लिए कड़े क़दमों का स्वागत किया है

फ़िर भी इस बात को लेकर एक बड़ी बहस छिडी हुई है. बैन के पक्षधर और विरोधी तमाम तरह के तर्क दे देकर मैसेज बॉक्स और फोरम्स के पन्नों पर पन्ने रंगे जा रहे हैं. अपन तो बस इस बैन को जल्द से जल्द और सख्ती से लागू किए जाते देखना चाहते हैं. एक कम्युनिटी के रूप में स्मोकर्स के लिए अपने मन में जरा भी इज्जत नहीं. क्योंकि,

१. ये जानते हैं कि धूम्रपान इनके स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है. मगर इन्हें परवाह नहीं.
२. इन्हें पता है कि ये इनके घर के अन्य सदस्यों, जो स्मोक नहीं भी करते, के लिए भी बुरा है, मगर ये आदत से मजबूर हैं.
३. स्मोकिंग से होने वाली विषैली गैसों का उत्पादन पूरे विश्व के पर्यावरण के लिए नुक्सान ही पहुँचाने वाला है, होता रहे इनकी बला से.
४. सार्वजनिक स्थानों पर किसी स्मोकर को धुंआ उडाते देखने का दृश्य अभद्रता का खुला प्रदर्शन लगता है.

यहाँ ये जिक्र करना भी सही होगा कि दुनिया के तमाम देशों में पब्लिक स्मोकिंग पर पूर्ण या आंशिक निषेध है. फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका के कई राज्य, बेल्जियम के अलावा पिछले वर्ष ब्रिटेन में भी संसद द्वारा क़ानून बनाकर इसकी मनाई कर दी गयी है. वहां भी इस नियम के लागू किए जाने को लेकर तमाम तरह की हाय तौबा मचाई गयी थी, संदेह जाहिर किए गए थे, लेकिन स्मोकिंग पर ये बैन न सिर्फ़ लागू हुआ बल्कि बड़ा इफेक्टिव भी साबित हुआ है.

और अंत में बाची करकरिया का ये कथन मुझे बड़ा सही लगता है, "स्मोकिंग मार्क्सवाद की तरह है. युवावस्था में आपको इसका अनुभव करना चाहिए. लेकिन आप महामूर्ख होंगे अगर समय रहते इससे बाहर नहीं निकल आते."

Monday, September 22, 2008

सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट के पन्नों से भारत के आगामी वामपंथी सुशासन की एक झलक

बात पुरानी है, मगर इतनी भी नहीं कि स्मृति पटल से ओझल हो सके, उम्र कम थी, पर इतनी भी नहीं कि कुछ समझ न आए. स्थान था बीजिंग, वही बीजिंग जहाँ इस साल ओलंपिक गेम्स की चकाचौंध हम सबने देखी. इसी शहर के एक मुख्य स्थान थेन आनमन चौक पर जून १९८९ में जो कुछ हुआ वो सारी मानवता की रूह कंपकंपा देने के लिए काफी है.

दूरदर्शन के समाचारों में वहां की तत्कालीन गतिविधियों की हल्की सी झलक देखने को मिलती थी. वैसे तो मीडिया सेंसरशिप के चलते पूरी और सच्ची तस्वीर कभी सामने नहीं आ सकी, पर जो कुछ भी थोड़ी बहुत जानकारी छिप छिपाकर चीन से बाहर आ पाती थी वही उसकी नीचता की पराकाष्ठा का भरपूर परिचय देती थी.

अभी भी आंखों के आगे है वो मंजर जो दूरदर्शन के समाचारों में दिखता था. हजारों लेबर एक्टिविस्ट्स, कॉलेज के छात्र छात्राएं और बुद्धिजीवी इकठ्ठा थे. सरों पर सफ़ेद पट्टियाँ बांधे हँसते गाते बच्चे. तालियाँ बजा बजा कर एक दूसरे का उत्साह बढाते. मन में उम्मीद की किरण कि शायद इस बार कुछ कदम उठाने को मजबूर कर ही देंगे भ्रष्टाचार के शिकंजे में जकदी हुई चायनीज कम्युनिस्ट पार्टी को किसी हद तक ही सही लेकिन लोकतंत्र की ओर. धीरे धीरे आन्दोलन फैल गया छोटे छोटे शहरों में. वर्षों से कुचली हुई आजादी की हसरत एक नई अंगडाई लेकर जाग उठी जनता के मन में. पूरी दुनिया साँस रोक कर देख रही थी जो थोडी बहुत जानकारी बाहर आ पाती थी उसे. हम भी देख रहे थे. बड़ा अनूठा दृश्य होता था. जवान उत्साह से भरे बच्चे-बच्चियां. रात-रात भर चौक पर अपनी जायज मांगों के लिए हठ करते. अभी भी आँखों के सामने हैं वो चेहरे.

फिर आई वो काली रात जब कम्युनिस्ट लीडरशिप ने महसूस किया कि बस इससे ज्यादा आज़ादी नही दी जा सकती इन भोले लोगों को. कुछ ही पलों में पचासों टेंक्स दौड़ने लगे बीजिंग कि सड़कों पर. मशीन गन लेकर दौड़ती सेना.

कुछ दृश्य तो अमर हो गए हैं. जैसे कि यह फोटोग्राफ जिसमें इक अनजान बहादुर वीरता से सामना कर रहा है बढ़ती आती चीनी (पढ़ें नीच) टेंक सेना का.

हजारों निहत्थे बच्चों को कुचल दिया गया या तो टेंक्स के नीचे या बिछा दिया गया गोलियों की बौछार से. लाल रंग से धुली हुई उन सड़कों के दृश्य अभी तक जेहन में बसे हुए हैं. इंडिया टुडे का वो अंक जिसमें ये फोटोग्राफ छपे थे लंबे समय तक झुरझुरी पैदा करता रहा.

पूरी घटना इस विकीपीडिया लिंक पर क्लिक करके जानें.

दो दिन बाद लीडरशिप का सेना अधिकारियों के लिए संदेश था:
शाबाश कामरेडों! आपने बहुत बढ़िया काम किया है.

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कुछ दिन पूर्व पुरानी किताबों के बक्सों को खंगालते हुए सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट (हिन्दी में रीडर्स डाइजेस्ट इसी नाम से प्रकाशित होती थी, और इसकी वार्षिक ग्राहकी हमारे यहाँ ली हुई थी) का सितम्बर १९८९ का अंक हाथ में आ गया. थेन आनमन चौक की घटनाओं की पूरे विश्व में हुई भर्त्सना और दुस्साहसी चीन की नीचता की कहानी एक बार फ़िर से आंखों के सामने घूम गयी.

सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट (सितम्बर १९८९) के ये दस पेज एक पीडीऍफ़ फाइल के रूप में डाउन लोड करने के लिए यहाँ क्लिक करें. (२ MB)

यू ट्यूब पर इस घटना के कई वीडियो मौजूद हैं. एक मर्मस्पर्शी और झकझोर देने वाला वीडियो मैं यहाँ दे रहा हूँ. बेहद शानदार गीत है. अवश्य सुनिए. केवल ऑडियो सुनना चाहें तो वो भी सुन सकते हैं. ऑडियो गीत की डाउन लोड लिंक भी साथ में दे रहा हूँ.




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या केवल ऑडियो गीत सुनें




A song was heard in china
in the city of beijing
in the spring of 1989
you can hear the people sing
and it was the song of freedom
that was ringing in the square
the world could feel the passion
of the people gathered there
all children bodies on the square

for many nights and many days
waiting in the square
to build a better nation
was the song that echoed there
we are china's children
we love our native land
for brotherhood and freedom
we are joining hand-in-hand
all children bodies on the square

then came the peoples army
with trucks and tanks and guns
the government was frightened
of their daughters and their sons
but in square was courage
and a vision true and fair
the army of the people would not
harm the young ones there
all children bodies on the square

on june of 3rd in china
in the spring of 89
an order came from high above
and passed on down the line
the soldiers opened fire
young people bled and died
the blood of thousands on the square
that lies can never hide
all children bodies on the square

for four more days of fury
the people faced the guns
many thousand slaughtered
when their grizzly work was done
they quickly burnt the bodies
to hide their coward shame
but blood stick up on their hands
and darkness on their names
all children bodies on the square

there are tears that flow in china
for the children that are gone
there is fear and there is hiding
for the killings still goes on
and the iron hand of terror
can buy silence for today
but the blood that lies upon square
cannot be washed away
all children bodies on the square.



सिंगूर, कुन्नूर, नंदीग्राम तो बहुत छोटे स्तर के थेन आनमन हैं. इन्तजार कीजिये दिल्ली में पूर्ण वामपंथी शासन का. सच्चा (चाइना स्टायल) लोकतंत्र तभी देखने को मिलेगा. बांग्लादेशी वोटों के चलते वो दिन दूर नहीं.

Saturday, September 20, 2008

... मेरो दर्द न जाने कोय. एक बेचारे पुरूष की दर्द भरी आह, मगर सुनेगा कौन?

लोग अक्सर महसूस करते हैं, और गाहे बगाहे थोड़ी हिम्मत जुटाकर शिकायत भी कर ही लेते हैं कि ब्लॉग जगत में किसी भी मुद्दे पर सहानुभूति का रुख महिलाओं की और कुछ ज्यादा ही झुका हुआ नजर आता है. बेचारे पुरुषों को अपनी बात ठीक से रखने का मौका ही नहीं मिलता. बस हुल्लड़बाजी में उनकी आवाज दब कर रह जाती है. अब इसमें कितनी सच्चाई है वो तो हम कहने से बचना ही उचित समझते हैं, पर ये जरूर है कि ब्लॉग भी समाज का ही दर्पण है. जो स्थिति विभिन्न मुद्दों पर हमारे आसपास की वास्तविक दुनिया की नजर आती है, कमोबेश वही सब कुछ यहाँ ब्लॉग के आभासी संसार में भी देखने को मिलता है.

बेटियों के ब्लॉग की तर्ज पर बेटों का ब्लॉग भी बनता है, नयापन समझ कर शुरू-शुरू में थोड़ा स्वागत भी होता है, लेकिन बहुत जल्दी ही टाँय-टाँय फिस्स हो जाता है. 'कहाँ से आया किधर गया वो' जैसी हालत हो जाती है. नारी सम्बंधित किसी मुद्दे पर किसी भी किस्म की चर्चा छेड़ने वाले भले ही कितने ही सज्जन व्यक्ति क्यों न हों, और कितनी ही ईमानदारी से अपनी बात क्यों न रखें, बहुत जल्दी लोगों के पत्थरों का निशाना बन जाते हैं. हाय, क्या किया जाए, ज़माने का दस्तूर ही ऐसा है.

अपना कुछ ऐसा ही दर्द बयाँ कर रहे हैं श्री रघुनाथ प्रसाद 'गुस्ताख'. ये एक दहेज़ पीड़ित पति हैं. इस अभिव्यक्ति में और भी कई पीडाएं मुखर हुई हैं इनकी, पर क्या कोई इनकी शिकायत पर कान धरने वाला होगा इस ब्लॉग जगत में? मुझे तो बिल्कुल नहीं लगता. बिल्कुल नहीं.

कैसे तुमको लिखूं नमस्ते!

