Showing posts with label ब्लॉग चर्चा. Show all posts
Showing posts with label ब्लॉग चर्चा. Show all posts

Saturday, September 13, 2008

क्या क्या राज खोलती है आपकी ब्लॉगर प्रोफाइल?

कुछ लोग इस भ्रम में लगते हैं कि ब्लॉगर प्रोफाइल पर उनके जीमेल अकाउंट क्रियेशन की तारीख अंकित होती है. मैं इस भ्रम का कुछ निवारण करने की कोशिश करता हूँ.

सबसे पहली बात तो ये समझ लिया जाए कि जीमेल अकाउंट और ब्लॉगर अकाउंट दो एकदम अलग चीजें हैं. केवल जीमेल पर अकाउंट बना लेने भर से आपका ब्लॉगर प्रोफाइल पेज क्रिएट नहीं हो जाता.
(बड़े आकार में अलग टैब में देखने के लिए तस्वीरों पर क्लिक कीजिये.)
ये है जीमेल का मेन पेज. यहाँ से आप अपना मेल अकाउंट बना सकते हैं.
और ब्लॉगर का मेन पेज ये रहा. अगर आप अपना ब्लॉग बनाना चाहते हैं, या सिर्फ़ ब्लॉगर प्रोफाइल ही बनाना चाहते हैं, (जी हाँ ये भी सम्भव है कि आप बिना ब्लॉग बनाये सिर्फ़ ब्लॉगर आईडी ही बना लें, हम अभी आगे देखेंगे) तो आपको यहाँ से बनाना पड़ेगा.

ब्लॉग बनाने की प्रक्रिया तीन चरणों में पूरी होती है. शुरुआत होती है मेन पेज पर "Create Your Blog Now" लिंक पर क्लिक करके.
१) इस चरण में आपसे एक ईमेल आईडी और पासवर्ड माँगा जाएगा. अगर आपके पास पहले से जीमेल आईडी है तो आप उसे यहाँ भर सकते हैं. जरूरी नहीं है कि जीमेल पर ही आपकी आईडी हो. कोई भी अन्य पहले से तैयार ईमेल आईडी (जैसे याहू या हौटमेल पर) भी इस्तेमाल की जा सकती है. आगे बढ़ें.
२) अब इस दूसरे कदम पर आपसे अपने ब्लॉग का नाम और URL चुनने के लिए कहा जाएगा. भरें और आगे बढ़ें.
३) एक ब्लॉग टेम्पलेट चुनने के लिए कहा जाएगा. ब्लॉगर कुछ टेम्पलेट उपलब्ध करवाता है. इनमें से चुना जा सकता है. बाद में आप चाहें तो इसे बदल भी सकते हैं.
४) यहाँ से आगे बढ़ने पर "Your Blog has been created" का संदेश आ जाता है.

यहाँ आपका ब्लॉग निर्माण पूर्ण हो जाता है. अब अगर आप ब्लॉगर के मेन पेज पर ईमेल और पासवर्ड भर कर लोगिन करते हैं तो आप सीधे अपने डेशबोर्ड पर पहुंचेंगे.
यहाँ डेशबोर्ड पर आप देख सकते हैं कि आपका ब्लॉगर प्रोफाइल बन चुका है. आप प्रोफाइल को देख सकते हैं, उसे एडिट भी कर सकते हैं. डेशबोर्ड पर ही आपके ब्लॉग का नाम भी दिखेगा.
डेशबोर्ड पर प्रोफाइल के लिंक पर क्लिक करके आप ब्लॉगर प्रोफाइल के पेज पर पहुँचिये. ध्यान दीजिये कि प्रोफाइल पर क्रियेशन का महीना और वर्ष नजर आ रहे हैं. साथ ही आपके ब्लॉग का नाम भी.

तो हमने देखा कि आपको अपना ब्लॉग (या सिर्फ़ ब्लॉगर प्रोफाइल) बनाने के लिए ब्लॉगर के मेन पेज से शुरू करना होता है. सिर्फ़ जीमेल या कोई अन्य आईडी होने भर से आपका ब्लॉगर प्रोफाइल नहीं बन जाता. आपके ब्लॉगर प्रोफाइल के पेज पर भी वही तारीख अपने आप अंकित हो जाती है जब आपने अपना ब्लॉग (या ब्लॉगर प्रोफाइल) बनाया. इसे तय करना या बदलना किसी भी तरह आपके हाथ में नहीं है.