हे पत्नी के पूज्य पिताजी, कैसे तुमको लिखूं नमस्ते.
उल्लू सीधा किया आपने, मुझको अच्छा उल्लू फांसा,
सोने-चांदी के गहने कह, दे डाला सब पीतल-कांसा.
सिक्के जितने दिए दान में, एक-एक सब निकले खोटे,
रजत-थाल फौलादी निकले, एल्म्युनियम के निकले लोटे.
सिलेसिलाए कपड़े लगते, मांगे हुए, महा बेढंगे,
कुर्ते बिल्कुल चोली जैसे, पतलूनें ढीलीं ज्यों लंहगे.

पहने जिनको देख अनारी, नारी जान फब्तियां कसते,
हे पत्नी के पूज्य पिताजी, कैसे तुमको लिखूं नमस्ते.
चूसे हुए आम के जैसी, साठ साल की गाय पुरानी,
अजी दूध की बात छोड़िये, थन से नहीं निकलता पानी.
खटिया साढ़े तीन टांग की, सौ सालों के शाल-दुशाले,
जिनमें पले हुए हैं लाखों खटमल, आफत के परकाले.
खिड़कीदार मसहरी जिसको 'नाईट क्लब' समझे हैं मच्छर,
तकिये को तकिया बोलूँ मैं या चंदन घिसने का पत्थर.

अध्-गंजी हो गयी खोपडी, जिसके ऊपर घिसते-घिसते,
हे पत्नी के पूज्य पिताजी, कैसे तुमको लिखूं नमस्ते.
सडी सायकिल झनझन करती, घण्टी नहीं बजाये बजती,
दो पुरुषों का भार कभी जो, महासती सा सहन न करती.
घड़ी पुरानी आदम युग की, दिन भर जो चाभी ही खाती,
जिसे देखकर बिना बताये, लोग समझ जाते खैराती.
'सेकेण्ड-हैण्ड' टायर के जूते, वह भी शत-प्रतिशत जापानी,
तलवे जिनके भीतर रहते, बाहर रहती उँगली कानी.

आप 'दशम ग्रह' के फेरे से छूट गए बिल्कुल ही सस्ते,
हे पत्नी के पूज्य पिताजी, कैसे तुमको लिखूं नमस्ते.
वह भी कोई ससुरालय है, जहाँ नहीं सलहज या साली?
यह तो बिल्कुल बात वही है, सुरा-पात्र हो लेकिन खाली.
आप ब्याह से पहले श्रीमन बनते राजस्थानी भामा,
किंतु रचा कर ब्याह सुता का, द्वापर के बन गए सुदामा.
आप 'स-सुर' हैं, तानसेन हैं, मेरे तो लय-सुर हैं मध्यम,
मुझे जमाई कहने वाले, आप भला क्या यम् से हैं कम?

जब भी आप यहाँ आते हैं, दो-दो हफ्ते नहीं खिसकते,
हे पत्नी के पूज्य पिताजी, कैसे तुमको लिखूं नमस्ते.
'बिन घरनी घर भूत का डेरा' उल्टी हुई आपकी कथनी,
घर मेरा बनवास बन गया, आते ही भुतनी सी पत्नी.
सूर्पणखा जैसी नखवाली, चंडी-मुख, सुरसा सी काया,
जिसे आप अपनी कहते थे, वह 'मछेन्द्र' की निकली माया.
ढोल बजाकर, शोर मचाकर, आप बन गए कन्यादानी,
मैं पत्नी का पकड़ पुछल्ला, बीच भंवर में पीता पानी.

ले लें कन्यादान आप यह, जिसे दिया था हँसते-हँसते,
हे पत्नी के पूज्य पिताजी, कैसे तुमको लिखूं नमस्ते.

मैं मर-मर कर खींचा करता हूँ यह घर की भैंसागाड़ी,
ऊपर से वह हांका करती, कहकर जांगरचोर अनाड़ी.
अब अपना ऋण आप संभालें, मुझ गरीब का छोडें पल्ला,
ब्याज रूप में सौंप रहा हूँ, तीन लल्लियाँ दो-दो लल्ला.
ले लें इनको वरना जिस दिन अन्तर का वैराग्य जगेगा,
उस दिन यह दामाद आपका, पहन लंगोटी दूर भगेगा.

वर्षों से मैं समझाता हूँ, मगर आप क्यों नहीं समझते,
हे पत्नी के पूज्य पिताजी, कैसे तुमको लिखूं नमस्ते.

- रघुनाथ प्रसाद 'गुस्ताख'

Thursday, September 18, 2008

तैयार रहिये अपने ब्लॉग पर टिप्पणियों की बरसात के लिए

ब्लॉग जगत में टिप्पणियों की महत्ता से सभी परिचित हैं. एक ब्लॉगर के लिए पाठकों की (पढिये दूसरे ब्लॉगरों की, विशुद्ध पाठक कौन धरे हैं यहाँ?) टिप्पणियों का क्या महत्त्व है, ये किसी से छुपा नहीं है. कई लोग तो खुलकर स्वीकार करते हैं पोस्ट लिखने के तुरन्त बाद से ही उन्हें टिप्पणियों का इन्तजार लग जाता है. हर दस-पन्द्रह मिनिट के बाद अपने चिट्ठे पर जाकर झांकते हैं कि कोई टीपने आया अथवा नहीं. कुछ अन्य लोग जो अपनी टिप्पणी लालसा के प्रदर्शन में जाहिर तौर पर हिचकते हैं, अपने टिप्पणी बक्से के संदेश में उन्होंने भी 'टिप्पणियों का स्वागत है' टाइप वाक्यांश लगा रखे हैं. आख़िर कौन नहीं चाहता कि उसे ज्यादा से ज्यादा टिप्पणियां मिलें?

लेकिन टिप्पणियां पाना इतना भी आसान काम नहीं. इसके लिए बहुत मेहनत की दरकार होती है. पहले तो ये कि आप को अच्छा और रोचक लिखना आना चाहिए. किसी ऐसे विषय पर आपकी पकड़ होनी चाहिए जिसमें लोगों की रूचि हो. दूसरे ये भी कि अपनी पोस्ट (और चिट्ठे) का प्रचार करना आना चाहिए, अब कोई फ़िल्म कितनी भी अच्छी क्यों न बनी हो, बिना पब्लिसिटी के हिट हो सकती है क्या? बिल्कुल नहीं. तो आप अपनी पब्लिसिटी कैसे करते हैं? इसका सबसे आसान तरीका है, दूसरों के चिट्ठों पर टिपियाना. अगर अगले में थोड़े भी सोशल एटिकेट्स होंगे, तो भागा हुआ आएगा आपका टिप्पणी ऋण चुकाने.

लेकिन बात सुनने में आसान लगने के बावजूद ऐसी है नहीं. आख़िर एक दिन में आप कितनी पोस्ट पढ़ सकते हैं? बीस, पच्चीस. फ़िर कितने पर टिपिया सकते हैं? क्या आपके चिट्ठे की सेहत के लिए इतनी संख्या काफी है? जवाब है, बिल्कुल नहीं. ऊपर से लोग भी समझदार हो चले हैं. अगर आप बिना पढ़े टिपिया दिए, तो झट से ताड़ जाते हैं. पलट कर टिपियाना तो दूर की बात उल्टे और लोगों से आपकी शिकायत करते हैं. अब क्या किया जाए?

परेशान होने की कोई आवश्यकता नहीं. अब घोस्ट बस्टर लेकर आए हैं, आपकी सभी टिप्पणी सम्बंधित समस्याओं का आसान और प्रभावशाली निदान: स्वतः टिप्पणी रचक (ऑटो कमेन्ट जनरेटर) सॉफ्टवेयर, "टॉप-टीप". इस की मदद से आप जब चाहें, जिस भी ब्लॉग पर चाहें टिपियाते रह सकते हैं, बिना किसी पोस्ट को पढ़े. बस आपको अपना कंप्यूटर (और ये सॉफ्टवेयर) चालू रखना होगा. जी हाँ, यही है आज के हर समझदार ब्लॉगर की पहली पसंद, अब आपके लिए भी उपलब्ध. पिछले दो वर्षों से इसके बीटा वर्जन की टेस्टिंग चल रही थी. कुछ वोलंटीयर्स (इन्हें तो आप जानते ही हैं) के अनुभवों के आधार पर हमने इसे और बेहतर बनाने का कार्य किया है. आज ही इसका ट्रायल वर्जन डाउनलोड कीजिये और ख़ुद आजमा कर देखिये.

"टॉप-टीप" कैसे कार्य करता है?

मुख्य रूप से इसके तीन मोड ऑफ़ ऑपरेशंस हैं.

१) फास्ट मोड (कम समय में ज्यादा लाभ) -

इसमें आपको पहले से तैयार एक टिप्पणी बैंक दिया जाता है. आपको करना सिर्फ़ ये होता है कि चिट्ठे के URL के साथ अपनी मनपसंद की कुछ टिप्पणियों को असोसिएट कर दें. जब भी इस चिट्ठे पर कोई नयी पोस्ट आयेगी, तो आपकी चुनी हुई टिप्पणियों में से कोई भी एक टिप्पणी उस पोस्ट पर चेंप दी जायेगी.

इस मोड का इस्तेमाल किन चिट्ठों पर करें?

ये मोड उन चिट्ठों के लिए बेहतरीन उपाय है जहाँ केवल एक ही तरह की पोस्ट लिखी जाती हैं. जैसे कि कविताओं-कहानियो वाले चिट्ठे, फिल्मी/गैर फिल्मी गीतों के पौड्कास्ट वाले चिट्ठे, एकरसता से भरपूर तथाकथित संवेदनशील पोस्ट पेलने वाले चिट्ठे वगैरह वगैरह, जहाँ पोस्ट मैटर लगभग हमेशा ही एक जैसा ही रहता है.

इस मोड का लाभ -

गति. इस मोड में आप प्रति मिनिट दो से तीन टिप्पणियां कर सकते हैं, चूंकि टिप्पणी पहले से ही तैयार रहती हैं. यदि आपके पास समय कम है तो ये मोड़ बड़े काम का है. केवल पन्द्रह मिनिट में आप पैंतीस-चालीस पोस्ट्स पर टिप्पणियां भेज सकते हैं.

कुछ सेम्पल एप्रोक्सिमेट टिप्पणियां:

१. वल्लाह! क्या बात है.
२. लाजवाब लिखा है आपने.
३. इन मुद्दों के प्रति आपकी संवेदनशीलता अद्भुत है.
४. मन को कहीं भीतर तक छू गयी ये रचना.
५. काफी कुछ सोचने पर मजबूर करती है आपकी ये पोस्ट.

२) इफेक्टिव मोड (धीमा परन्तु ज्यादा प्रभावकारी) -

यदि आप दूसरे ब्लॉगर पर अपनी टिप्पणी का ज्यादा गहरा प्रभाव छोड़ना चाहते हैं तो एक बिल्कुल व्यक्तिगत किस्म की टिप्पणी के लिए यह मोड बिल्कुल उपयुक्त है. इस मोड में हमारा सॉफ्टवेयर न्यूरो फजी लॉजिक का इस्तेमाल करते हुए ऐसी कमाल की टिप्पणी रचता है कि आप ख़ुद उसे पढ़कर दंग रह जायेंगे. इसके लिए ये पोस्ट को पढ़कर उसमें से कुछ की-वर्ड्स छांटता है. पूरी पोस्ट का खाका समझने के बाद ये अपनी टिप्पणी रचता है. उस पोस्ट पर आए अन्य कमेंट्स तो नजर में रखे ही जाते हैं, कभी-कभी आवश्यकता होने पर पोस्ट में से या किसी पिछले कमेन्ट में से कोई वाक्य उद्धृत भी करता है.

कहाँ प्रयोग करें?

जिन ब्लॉग्स पर विषय की विविधता होती है, और जहाँ गंभीर किस्म का चिंतन चलता है. ऐसे ब्लॉग्स पर केवल सतही टिप्पणी आपके मूल उद्देश्य (यानी रिटर्न टिप्पणी पाना) की पूर्ति नहीं कर सकती. तो आपको वहां इस मोड को काम में लेना चाहिए. इसे वहां भी परख सकते हैं जहाँ केवल एक ही किस्म की पोस्ट होती हैं, जैसे कि राजनीतिक विश्लेषण या व्यंग्य, लेकिन नामी ब्लॉगरों द्वारा. वहां भी इन बड़े विद्वानों के बीच केवल एक लाइन की टिप्पणी देंगे तो कोई आपको नोटिस भी नहीं करेगा. अगर रिटर्न टिप्पणी की गारंटी चाहिए तो आपको अपना बुद्धि कौशल दिखाना ही पड़ेगा.

इस मोड के लाभ-हानि:

लाभ तो जाहिर ही हैं. आपकी विद्वत्ता और जानकारियों की धाक जमेगी. आपके ब्लॉग पर ज्यादा ट्रैफिक आएगा. हानि केवल यह है कि एक टिप्पणी में तीन से पाँच मिनिट का समय लगता है. इस प्रकार केवल बीस-पच्चीस टिप्पणियों में ही घंटे भर से ज्यादा समय लगेगा. आपको अपना कंप्यूटर ऑन रखना होगा. हलाँकि आप चाहें तो इस दौरान कोई किताब पढ़ सकते हैं या कोई भी अन्य काम कर सकते हैं.

सेम्पल टिप्पणियां:

इस मोड की टिप्पणियां पोस्ट पर आधारित होती हैं. डिटेल में समझाने के लिए यहाँ पोस्ट को भी देना पड़ेगा, और कुछ गलतफहमियां खड़ी हो सकती हैं. इसलिए कोई सेम्पल नहीं दे पा रहे हैं. आप स्वयं सॉफ्टवेयर में ही टेस्ट करके देखें.

३) स्पेशल मोड (एक अलग अप्रोच) -

इस मोड की टिप्पणियों का पोस्ट से कोई खास लेना-देना नहीं होता. वे इस बात पर निर्भर करती हैं कि उस ब्लॉगर से आपके कैसे व्यक्तिगत सम्बन्ध हैं और उस ब्लॉगर की पिछली पोस्ट्स पर आप क्या कमेन्ट देते रहे हैं. इस स्पेशल मोड में किसी भी चिट्ठे के प्रति आप तीन लेवल सेट कर सकते हैं: सपोर्ट, अपोस या न्यूट्रल. आपके सेट किए गए लेवल के आधार पर हमारा अत्याधुनिक और इंटेलिजेंट सॉफ्टवेयर अपने आप तर्क-वितर्क पूर्ण टिप्पणियां चुन कर उन्हें पोस्ट पर चिपका देगा. आपका उद्देश्य पूरा हो जायेगा.

अभी हाल ही में हमने अपने उत्पाद में एक और जबरदस्त फीचर को शामिल किया है जिसे हमने
नाम दिया है 'हवा का रुख'. अगर आप चाहें तो सैटिंग्स को इस प्रकार एडजस्ट कर सकते हैं कि आपकी टिप्पणी उस लेख पर आपसे पहले आयी टिप्पणियों का ही अनुगमन करेगी. इसके लिए हमारा शानदार सॉफ्टवेयर इस बात की पड़ताल करता है कि आपसे पहले की टिप्पणियों का स्वर किस दिशा में है. विरोध और समर्थन को प्रतिशत में तौलते हुए वह आपकी टिप्पणी तैयार करता है. पचास प्रतिशत से ज्यादा टिप्पणियां जिस दिशा में हों, उसी स्वर में आपकी भी टिप्पणी लिख दी जाती है. लेकिन किसी पोस्ट पर इस फीचर का उपयोग करने के लिए आवश्यक है कि उस पोस्ट पर कम से कम सात टिप्पणियां पहले से मौजूद हों.

तो देखा आपने कितने काम का है हमारा ये स्वतः टिप्पणी रचक सॉफ्टवेयर, "टॉप-टीप". तो अब इन्तजार कैसा? तुंरत इसका फुली फंक्शनल ट्रायल वर्जन डाउनलोड कीजिये और ख़ुद आजमा कर देखिये.

ट्रायल वर्जन लिमिटेशन: हर दसवीं टिप्पणी के अंत में ये शब्द जोड़ दिए जायेंगे:
"यह टिप्पणी "टॉप-टीप" सॉफ्टवेयर की मदद से की गयी है."
एक बार आप सॉफ्टवेयर को हमारे यहाँ रजिस्टर करवा लेते हैं तो आपको एक कोड भेज दिया जायेगा, जिसे "टॉप-टीप" में भरकर आप इस नेग से निजात पा सकते हैं.
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पुनःश्च: हमारा सॉफ्टवेयर अभी वर्ड वेरिफिकेशन की दीवार को फांदने में सक्षम नहीं है. ऐसे चिट्ठों पर आपको मेन्युअली ही कमेन्ट करने होंगे. इस असुविधा को टरकाने के लिए लोगों से अनुरोध करते रहें कि वे वर्ड वेरिफिकेशन को अपने चिट्ठों से तुंरत हटा लें. (वैसे हम इसका कोई परमानेंट उपाय ढूँढने में लगे हुए हैं. अगले वर्जन में इसे भी शामिल कर लिए जाने की उम्मीद है.)

Monday, September 15, 2008

कोई चुप कराओ इस दुष्ट को. ये हमारी दूकान उजाड़ देगा.

कोसी की बाढ़ की विनाशलीला देखी होगी आपने. हेलीकाप्टर से राहत सामग्री गिराई गयी. लोग दो-दो, तीन-तीन दिन से भूखे, आगे फ़िर कब सरकारी मदद आए, कुछ पता नहीं. ऐसे में जिसके हाथ जितना लग सके, झपट लो. पड़ोसी का ख्याल करोगे तो अपने घर-परिवार को कैसे संभालोगे? सब जायज है. सही-ग़लत के फेर में पडोगे, तो भूखे मरोगे. जिनमें ज्यादा दम थी, जिन्होंने आगे जगह बना ली, ज्यादा रोटी-पानी बटोर ले गए.

हजार साल की गुलामी के बाद मुल्क आजाद हुआ. संसाधनों पर अपना कब्जा हुआ. जिन्हें पहले मौका मिला, जिसके बाजुओं में दम था या जिसकी बुद्धि काम कर गयी, उसने जितना बना, हथिया लिया. आगे भी घर-परिवार की दुकानदारी चलती रहे, इसके लिए कोड ऑफ़ कंडक्ट तैयार हो गया. असहज करने वाले प्रश्न न पूछे जाएँ. तर्क-वितर्क से परहेज किया जाए. मूर्खतापूर्ण भावनाओं में लोगों को उलझाये रखा जाए भले ही उनकी आंखों पर पट्टी बांधनी पड़े. और लोग भी कौन? पीढियों से गुलाम, अपनी अस्मिता कब की गुमा चुके रीढविहीन धिम्मी. कोई मुश्किल काम नहीं इन मूर्खों को बरगलाना. बस दुकानदारी चल निकली और चलती रही, आज भी जोर-शोर से चल रही है.

ऐसे में अगर कोई तर्क की बात करे, आपकी असलियत उजागर करे, तो ये आपकी जमी-जमाई दुकान के लिए बड़ा खतरनाक साबित हो सकता है. अगर लोग दिमाग से सोचने लगेंगे, तो फ़िर आपकी क्या गत होगी? तो लोगों को बस अपने झूठ के मकड़जाल में उलझाये रखो.

- 'सिमी' क्या है?
=> कुछ नहीं जी. आइये 'मदनमोहन' जी का ये अद्भुत गीत सुनते हैं.

- ये नकली करेंसी कहाँ से आ रही है? इसके पीछे कौन है और उसका क्या उद्देश्य है?
=> पाकिस्तान और हिंदुस्तान एक ही माँ की दो संतानें हैं. सीमा के दोनों और एक जैसे दिल धड़कते हैं. प्यार ही प्यार है.

- जम्मू में क्या हलचल है? इन लोगों की क्या समस्याएँ हैं जो इतना रोष दिख रहा है?
=> कश्मीर से सेना हटाकर उसे पाकिस्तान के हवाले क्यों नहीं कर दिया जाता?

- गोधरा में क्या हुआ?
=> आपने फैज़ साहब की नयी नज़्म सुनी? आज ही पौड्कास्ट पर चढ़ाई है.

- ये जगह जगह धमाके कर मासूमों के खून से होली क्यों खेली जा रही है? इसके पीछे आख़िर कौन है और उसका क्या उद्देश्य है?
=> "उनके प्रभाव में आकर कई नौजवानों ने अपने आप को खुदकूश बम बनाकर शहीद कर दिया."

अरे बस करो. कोई चुप कराओ इस नीच को. ये उल्टे सीधे प्रश्न पूछकर सारा धार्मिक सौहार्द्य बिगाड़ देगा. (और हमारी दुकानदारी भी)

Saturday, September 13, 2008

क्या क्या राज खोलती है आपकी ब्लॉगर प्रोफाइल?

कुछ लोग इस भ्रम में लगते हैं कि ब्लॉगर प्रोफाइल पर उनके जीमेल अकाउंट क्रियेशन की तारीख अंकित होती है. मैं इस भ्रम का कुछ निवारण करने की कोशिश करता हूँ.

सबसे पहली बात तो ये समझ लिया जाए कि जीमेल अकाउंट और ब्लॉगर अकाउंट दो एकदम अलग चीजें हैं. केवल जीमेल पर अकाउंट बना लेने भर से आपका ब्लॉगर प्रोफाइल पेज क्रिएट नहीं हो जाता.
(बड़े आकार में अलग टैब में देखने के लिए तस्वीरों पर क्लिक कीजिये.)
ये है जीमेल का मेन पेज. यहाँ से आप अपना मेल अकाउंट बना सकते हैं.
और ब्लॉगर का मेन पेज ये रहा. अगर आप अपना ब्लॉग बनाना चाहते हैं, या सिर्फ़ ब्लॉगर प्रोफाइल ही बनाना चाहते हैं, (जी हाँ ये भी सम्भव है कि आप बिना ब्लॉग बनाये सिर्फ़ ब्लॉगर आईडी ही बना लें, हम अभी आगे देखेंगे) तो आपको यहाँ से बनाना पड़ेगा.

ब्लॉग बनाने की प्रक्रिया तीन चरणों में पूरी होती है. शुरुआत होती है मेन पेज पर "Create Your Blog Now" लिंक पर क्लिक करके.
१) इस चरण में आपसे एक ईमेल आईडी और पासवर्ड माँगा जाएगा. अगर आपके पास पहले से जीमेल आईडी है तो आप उसे यहाँ भर सकते हैं. जरूरी नहीं है कि जीमेल पर ही आपकी आईडी हो. कोई भी अन्य पहले से तैयार ईमेल आईडी (जैसे याहू या हौटमेल पर) भी इस्तेमाल की जा सकती है. आगे बढ़ें.
२) अब इस दूसरे कदम पर आपसे अपने ब्लॉग का नाम और URL चुनने के लिए कहा जाएगा. भरें और आगे बढ़ें.
३) एक ब्लॉग टेम्पलेट चुनने के लिए कहा जाएगा. ब्लॉगर कुछ टेम्पलेट उपलब्ध करवाता है. इनमें से चुना जा सकता है. बाद में आप चाहें तो इसे बदल भी सकते हैं.
४) यहाँ से आगे बढ़ने पर "Your Blog has been created" का संदेश आ जाता है.

यहाँ आपका ब्लॉग निर्माण पूर्ण हो जाता है. अब अगर आप ब्लॉगर के मेन पेज पर ईमेल और पासवर्ड भर कर लोगिन करते हैं तो आप सीधे अपने डेशबोर्ड पर पहुंचेंगे.
यहाँ डेशबोर्ड पर आप देख सकते हैं कि आपका ब्लॉगर प्रोफाइल बन चुका है. आप प्रोफाइल को देख सकते हैं, उसे एडिट भी कर सकते हैं. डेशबोर्ड पर ही आपके ब्लॉग का नाम भी दिखेगा.
डेशबोर्ड पर प्रोफाइल के लिंक पर क्लिक करके आप ब्लॉगर प्रोफाइल के पेज पर पहुँचिये. ध्यान दीजिये कि प्रोफाइल पर क्रियेशन का महीना और वर्ष नजर आ रहे हैं. साथ ही आपके ब्लॉग का नाम भी.

तो हमने देखा कि आपको अपना ब्लॉग (या सिर्फ़ ब्लॉगर प्रोफाइल) बनाने के लिए ब्लॉगर के मेन पेज से शुरू करना होता है. सिर्फ़ जीमेल या कोई अन्य आईडी होने भर से आपका ब्लॉगर प्रोफाइल नहीं बन जाता. आपके ब्लॉगर प्रोफाइल के पेज पर भी वही तारीख अपने आप अंकित हो जाती है जब आपने अपना ब्लॉग (या ब्लॉगर प्रोफाइल) बनाया. इसे तय करना या बदलना किसी भी तरह आपके हाथ में नहीं है.

अब मान लीजिये कि आपने काफी पहले से सिर्फ़ अपना जीमेल अकाउंट बना रखा है, ब्लॉगिंग के बारे में आप कुछ नहीं जानते. तो अगर आज आप अपना ब्लॉग बनाने जाते हैं तो आपको ऊपर दर्शाए गए सभी चरणों से गुजरना होगा. तभी आपका ब्लॉगर प्रोफाइल का पेज बनेगा. और इस पेज पर आज ही की तारीख अंकित होगी. आपकी जीमेल आईडी कितनी पुरानी है, इससे कोई मतलब नहीं.

अगर आपके पास ब्लॉगर अकाउंट नहीं है, सिर्फ़ जीमेल आईडी है तो ब्लॉगर के मेन पेज से लोगिन करने का प्रयास आपको इस पेज पर पहुँचा देगा, जहाँ आपसे पहले ब्लॉगर अकाउंट बनाने के लिए कहा जाएगा. माने फ़िर से ऊपर वाली प्रक्रिया के सभी चरण.


कुल मिलाकर बात ये कि अगर आपका प्रोफाइल पेज, आपके ब्लॉगर अकाउंट का निर्माण का समय "अक्टूबर २००७" दिखाता है तो इसका अर्थ ये है कि "अक्टूबर २००७" में आपने या तो अपना ब्लॉग बनाया है या कम से कम ब्लॉगर आईडी बनाई है. इसके लिए आपको ब्लॉगर के मेन पेज पर जाना ही पड़ा होगा और इसीलिये दोनों ही स्थितियों में आप ये दावा नहीं कर सकते कि "मार्च २००८" तक ब्लॉग क्या होता है, आपको ये जानकारी ही नहीं थी.
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अब कुश भाई की बात ली जाए. इनका कहना है कि इन्होने अपना ब्लॉग "फरवरी २००७" में बनाया है और अपनी ब्लॉगर प्रोफाइल "सितम्बर २००६ में. इसीलिये इनकी प्रोफाइल पर "सितम्बर २००६" दिख रहा है. अब इसमें कोई अजीब बात नहीं है. हालांकि अधिकतर लोग ब्लॉगर आईडी के साथ ही साथ ब्लॉग भी बनाते हैं, पर ये बिल्कुल सम्भव है कि ब्लॉग बनाये बिना सिर्फ़ ब्लॉगर आईडी बना लिया जाए. ऐसा कई लोग करते हैं. वजह ये है कि कई ब्लॉग्स पर अनोनिमस कमेन्ट करने का ऑप्शन नहीं होता. अगर आप वहां कमेन्ट देना चाहते हैं तो आपको किसी आईडी की आवश्यकता पड़ेगी. लेकिन बात यही है कि आईडी बनाने के लिए भी आपको ब्लॉगर पर जाना ही होगा, और ऐसे में आपकी ये बात स्वीकार नहीं की जा सकती कि आप ब्लॉग के बारे में कुछ नहीं जानते.

कैसे बनायें ब्लॉगर आईडी बिना ब्लॉग बनाये?

आसान है. दरअसल ब्लॉग बनाने के तीन चरणों के दौरान आपकी ब्लॉगर प्रोफाइल पहले चरण में ही बन जाती है. अब दूसरे पेज पर पहुँचने के बाद (जहाँ आपसे ब्लॉग का वांछित नाम और URL पूछा जाता है) अगर आप पेज बंद करके बाहर आ जायें तो आपकी ब्लॉगर आईडी (और प्रोफाइल पेज) तो तैयार हो चुके होते हैं पर ब्लॉग नहीं.

अब अगर आप ब्लॉगर मेन पेज से लोगिन करते हैं तो अपने डेशबोर्ड पर पहुँच जायेंगे.
डेशबोर्ड कुछ ऐसा दिखेगा. ध्यान दीजिये कि प्रोफाइल पेज का लिंक दिख रहा है पर ब्लॉग नहीं है. इस बारे में सूचना भी है कि अभी आप किसी ब्लॉग के लेखक नहीं हैं. पर आपकी प्रोफाइल तैयार है.
प्रोफाइल पेज पर भी उसके क्रियेशन की तारीख दिखेगी, पर ब्लॉग का नाम नहीं क्योंकि वो अभी तक बना ही नहीं है.

तो ये है सारी कहानी. कहानी का सार? यही कि "अक्टूबर २००७" में ब्लॉग बनाया जाए या सिर्फ़ ब्लॉगर आईडी, ब्लॉगिंग के विषय में जानकारी के बिना नहीं हो सकते. और इस तरह ये कथन भी सरासर झूठ साबित होता है कि "२ मार्च २००८" का रविवारीय अमर उजाला किसी के लिए ब्लॉग जगत की जानकारी लेकर आया.
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अब एक बात और. ब्लॉगर आईडी और प्रोफाइल कब बने ये तो प्रोफाइल पेज पर अंकित हो जाता है, पर कोई ब्लॉग वास्तव में कब बना, ये पता करने का कोई तरीका नहीं है. पोस्ट की तारीख कुछ साबित नहीं करती कि वो पोस्ट वास्तव में कब लिखी गयी है. आप आज चाहें तो किसी भी बैक डेट में पोस्ट लिखकर पोस्ट कर दें. वो ब्लॉग आर्काइव में उसी पुरानी तिथि में अंकित हो जायेगी. इसी तरह आप पुरानी पोस्ट्स को मिटा भी सकते हैं.

Thursday, September 11, 2008

दुआओं में भी क्या कमाल का असर होता है. मान गए.

ताजा और मुख्य ख़बर ये है कि लोगों की दुआएं रंग लाईं और अनुराग अन्वेषी जी के मानसिक स्वास्थ्य में सुधार के लक्षण देखे गए. कल तक ज्ञानदत्त पाण्डेय जी पर अनर्गल आरोप लगा रहे अनुराग जी बाद में सिटपिटाते हुए अपने कहे से मुकरने का प्रयास करते पाये गए. लेकिन कमान से निकले तीर और जबान से निकली बात की तरह ही की-बोर्ड से निकली टिप्पणी भी कभी वापिस लौटती है क्या? वो तो सभी ब्लॉगर्स के अवलोकन के लिए टिप्पणी दीर्घा में सदा के लिए सुशोभित हो गयीं हैं. (माने जब तक अनुराग जी इन टिप्पणियों को मिटा नहीं देते तब तक के लिए).

जरा क्रम से इन टिप्पणियों का अवलोकन किया जाए:

टिप्पणी क्रमांक: एक
स्थान: घोस्ट बस्टर ब्लॉग
समय: १० सितम्बर, 11:28 AM (IST)

अनुराग अन्वेषी said...
अरे मेरे प्यारे भूत दा। बहुत तिलमिला गए आप तो। मेरे राग को बेसुरा और बेसुराग ही बना डाला। तो प्यारे भूत दा, मैं सुरागों की बात तो करता ही नहीं, सुराग वह तलाशें जिन्हें सूराख नजर नहीं आती। राग यह पसंद नहीं तो मैं रेलगाड़ी की छुक-छुक तो सुना नहीं सकता हूं। जिसकी शायद आपको आदत सी पड़ गई है। घाट घाट का पानी आपने पीया है या नहीं, यह तो नहीं पता पर लगता है जैसे इलाहाबाद के घाट का पानी जरूर पीया है। (इसका भी कोई सबूत मेरे पास नहीं है, इसलिए अब सबूत मत मांगने लगना) और अंत में मुझे खूब पता है कि घोस्ट बस्टर वर्चस्व की लड़ाई वाले दौर की पैदाइश नहीं है। इसीलिए 'ज्ञान''देनेवालों' से एक निवेदन,मेरे लिखे से यह समझ लें कि पता होते हुए भी घोस्ट का आवरण उतारने की मुझे जरूरत नहीं। जो आवरणों में रहना चाहता है मुझे उसे सामने लाकर क्या हासिल होना है।

टिप्पणी क्रमांक: दो
स्थान: रख्शंदा ब्लॉग
समय: १० सितम्बर, 11:34 AM (IST)

Anonymous said...
रक्षंदा जी देखिये आपके जरा प्रतिवाद पर घोस्ट बस्टर जी कितना पगला कर बौखलायें हैं और क्या झूठ पर झूठ छाप रहे हैं इन्हें इतना टाइम हैं तो भड़ास पर जा के ढुंढ लें जानकारी की कब कब छपी है नहिं तो अपने दोस्त यशवंत जी से पूछ लें शर्म तो इनको आयेगी नहीं, कुश ने कहा, लवली ने कहा की आप हैं, लेकिन फिर भी बकवास किये जा रहे हैं इसी तरह की बकवास अभय के बारे में की, और दावे दे दे के कहा की मैं अपना विवेचन लाउंगा, बकवास करते वक्त सालिम रहे लेकिन तर्क पेश करने के बजाय पीछे हट गये घोस्ट बस्टर एक खुन्नसी बकवासिया है जो अपनी असलियत छिपा कर दूसरों के साफ दामन पर कीचड़ उछालता फिर रहा है, लेकिन जल्द ही इसकी असलियत उजागर होने वाली है क्योंकि अब चिट्ठाजगत के बहुत लोगों को पता है कि यह असल में कौन है,


टिप्पणी क्रमांक: तीन
स्थान: घोस्ट बस्टर ब्लॉग
समय: १० सितम्बर, 11:35 AM (IST)

अनुराग अन्वेषी said...
और भूत दा, दुमछल्ला तो छूट ही गया। वह भी लीजिए, प्रगति तो आपकी देख रहा हूं इसलिए कहता हूं लेमनचूस नहीं, ले-मन-चूस।

ये कमेन्ट ज्ञानदत्त जी की १० सितम्बर की पोस्ट "प्रगति का लेमनचूस" की तरफ़ इशारा करते हुए है. इससे ज्यादा साफ़-साफ़ और क्या कह सकते थे ये? लेकिन इनकी हरकत ब्लॉग जगत के सामने रख दिए जाने के बाद कैसे खिसियाये हैं, ये भी देखिये.


टिप्पणी क्रमांक: चार
स्थान: घोस्ट बस्टर ब्लॉग
समय: १० सितम्बर, 04:07 PM (IST)

अनुराग अन्वेषी said...
बधाई हो भूत दा, मैंने किसी का कोई नाम नहीं लिया। पर आपके यहां जिनका नाम मेरे हवाले से उछाला जा रहा है, मेरी प्रतिक्रिया के बाद उन्हीं की प्रतिक्रिया है आपके इस ब्लॉग पर। उन्हें तो इसका अहसास ही नहीं हुआ, पर आपको पता नहीं कैसे उनका नाम सूझ गया? वैसे आपको अपनी पहली पोस्ट तो जरूर याद होगी। न हो तो उसका अंश मैं यहां दे दूं 'एक दिन 'दैनिक भास्कर' में हिन्दी ब्लॉग्स पर लेख पढ़ा. पढ़ कर भूल भी गए पर थोडी सी उत्सुकता तो बढ़ी. दो नाम याद रहे जो उसमें आए थे, शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पाण्डेय. तीन-चार दिन बाद थोडी फुरसत के समय इन नामों को गूगल पर सर्च करने बैठे और एक पूरी नयी दुनिया नजर आयी. थोड़ा सा प्रयास करने के बाद हिन्दी के सारे फॉण्ट लोड कर लिए और फिर फायरफॉक्स और ओपरा में भी हिन्दी ब्लॉग्स ठीक से नजर आने लगे.' तो मेरे प्यारे भूत दा, आपको खुश होना चाहिए कि आपने जिनका आभार माना वह अब आपके पक्ष में खड़े हैं।

वैसे आपको जहां जो साबित करना हो, कर दो। आप मुझे भूत कहोगे तो मैं भूत नहीं हो जाऊंगा, ठीक वैसे ही कि मैं आपको भविष्य कहूं तो भी आप भविष्य नहीं हो सकते। जारी रखें आप। मजे के लिए एक सवाल पूछ रहा हूं सच बताना. आप भूत हो या भूतनी? मैं तो पाठ कर रहा हूं भूत पिशाच निकट नहीं आवै...

अनुराग जी, सारा ब्लॉग जगत जानता है कि आपने किसका नाम लिया है. लेकिन इस तरह के अनर्गल आरोप बिना किसी तर्क के जड़ दिए जाएँ तो कोई भी समझदार और सच्चा इंसान आपकी बुद्धि पर तरस खाकर उसे हंस कर उपेक्षित ही करेगा. यही ज्ञानदत्त जी ने किया है. आप कह रहे हैं कि उन्हें इसका अहसास ही नहीं हुआ. शिवकुमार जी का आपको जवाब में लिखा कमेन्ट बता रहा है कि ज्ञान जी को अहसास नहीं हुआ या वे इसे आपकी मूढ़ता समझकर इग्नोर कर गए, जैसा कि अपेक्षित भी है.

अब जरा इसकी तुलना मेरी स्थिति से की जाए. मेरे शक जाहिर करने के जवाब में गालियों से भरपूर कैसी तिलमिलाती हुई पोस्ट सामने आयी. अगर मेरी बात सच्चाई से दूर होती तो ऐसा ओवर रिएक्शन क्यों होता? इसे हंस कर टाला जा सकता था. है कोई सोचने वाला?

मैंने अपने शक के साथ कारण भी गिनाये. कोई मेरे शक की वजहों को काटने वाला सामने नहीं आया, पर मुझे बिना वजह गरियाने वालों की कमी नहीं रही. घोस्ट बस्टर का मर्सिया पढने वालों की भीड़ लग गयी. आज जब अनुराग जी, ज्ञान जी को इस कदर अपमानित कर रहे हैं तो ये सब लोग कहाँ हैं? दोहरे मापदंड के स्वामी ये सब धिम्मी किस कौने में छुपे बैठे हैं? जब अनुराग अन्वेषी बिना किसी सबूत के ज्ञान जी जैसे वरिष्ठ और सर्व सम्माननीय चिट्ठाकार पर यूँ कीचड उछाल रहे हैं तो कोई सामने आकर विरोध क्यों नहीं करता? और जब मैं सारे सबूत देते हुए भी एक अनजान ब्लॉगर के बारे में एक छोटा सा शक जाहिर करता हूँ तो मुझे कोसने वालों की भीड़ लग जाती है. ये दोगलापन क्यों?
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अपनी सफाई देने के प्रयास में रख्शंदा जी से कुछ ऐसी बातें निकल गयी हैं जो किसी बड़े घोटाले की ओर इशारा कर रही हैं और जिनका जवाब देना उन्हें मुश्किल पड़ रहा है. इनका कहना है (और ये बात दुबारा दुहराई गयी है) कि ब्लॉग जगत के बारे में  जानकारी इन्हें "मार्च २००८" के अमर उजाला से मिली और उसके बाद इन्होने भड़ास के यशवंत जी को फोन करके भड़ास से जुड़ने का कार्य किया. तभी इन्होने अपना ब्लॉग भी बनाया. लेकिन इनकी ब्लॉगर प्रोफाइल बता रही है कि इनका ब्लॉग "अक्टूबर २००७" का बना है. फ़िर ये झूठ क्यों बोल रही हैं? है कोई पूछने वाला?

रचना सिंह जी ने इनकी बात को डिफेंड करने की कोशिश की है. उनका कहना है कि अगर कोई व्यक्ति आज केवल जीमेल अकाउंट बना ले और ब्लॉग कुछ महीने बाद बनाये तो उसकी प्रोफाइल पर पुरानी तारीख ही दिखेगी, जबकि ब्लॉग निर्माण बाद का हुआ होगा.

ये बात बिल्कुल असंभव है, रचना जी. मैं अगली पोस्ट में आपको पूर्ण विस्तार से बतलाता हूँ कि क्यों. आपकी और भी शंकाओं का समाधान करना शेष है. जल्दी ही.

Wednesday, September 10, 2008

अनुराग अन्वेषी जी का बेसुरा(ग) अन्वेषण

अपडेट: १० सितम्बर २००८, ०१:१५ दोपहर बाद

तेजी से बदलते घटनाक्रम में दो नयी घटनाएँ जुड़ गयी हैं. पहली तो ये कि कुछ नाटकीय टिप्पणियों के माध्यम से अनुराग अन्वेषी जी ने अपने दिमागी संतुलन के खो जाने की ओर इशारा किया है. इन्होने कहा है कि घोस्ट बस्टर के नाम से दरअसल श्री ज्ञानदत्त पाण्डेय जी लिख रहे हैं. नीचे इनकी टिप्पणियां देखिये और इनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना कीजिये. कुछ ऐसी ही टिप्पणी ये रख्शंदा जी के ब्लॉग पर भी लिख आए हैं.

दूसरी बात यही है कि रख्शंदा जी के ब्लॉग पर अनाम टिप्पणियां (जिनका जिक्र पिछले अपडेट में किया गया है) देने वाले यही अनुराग अन्वेषी जी हैं, इसका पर्दाफाश हो गया है. अपनी नयी टिप्पणी में कोई भी तर्क और मेरे किसी भी सवाल का जवाब देने में ये पूरी तरह विफल रहे हैं. पर इसके बावजूद इनकी भाषा देखिये और प्रिंट मीडिया के गिरते स्तर पर एक बार फ़िर अफ़सोस कीजिये. वहां भी ये ज्ञानदत्त जी की ओर साफ़ इशारा कर रहे हैं.

इनकी तर्क क्षमता देखिये. इन्होने फ़रमाया कि अमर उजाला में २००७ में भड़ास पर कई लेख छपे थे. जब इन लेखों के लिंक मांगे तो क्या कह रहे हैं:
"इन्हें इतना टाइम हैं तो भड़ास पर जा के ढुंढ लें जानकारी की कब कब छपी है नहिं तो अपने दोस्त यशवंत जी से पूछ लें"
जब आप किसी बात की जानकारी दे रहे हैं तो सबूत देना तो आपकी जिम्मेदारी बनती है अनुराग जी, न कि ये पाठक का काम हुआ कि वो लिंक ढूंढता बैठे. चलिए फ़िर भी मैंने भड़ास को अच्छी तरह सर्च किया और मुझे ऐसी कोई भी पोस्ट २००७ की पोस्ट्स में नहीं मिली. अगर कोई ढूंढ कर बता सके तो मैं आभारी रहूँगा.

अब मैं पूछता हूँ. जब मैंने रख्शंदा की आईडी पर शंका जताई (बाकायदा कारण बताते हुए) तो मुझे इतना जलील किया गया. (डॉ. अमर कुमार जी और दिनेशराय द्विवेदी जी की टिप्पणियां देखी जा सकती हैं). आज अनुराग अन्वेषी, ज्ञानदत्त जी जैसे वरिष्ठ और सम्माननीय ब्लॉगर पर खुले आम बिना किसी तर्क के ये घिनौना आरोप लगा रहे हैं तो क्या इनकी भी ख़बर लेने वाला कोई है? या ब्लॉग जगत केवल धिम्मियों की बस्ती बनकर रह गया है?

मैं बिना तर्क के कोई बात नहीं करता. तो अंत में इस बात का भी सबूत पेश कर दूँ कि रख्शंदा जी के अनाम शुभचिंतक टिप्पणीकार अनुराग अन्वेषी जी ही हैं. जरा मेरे ब्लॉग पर अनुराग जी की इस टिप्पणी को देखें, और रख्शंदा जी के ब्लॉग पर इस अनाम टिप्पणी को. एक ही भाषा, एक ही संगीन आरोप और टिप्पणी पोस्ट करने का समय. ११:३४ AM IST वहां और ११:३५ AM IST यहाँ.

है कोई दिमाग से सोचने वाला?

अपडेट: १० सितम्बर २००८, १०:३० प्रातः

एक और काबिले गौर घटनाक्रम कल से घट रहा है. कोई जनाब बार-बार रक्षंदा के ब्लौग पर कमेंट्स में उन्हें ज्यादा जवाब न देने की नसीहत दे रहे हैं. ये कहकर कि आपसे कोई स्पष्टीकरण नहीं माँगा जा रहा है, बस चुप रहिये. ये बहुत समझदारी की सलाह है. क्योंकि जितना ज्यादा अपने बारे में सफाई दी जायेगी, शक की वजहें उतनी ही ज्यादा बढ़ती जायेंगी. अनजाने में कोई न कोई संदेहास्पद बात आपसे निकल जाने का डर बना रहता है.

कमाल की बात तो ये है कि इस संकट की घड़ी में एक (घोषित रूप में) महिला का साथ देने का पुनीत कर्तव्य निभाने वाले ये सज्जन अपनी ख़ुद की पहचान छुपाकर अनाम कमेन्ट कर रहे हैं. भाई हमारे जैसे दुष्टों का तो समझ में आता है, पर आपके जैसे शरीफ लोग भला क्यों अपने नाम से सामने आकर बात नहीं करते? क्या घोटाला है? इस पूरी कॉन्सपिरेसी में कहीं आप भी तो शामिल नहीं?

एक और मूर्खतापूर्ण तर्क से इन्होंने ब्लॉग जगत को बरगलाने की चेष्टा की है. जब रख्शंदा ने ख़ुद साफ़-साफ़ कहा है कि अमर उजाला के रविवार के परिशिष्ट में पढ़कर उन्होंने भड़ास के बारे में जाना, (रविवारीय परिशिष्ट ०२ मार्च २००८ का है) तो फ़िर पहले छपे किसी और लेख का हवाला क्यों दिया जा रहा है? लोगों को कनफ्यूस करने के लिए ही ना. और ये किस लेख की बात की रही है? यह कब छपा था? जरा विस्तार से बताइए. कोई लिंक विंक दीजिये. अगर भड़ास के बारे में अमर उजाला में इतने लेख छपते रहे तो जरूर भड़ास पर भी इसकी चर्चा जोर शोर से अवश्य हुई होगी. जरा उसका लिंक भड़ास के ही ब्लॉग से दे दीजिये जैसे मैंने दिया है.

और चलिए आपकी इस बात पर एक बार यकीन कर भी लिया जाए कि नवम्बर २००७ में कोई लेख छपा भी था तो जनाब नवम्बर तो अक्टूबर के बाद ही आता है ना. रख्शंदा की आईडी तो अक्टूबर २००७ की है. अगर अक्टूबर २००७ या उससे पहले के भड़ास के बारे में अमर उजाला के लेख की कोई लिंक हो तो बताइए. हम भी जानें क्या लिखा था उस लेख में जो रख्शंदा जी भड़ास की ओर आकर्षित हुईं. जानकारी लेकर आइये साहब. ब्लॉग जगत इन्तजार में है. और अपने नाम के साथ आयेंगे तो और भी बेहतर होगा.

अनुराग जी, पिछली पोस्ट पर आपकी टिप्पणी का शुक्रिया. सचमुच बड़ा मजेदार रहा आपका कमेन्ट पढ़ना. ये देखना भी अच्छा लगा कि चलिए किसी ने तो कोरी भावनाओं में ना बहकर दिमाग से काम लेने की कोशिश की. लेकिन अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि कुल मिलाकर आपके ब्लॉगिंग सम्बंधित तकनीकी ज्ञान ने बहुत प्रभावित नहीं किया.

आप लिखते हैं:
"रख्शंदाजी के प्रफाइल को मैं झांकने गया। वहां मेंशन कि यह ब्लॉग अक्टूबर 2007 में क्रिएट किया गया है। गौर करें कि क्रिएशन का यह समय है ब्लॉगर वहां फीड नहीं करता, बल्कि जब आप ब्लॉग क्रिएट करते हैं तो यह सूचना खुद-ब-खुद वहां आ जाती है। यह अलग बात है कि अक्टूबर में क्रिएट करने के बाद रख्शंदाजी की पहली पोस्ट 7 मार्च 2008 को आई। यह भी देखना रोचक होगा कि इनकी शुरुआती पोस्ट पर टिप्पणियां या तो नहीं है या उनकी संख्या बेहद कम हैं."
बड़ा समय और शक्ति खर्च किए आपने इस अन्वेषण में. लेकिन आपके इस समूचे वक्तव्य से आख़िर निष्कर्ष क्या निकलता है? ये आईडी अक्टूबर २००७ में बनाई गई पर रक्षंदा नाम से इसके इस्तेमाल की जरूरत मार्च २००८ में पडी. बस इतनी बात. इससे क्या साबित होता है? आप को तो पता ही होगा कि आईडी का नाम कभी भी बदला जा सकता है. यह पूरी तरह सम्भव है कि अक्टूबर २००७ मैं इस आईडी को किसी और नाम से बनाया गया हो और मार्च २००८ में इस नाम से बदल दिया गया हो. (मैं सिर्फ़ संभावनाओं की बात कर रहा हूँ, यह नहीं कह रहा कि ऐसा वास्तव में हुआ ही होगा) लेकिन आपका तर्क तो औंधे मुंह गिरता ही है.

अन्वेषी जी, अब जरा रक्षंदा आईडी से आए आज के इस कमेन्ट का भी (खुले दिमाग से) कुछ विश्लेषण कीजिये जिसमें रख्शंदा जी अपनी ब्लॉग यात्रा के प्रारम्भ और "भड़ास" से अपने जुड़ाव की जानकारी दे रही हैं.
".एक बार अख़बार में...हाँ, वो अमर उजाला का रविवार का पन्ना था जिस में मैंने ब्लॉग के बारे में पढ़ा, बस एक ब्लॉग देखा नाम था भड़ास...मैंने देखा इसके बहुत सारे सदस्य हैं,,,मेरी बहन ने कहा क्यों न तुम भी इसकी मेंबर बनकर ब्लोगेर बन जाओ, बस मजाक मजाक में उस ब्लॉग के यशवंत जी को मेल किया और दूसरे दिन ही मेंबर बन गई, अपना ब्लॉग तो बस यूंही बना लिया, जो बहन ने नाम सजेस्ट किया, रख दिया..."
ये घोषणा कर रही हैं कि ब्लॉग जगत की जानकारी इन्हें अमर उजाला के रविवार के अंक से मिली जिसमें भड़ास के बारे में छपा था. उसी से इन्हें अपना ब्लॉग बनाने की भी प्रेरणा मिली. इससे पहले ये ब्लॉग जगत से अनजान थीं. क्या आप जानते हैं कि अमर उजाला की संडे मेग्जिन (संडे आनंद) में ये भड़ास से सम्बंधित लेख कब छपा था? वो तारीख थी ०२ मार्च, २००८. भड़ास पर यशवंत जी की ये पोस्ट देखिये. अब आप जरा मुझे बताइए कि जिस शख्स को ०२ मार्च, २००८ तक ब्लॉग दुनिया की जानकारी ही नहीं थी वह अक्टूबर २००७ में अपना ब्लॉग कैसे बनाकर बैठा था? जरा इसका भी अन्वेषण कीजिये और हम सभी को बताइए.

इस तरह की ढेरों कांट्राडिकटरी बातें क्या इन्हें शक के घेरे में नहीं लातीं? ऐसे में अगर मैंने अपना शक जाहिर किया तो क्या ग़लत किया?

इसके आगे आप मेरे बारे में लिख रहे हैं:
"भूतजी का ब्लॉग '2008 में क्रिएट हुआ है। ध्यान रहे कि यह वही वक्त है जब मोहल्ला और भड़ास अपनी-अपनी पोल खोल रहे थे। यह अलग बात है कि भूतजी की पहली पोस्ट मजदूर दिवस के दिन आई। साथ ही 35 कमेंट भी मिले। यानी, एक स्ट्रैटजी के तहत यह जनाब दूसरों के ब्लॉग पर टिपियाते रहे और पहली पोस्ट में ही चर्चित भी हुए।"
अब आप क्या कहना चाह रहे हैं? क्या आप मुझे भी भड़ास या मोहल्ला से जोड़ कर देख रहे हैं? बड़ा सम्मान बख्शा आपने मुझे, मैं कृतार्थ हुआ. लेकिन अनुराग जी मैं आपको बता दूँ कि मैं मूल रूप से कम्युनिटी ब्लॉग के विचार के ही खिलाफ हूँ. गिरोह्बद्द होकर काम करना और प्रेशर ग्रुप क्रिएट करना सामजिक जीवन की बुराइयाँ हैं और इनसे ब्लॉग जगत को दूर ही रखा जाना चाहिए. आप देख सकते हैं कि अपने ब्लॉग पर भी मैंने किसी कम्युनिटी ब्लॉग का लिंक नहीं लगाया है, सिवाय "चोखेर बाली" के.

और जैसा कि आप देख ही आए हैं मेरी ये आईडी जनवरी २००८ की बनी है, यानी जब मुझे हिन्दी ब्लॉग्स की जानकारी मिली उससे दो महीने पहले की. पहले दिन से ही ये आईडी इसी नाम से है. आप चाहें तो मैं आपको इस आईडी से एक अंगरेजी ब्लॉग पर किए गए कुछ कमेंट्स का लिंक बता सकता हूँ जो जनवरी २००८ में किए गए थे. हिन्दी के ब्लॉग्स तो काफी बाद फरवरी अंत में जानकारी में आए.

आपके अनुसार मैंने एक स्ट्रेटेजी के तहत और लोगों के ब्लॉग्स पर कमेन्ट किए और अपनी पहली ही पोस्ट में उसका प्रतिफल ३५ कमेंट्स के रूप में पाया. मजेदार बात रही ये भी. अनुराग जी, इन पैंतीस में से आधे से ज्यादा लोग (कहिये तो नाम गिनाऊँ) ऐसे थे जिनके ब्लॉग पर मैंने अपनी पहली पोस्ट लिखने से पहले कभी कोई कमेन्ट किया ही नहीं था. बाकी में से अधिकतर के साथ तो इससे भी बुरा सुलूक किया था और बिना किसी लाग लपेट के अच्छी बुरी कैसी भी टिप्पणियां छोड़ता रहा था. अगर आप मेरी उस दौरान की टिप्पणियां देखें तो पायेंगे कि अधिकांश का स्वर आलोचनात्मक ही था ना कि लल्लो-चप्पो वाला, वाह जी क्या बात है टाइप. फ़िर भी लोगों ने मुझपर अपना स्नेह लुटाया तो वो मेरा सौभाग्य है. शायद ऐसा कमेंट्स की ईमानदारी की वजह से ही रहा होगा.

अब चलिए एक सेकंड को आपका आरोप सत्य मान भी लें कि मैंने ऐसा लोकप्रियता कमाने के लिए किया. (काश, मुझमें सचमुच इतनी बुद्धि होती) तो ये बताइए कि इस भारी कमाई को मैंने किस तरह भुनाया? जब मुझे लोग इतना प्यार दे रहे थे तो मुझे तो हवा में उड़ते हुए रोज एक पोस्ट पेल देनी चाहिए थी. आख़िर आपके ब्लॉग पर ट्रैफिक तो तभी आएगा जब आप नियमित लिखेंगे. १ मई से लेकर ३१ अगस्त तक चार महीनों में कुल नौ पोस्ट मैंने लिखीं. अब आप मुझे समझाइए कि कौन सी स्ट्रेटेजी लेकर मैंने जनवरी में ब्लॉग बनाया और जबकि सबकुछ सोचे समझे अंदाज में आगे बढ़ रहा था उसके बावजूद आठ महीने में केवल नौ पोस्ट लिखीं?

कुल मिलाकर आपकी बात (हास्यास्पद नहीं कहूँगा) हास्यप्रद लगी. मुझे पढ़कर बड़ा मजा आया. कभी आप भी दुबारा इसे पढ़कर देखिये, शायद आप ख़ुद भी मुस्कुरा उठेंगे.
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चलिए, काफी हुआ. अनुराग अन्वेषी जी का बहुत बहुत शुक्रिया जो उन्होंने मुझे ख़ुद अपने बारे में इतनी बकवास करने के लिए उकसाया. मुझे अंदाजा नहीं था कि अपनी हांकने में इतना भी मजा आ सकता है. सचमुच बड़ा आनंद आया.

Tuesday, September 9, 2008

कौन लिख रहा है रख्शंदा के नाम से?

बौखलाहट बताती है कि दाल में कुछ काला जरूर है.

आप बड़े जतन से एक फर्जी आइडेंटिटी रचते हैं. महीनों के कड़े परिश्रम से उसे लोकप्रिय बनाते हैं, लोग धीरे-धीरे आपके झांसे में आना शुरू होते हैं. और फ़िर एक दिन अचानक कहीं से आपकी हरकत का भंडाफोड़ हो जाता है. बना-बनाया महल इस तरह मिट्टी में मिलता देख गुस्से से आग-बबूला हो जाना स्वाभाविक प्रतिक्रिया है. इससे इतर और उम्मीद भी क्या की जा सकती है, लेकिन आप को अंदाजा नहीं है कि शब्दों की कड़वाहट भी कई राज खोल देती है.

इंटरनेट की वर्चुअल दुनिया एक विचित्र जगह है. इस आभासी लोक में जब आप किसी को ब्लॉग पर लगातार पढ़ते हैं तो उसके व्यक्तित्व के बारे में धीरे-धीरे एक सोच कायम कर लेते हैं. निश्चित रूप से इस सोच में आपका अपना पर्सपेक्टिव और अपनी विचारधारा भी एक अहम् भूमिका निभाती है. कोई ऐसा, जिसके विचार आपके विचारों से मिलते-जुलते लगें, उसे आप जल्द ही अपने काफी नजदीक महसूस करने लगते हैं.

लेकिन यह आभासी संसार कई तरह के खतरों से भी भरा पड़ा है. टेक्नोलॉजी ने जहाँ इंसान को कई बेहतरीन और नायाब तोहफे बख्शे हैं, वहीं साथ ही साथ इनका दुरूपयोग करने वालों की एक पूरी जमात भी तैयार हो गयी है. अपनी कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बैठकर आप जिससे मुखातिब हो रहे हैं, क्या वह वास्तव में वही इंसान है जो अपने आप को बता रहा है या फ़िर एक फर्जी आइडेंटिटी का इस्तेमाल करके लोगों को बरगलाने वाला कोई बहुरूपिया, इसका फ़ैसला आपका विवेक, { ओबेरॉय नहीं :-) }, ही कर सकता है. इंटरनेट पर बढ़ते खतरों के बीच आपका इस बारे में अतिरिक्त एहतियात बरतना न सिर्फ़ जायज है बल्कि अपेक्षित भी.

अब जरा स्पेसिफिक बात की जाए. रख्शंदा के नाम से लिखने वाले दुर्जन (पहले मैंने इन्हें गलती से सज्जन लिखा था) ने अपनी आग-बबूला पोस्ट में ढेर सारा जहर उगला है. इन जनाब के तंग मजहबी जेहन में जितना विष हो सकता था, लगता है सारा का सारा बेचारे एक घोस्ट बस्टर के ऊपर ही खर्च कर डाला है. :-)

जरा एक बार फ़िर से देखें कि ये सारा मामला आख़िर है क्या जिस पर इतनी हाय-तौबा मचाई जा रही है. दुनिया भर के सारे आरोप गंदी से गंदी भाषा में जड़े जा रहे हैं. समूची ब्लॉगर बिरादरी का आह्वान किया जा रहा है कि चलिए और इस धृष्ट की ख़बर लीजिये. खास तौर पर महिला ब्लॉगर्स को उकसाया जा रहा है कि इतना बड़ा मुद्दा हुआ और किसी महिला ने इसके खिलाफ आवाज नहीं उठायी?

आप किसके बारे में क्या धारणा बनाते हैं ये आपका व्यक्तिगत अधिकार है. इस मामले में कोई आपको अपनी राय बनाने या बदलने के लिए बाध्य नहीं कर सकता. मैंने इन जनाब के कुछ लेख पढ़े, इनकी असलियत और सही नीयत को लेकर मुझे कुछ शक हुआ. इंटरनेट पर थोड़ी सर्च की, शक और पुख्ता हुआ. उचित समय पर इसके बारे में अपने ब्लॉग पर मैंने संतुलित शब्दों में अपनी बात रख दी.

अब जरा इन साहब के शब्दों पर गौर कीजिये:
"जब आप सड़क पर खड़े हो कर किसी को गाली देने लग जाएँ, यहाँ तक कि गांधी जी को, तो थोडी देर के लिए लोग आपकी तरफ मत्वज्जा तो हो ही जायेंगे"
दो गलतियाँ हैं इसमें जनाब, एक तो ये कि मैंने आपकी तरह किसी को गाली नहीं दी, केवल आपके झूठ से परदा उठाया, दूसरे ये कि इसके लिए मैंने किसी सड़क का रुख नहीं किया, कहीं और किसी के ब्लॉग पर जाकर चीख-चिल्लाहट नहीं मचाई. बल्कि अपने ख़ुद के ब्लॉग पर दो शब्द कहे, जो कि मेरा जायज हक़ है.

एक और मुद्दा जो बनाने की दिलो-जान से कोशिश की जा रही है, वो ये कि इन साहब को पुरूष बताकर मैंने महिलाओं का कोई अपमान किया है. बाकायदा सुजाता जी तक को पुकारा जा रहा है. खासा हास्यास्पद प्रयास है यह. जरा घटनाक्रम को ध्यान से देखिये और सोचिये. किसी ब्लॉगर पर मुझे नकली आइडेंटिटी वाला होने का शक होता है. मुझे लगता है कि इस प्रकार के लेख लोगों को मूर्ख बनाने के लिए और अपनी दूकान चलाने के लिए लिखे जा रहे हैं. कई लेखों और टिप्पणियों की गैरजरूरी आक्रामकता और इनमें झलकते मजहबी जूनून से ऐसा शक होता है कि कोई महिला शायद इस तरह की भाषा और व्यवहार को अपनाने में इतनी सहज नहीं रह पाती. ऐसा सोचने की सामान्य वजह यही है कि इस देश में अभी भी महिलाऐं पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक सभ्य और शालीन हैं. पान की दूकान पर महिलाओं के गोल बाँध कर खड़े हुए और आते जाते पुरुषों पर फब्तियां कसने की कल्पना कर सकते हैं क्या आप? कुछ निचले स्तर के कारनामे अभी तक केवल पुरूष ही अंजाम देते आए है और आगे भी उन्हीं का अधिकार रहने वाला है. तो जब इनकी हरकत को मैंने महिला जनित ना समझते हुए पौरुषिक लम्पटता से जोड़ा तो ये महिलाओं के लिए अपमान की बात कैसे हुई? आप स्वयं विचारिये.

ये साहब एक पहुंचे हुए कलाकार और कथाकार हैं. ढेर सारे प्रभावकारी अल्फाजों की इनके पास कोई कमी नहीं है, हलाँकि तर्कों और विचारों से ज्यादा काम नहीं लेते क्योंकि वहां इनके मजहबी जूनून में खलल पड़ेगा. अभय जी से सम्बंधित मेरे लेखों के बारे में जो इन्होने लिखा है उससे भी ये बात स्पष्ट हो जाती है.

और भी बहुत कुछ कहा जा सकता है, मगर ये सब सिर्फ़ समय की बर्बादी होगी. इनके बारे में मैं जो कुछ सोचता हूँ, बता दिया. अब इस मुद्दे को और आगे बढ़ाने का मेरा कोई इरादा नहीं है. दूसरा और बहुत काम अभी बाकी है.
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अंत में बस कुछ प्रश्न छोड़ता हूँ, आप ब्लॉगर साथियों के विचारने के लिए.

१) फरवरी माह के अंत में मैंने हिन्दी ब्लॉग्स को डिस्कवर किया था. उस समय एक बड़ा विवाद अपने अंत की ओर अग्रसर था. मुझे पूरी तरह जानकारी नहीं है, मगर ऐसा लगता है कि भड़ास नामक ब्लॉग को लेकर "मोहल्ला" और "चोखेर बाली" का कोई झगड़ा था. जब समूचा ब्लॉग जगत भड़ास की भाषा को लेकर कराह रहा था और महिलाओं की तो छोडिये, अधिकांश भद्र पुरुषों तक ने अपनी नाक पर रूमाल रख कर उस ओर से मुंह फेर लिया था, तब कई फर्जी महिला आइडेंटिटी बनाई गयीं, जिन्हें हम सब जानते हैं. इन फर्जी महिला चरित्रों के अलावा ब्लॉग जगत से और कोई महिला वहां कभी नहीं दिखी. इस बात की असलियत पूरे ब्लॉग जगत को पता थी सिवाय उन भड़ासियों के जो इन्हें बना और चला रहे थे और इन महिलाओं के जो आपस में एक दूसरे को असली मानकर कमेन्ट देती थीं.

रख्शंदा एक ऐसा ही नाम है. इस नाम से वहां कई पोस्ट्स और ढेरों कमेन्ट लिखे गए जो अब भी मार्च अप्रैल की भड़ास की पोस्टों पर देखे जा सकते हैं. क्या शक नहीं होता कि यह श्रीमान भड़ास से जुड़े हुए कोई पत्रकार हैं?

२) इनकी ब्लॉगर प्रोफाइल के अनुसार ये एक राईटर हैं. ब्लॉग पर लेख भी बड़े संजीदा किस्म के होते हैं. बात बात में नैतिकता में गिरावट के लिए अमरीका को कोसने का काम चलता रहता है. लेकिन ब्लॉग का नाम रखने की बात आती है तो वो चुना जाता है, "प्रेटी वूमन". कोई गंभीर महिला अपने ब्लॉग का इस तरह का छिछोरा नाम रखेगी इसमें मुझे शक है. मुझे तो ये सस्ती लोकप्रियता बटोरने का कोई नुस्खा ज्यादा दिखता है. साथ में किसी सुंदर महिला की तस्वीर लगी हो तो भीड़ अच्छे जुट ही जायेगी.

ऐसे और भी कई प्रश्न हैं. मगर ज्यादा कुछ कहना बेकार है.
इस्राइल का नाम भर ले लिया जाय तो लोग आपको ख़ुद इस्राइल बना देते हैं. एक साथ कई फ्रंट खुल जाते हैं. लोग मिलकर हमला बोल देते हैं. इतने सारे फ्रंट पर एक साथ खड़े रहना मेरी क्षमता से परे है. विचलन से बचना चाहता हूँ, इसलिए अब इस मुद्दे को यहीं दफ़न करूंगा.

Thursday, September 4, 2008

अभय जी, आतंकवादियों को हीरो साबित करना कहाँ तक सही है?

हिन्दी चिट्ठाजगत में शायद ही कोई हो जो ईस्वामी की विविध विषयों पर गहरी पकड़ और भाषा में विचारों की अद्भुत सम्प्रेक्षणीयता का कायल न हो. मेरी पिछली पोस्ट पर उनके कमेन्ट में भी यह गुण साफ़ झलकते हैं. लेकिन उनकी और श्री अशोक पाण्डेय जी की टिप्पणियां बताती हैं कि मैं स्वयं अपनी बात को ठीक तरह से रखने/समझाने में शायद विफल रहा हूं.

पहले ईस्वामी की बात लेता हूं. सबसे पहले ये बता दूं कि मैंने पहले ही अभय जी के लेखों का प्रिंट आउट निकाल लिया था. इन बीस पेजों को मैं कई बार पढ़ चुका हूं.

अब जरा कुछ तथ्य ठीक किए जाएँ, अभय जी ने तीन नहीं बल्कि चार लेख लिखे हैं और ये चौथा ही लेख है जिसपर मुझे सबसे ज्यादा आपत्ति है क्योंकि उसमें आतंकवादियों का खुलकर समर्थन किया गया है और अहमद यासीन जैसे आतंकवादी सरगना को हीरो बनाकर पेश किया गया है. जरा अभय जी के शब्दों पर गौर कीजिये:
"उनके प्रभाव में आकर सैकड़ों फ़िलीस्तीनी नौजवानों ने अपने को खुद्कुश बम बना कर शहीद कर दिया।"
ये कौन सा तरीका है दहशतगर्दों की हरकतों को देखने का? ये खुद्कुश बम आख़िर कहाँ फटते हैं? रेस्तौरेंट्स में आम नागरिकों के बीच, या स्कूलों में मासूम बच्चों के चीथड़े उड़ाने के लिए. अभय जी की नजरों में ये बड़े शान की बात होगी, लेकिन मैं तो इस मानसिकता पर लानत ही भेजूंगा.

ईस्वामी जी, आपको ये लेख संतुलित लगे हैं, वो आपका नजरिया है. मगर मुझे शक है कि इसमें कहीं आपका इस्राएलियों से कोई व्यक्तिगत इंटरेक्शन तो कोई भूमिका अदा नहीं कर रहा? चीजों को निष्पक्ष होकर देख पाना वाकई कठिन होता है. तठस्थ रहने पर दोनों ही पक्षों की खूबियाँ और खामियां इस कदर दिखाई देंगी कि फ़िर चार-चार लम्बी पोस्ट लिखने की कोई सोचेगा, इसमें मुझे शक है. इस तरह के लेख लिखने के लिए ऊर्जा तभी मिलती है जब किसी एक पक्ष के प्रति आपका झुकाव हो.

आपने और अशोक जी ने भी जोर दिया है कि व्यक्तिगत टीका-टिप्पणी से दूर रहा जाए. मेरा भी बिल्कुल यही मानना है. लेकिन आप गौर करेंगे तो पायेंगे कि व्यक्तिगत कमेन्ट मैंने नहीं बल्कि अभय जी ने मेरी और उछाले हैं. मैंने उनकी पोस्ट पर अपनी पहली टिप्पणी में उनके लेखन पर मार्क्सवादी प्रभाव की ओर इशारा किया था, बदले में उन्होंने मुझपर अपना प्रसिद्ध प्रश्न दाग दिया, "आप ये तो नहीं मानते......" ये किसी के चरित्र पर ऊंगली उठाना नहीं है तो क्या है? अपने एक अन्य कमेन्ट में मैंने उनके लेखों की निष्पक्षता पर शक जाहिर किया तो उन्होंने मुझे मुस्लिम विरोधी, सांप्रदायिक वगैरह कह दिया. दूसरी ओर अगर आप मेरे कमेंट्स या मेरी पिछली पोस्ट में भी ढूंढेंगे तो कोई व्यक्तिगत आरोप नहीं पायेंगे. मूल स्वर तो वामपंथी विचारों के खोखलेपन के विरोध का है, अभय जी तो सिर्फ़ एक प्रतिनिधि चेहरा हैं. पिछली पोस्ट का तल्ख़ शीर्षक भी अभय जी की टोपी उन्हीं के सर पर रखने का सिर्फ़ एक व्यंग्यात्मक प्रयास भर था. मुझे अफ़सोस है कि ये बात ठीक से संप्रेषित नहीं हो सकी. वो मेरी लेखनी की कमजोरी कहलाएगी.
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अब कुछ बात अभय जी के लेखों और मैं इन्हें स्तरीय क्यों नहीं समझता इस पर.

मध्यपूर्व का ये इस्राइल-अरब विवाद इस कदर विराट रूप ले चुका है कि तीसरे विश्व युद्ध का खतरा पैदा हो गया है. ईरान द्वारा परमाणु बम बनाने की तैयारी के चलते स्थिति कभी भी विस्फोटक रूप ले सकती है. खाड़ी के लगभग सभी मुस्लिम देश इस्राइल को दुनिया के नक्शे से मिटाने से कम पर राजी ही नहीं हैं. ऐसे में इस्राइल आत्मरक्षा के लिए कोई भी बड़ा कदम उठा सकता है, जैसे कि ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमला करना. अगर कहीं ऐसी स्थिति सचमुच बन गयी तो हम सब क्या इसके परिणामों से अछूते रह पायेंगे? इसलिए इस भयावह समस्या को बारीकी से जानना-समझना जरूरी है. अभय जी जब ऐसी पहल करते हैं तो एक आशा बंधती है, मगर बहुत जल्दी निराशा में बदल जाती है.

शुरुआत करें अभय जी के इस बयान से -
"अफ़सोस की बात ये है कि हम पहले तो पढ़ते नहीं, पढ़ते हैं तो और बहुत कुछ पढ़ते है पर इतिहास नहीं पढ़ते और यदि इतिहास भी पढ़ते हैं तो ऐसा इतिहास पढ़ते हैं जो तथ्यों और साक्ष्यों पर नहीं बल्कि क्लेशों, कुण्ठाओं और कोरी कल्पनाओं पर आधारित है।"
जब आप अपनी बात इन शब्दों के साथ शुरू करते हैं और पाठकों को आमंत्रित करते हैं कि आइये हम इस विवाद के विषय में आपकी जानकारियों में इजाफ़ा करें, तो अपने ऊपर कहीं एक बड़ी जिम्मेदारी भी ओढ़ लेते हैं कि पाठक को वाकई तथ्यों की जानकारी साक्ष्यों समेत मुहैया करवाएंगे. लेकिन अभय जी अपने लेखों में जो जानकारी देते हैं क्या कोई साक्ष्य जुटाते हैं? चारों लेखों में हम एक अदद लिंक के लिए तरस जाते हैं. आख़िर किस आधार पर ये सब बातें कही जा रही हैं और इन जानकारियों का मूल स्त्रोत क्या है, ये बताना जरूरी नहीं है क्या? यहीं लेखों की निष्पक्षता सवालों के दायरे में आ जाती है.

(जारी है. अगली बार याहुदी-मुस्लिम समस्या का प्रारंभिक इतिहास और अभय जी का ऐतिहासिक तथ्यों से बचते हुए पतली गली से सरकना)

Monday, September 1, 2008

क्या श्री अभय तिवारी एक प्रो-मुस्लिम प्रोपेगेंडिस्ट हैं?

मध्य पूर्व के इजराइल-अरब विवाद की थोड़ी सी भी जानकारी रखने वाले के लिए अभय जी के इस विषय पर लिखे ब्लॉग लेखों की स्तरहीनता को समझना कोई मुश्किल काम नहीं है. ये लेख न सिर्फ़ पूरी तरह एकतरफा दृष्टिकोण से लिखे गए हैं बल्कि अपनी बात को सही साबित करने के लिए घटियापने के जितने भी उचित मापदंड हो सकते हैं, उन सभी पर पूरी तरह दुरुस्त बैठते हैं. एक सच्ची कुरूप कम्युनिस्टी कुचेष्टा का बढ़िया उदाहरण.

पहली नजर में ही अभय जी की मंशा हमारी समझ में आ गयी और हमने अपने विचार वहां टिपिया दिए. कम्युनिस्टों के काम करने का अपना एक तयशुदा तरीका होता है. अगर कोई आपकी तरफ़ ऊंगली उठाये तो सबसे पहले उसमें एक मुक्का जड़ दो, फ़िर आगे की सोचो. तो हमारी इस "हरकत" का जवाब अभय जी ने अपने पूरे कम्युनिस्टी अंदाज में दिया, याने सीधे-सीधे 'केरेक्टर असेसिनेशन' पर उतर आए, फ़रमाया: "कहीं आप ये तो नहीं मानते हैं कि हर मुसलमान आतंकवादी होता है? क्योंकि यदि ऐसा है तो इस संवाद का कोई अर्थ नहीं!" कितना मासूम सवाल लगता है, मगर दरअसल ये पाठकों के लिए इशारा है कि विरोधी स्वर किसी खास विचारधारा की पृष्ठभूमि से आ रहे हैं और उनपर ध्यान देने की कोई जरूरत नहीं. वाह, क्या बढ़िया हथकंडा है अभय जी.

लेख श्रँखला के चौथे अंक तक पहुँचते पहुँचते अभय जी का सच्चा उद्देश्य उभर कर सामने आ जाता है. अभी तक आतंकवादियों के विरोध में और आम मुस्लिम के पक्ष में होने का दावा करने वाले ये श्रीमान जी अब खुलकर आतंकवादियों के पैरोकार हो जाते हैं. इस अत्यन्त घृणास्पद पोस्ट पर भी हमने अपनी टिप्पणी छोडी. जवाब में अभय जी ने हमें मुस्लिम विरोधी और सांप्रदायिक वगैरह न जाने क्या क्या कह दिया. और करते भी क्या? उधर आदरणीय अफलातून जी भी मैदान में कूद पड़े घोस्ट बस्टिंग मेंटेलिटी को कोसते हुए. मार्क्सवादियों के साथ ये बड़ी समस्या है कि अपने विचारों से असहमत सभी लोग उन्हें "हाफ पेंटीए" ही नजर आते हैं. लेकिन ये लोग इस बात का जवाब कभी नहीं दे पायेंगे कि आज भी आम जनता की नजर में 'कम्युनिस्ट' शब्द एक गाली से ज्यादा क्यों नहीं है?

मार्क्सवादी सोच किस तरह काम करती है ब्लॉग जगत से ही इसका एक और उदाहरण देखिये. कुछ महीने पहले इरान के राष्ट्रपति अहमदीजेनाद भारत यात्रा पर आए थे. इन जनाब पर अपने देश में अल्पसंख्यकों पर जुल्म करने के अलावा चुनाव में धांधली से जीतने तक के ढेरों गंभीर आरोप हैं. लेकिन एक बात के लिए इनकी बड़ी लोकप्रियता भी है. ये श्रीमान जी कई बार कह चुके हैं कि इजराइल को दुनिया के नक्शे से मिटा दिया जाएगा और सभी यहूदियों को मार दिया जायेगा. प्रेटी-वूमन रक्षंदा के फर्जी नाम से ब्लॉग लिखने वाले सज्जन ने भारतीय मीडिया द्वारा अहमदीजेनाद को ज्यादा अहमियत न दिए जाने को लेकर अपनी नाराजगी भरी पोस्ट लिखी. अपने प्रमोद सिंह जी अजदक वाले (पीर मुग्ध सिंह?) उस पोस्ट पर टिपिया आए थे. जरा देख लीजिये. साथ ही अपने मयखाने से झूमते हुए टिप्पणी कर रहे मयखान्वी "मुनीश" जी के भी शब्द देखिये.

खैर इस विवाद का एक अच्छा परिणाम मेरे लिए ये हुआ कि दिनेशराय द्विवेदी जी की टिप्पणी से दिशा लेकर हमने इस विवाद की जड़ तक पहुँचने का फ़ैसला किया और लग गए इजराइल और अरब इतिहास-भूगोल की पड़ताल में. पिछले बीस दिनों में ढाई-तीन सौ वेब पेजेस को पूरी तरह चाटने और दसियों किताबों को खंगालने के बाद अब निश्चत रूप से जानकारी का स्तर बढ़ा है. लेकिन एक बात और भी ज्यादा स्पष्ट हुई है कि अभय तिवारी जी के लेख निश्चित रूप से घटिया थे. (इन लेखों की विवेचना अगली पोस्ट में)

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