अब मान लीजिये कि आपने काफी पहले से सिर्फ़ अपना जीमेल अकाउंट बना रखा है, ब्लॉगिंग के बारे में आप कुछ नहीं जानते. तो अगर आज आप अपना ब्लॉग बनाने जाते हैं तो आपको ऊपर दर्शाए गए सभी चरणों से गुजरना होगा. तभी आपका ब्लॉगर प्रोफाइल का पेज बनेगा. और इस पेज पर आज ही की तारीख अंकित होगी. आपकी जीमेल आईडी कितनी पुरानी है, इससे कोई मतलब नहीं.

अगर आपके पास ब्लॉगर अकाउंट नहीं है, सिर्फ़ जीमेल आईडी है तो ब्लॉगर के मेन पेज से लोगिन करने का प्रयास आपको इस पेज पर पहुँचा देगा, जहाँ आपसे पहले ब्लॉगर अकाउंट बनाने के लिए कहा जाएगा. माने फ़िर से ऊपर वाली प्रक्रिया के सभी चरण.


कुल मिलाकर बात ये कि अगर आपका प्रोफाइल पेज, आपके ब्लॉगर अकाउंट का निर्माण का समय "अक्टूबर २००७" दिखाता है तो इसका अर्थ ये है कि "अक्टूबर २००७" में आपने या तो अपना ब्लॉग बनाया है या कम से कम ब्लॉगर आईडी बनाई है. इसके लिए आपको ब्लॉगर के मेन पेज पर जाना ही पड़ा होगा और इसीलिये दोनों ही स्थितियों में आप ये दावा नहीं कर सकते कि "मार्च २००८" तक ब्लॉग क्या होता है, आपको ये जानकारी ही नहीं थी.
---------------------------------------------------------------------
अब कुश भाई की बात ली जाए. इनका कहना है कि इन्होने अपना ब्लॉग "फरवरी २००७" में बनाया है और अपनी ब्लॉगर प्रोफाइल "सितम्बर २००६ में. इसीलिये इनकी प्रोफाइल पर "सितम्बर २००६" दिख रहा है. अब इसमें कोई अजीब बात नहीं है. हालांकि अधिकतर लोग ब्लॉगर आईडी के साथ ही साथ ब्लॉग भी बनाते हैं, पर ये बिल्कुल सम्भव है कि ब्लॉग बनाये बिना सिर्फ़ ब्लॉगर आईडी बना लिया जाए. ऐसा कई लोग करते हैं. वजह ये है कि कई ब्लॉग्स पर अनोनिमस कमेन्ट करने का ऑप्शन नहीं होता. अगर आप वहां कमेन्ट देना चाहते हैं तो आपको किसी आईडी की आवश्यकता पड़ेगी. लेकिन बात यही है कि आईडी बनाने के लिए भी आपको ब्लॉगर पर जाना ही होगा, और ऐसे में आपकी ये बात स्वीकार नहीं की जा सकती कि आप ब्लॉग के बारे में कुछ नहीं जानते.

कैसे बनायें ब्लॉगर आईडी बिना ब्लॉग बनाये?

आसान है. दरअसल ब्लॉग बनाने के तीन चरणों के दौरान आपकी ब्लॉगर प्रोफाइल पहले चरण में ही बन जाती है. अब दूसरे पेज पर पहुँचने के बाद (जहाँ आपसे ब्लॉग का वांछित नाम और URL पूछा जाता है) अगर आप पेज बंद करके बाहर आ जायें तो आपकी ब्लॉगर आईडी (और प्रोफाइल पेज) तो तैयार हो चुके होते हैं पर ब्लॉग नहीं.

अब अगर आप ब्लॉगर मेन पेज से लोगिन करते हैं तो अपने डेशबोर्ड पर पहुँच जायेंगे.
डेशबोर्ड कुछ ऐसा दिखेगा. ध्यान दीजिये कि प्रोफाइल पेज का लिंक दिख रहा है पर ब्लॉग नहीं है. इस बारे में सूचना भी है कि अभी आप किसी ब्लॉग के लेखक नहीं हैं. पर आपकी प्रोफाइल तैयार है.
प्रोफाइल पेज पर भी उसके क्रियेशन की तारीख दिखेगी, पर ब्लॉग का नाम नहीं क्योंकि वो अभी तक बना ही नहीं है.

तो ये है सारी कहानी. कहानी का सार? यही कि "अक्टूबर २००७" में ब्लॉग बनाया जाए या सिर्फ़ ब्लॉगर आईडी, ब्लॉगिंग के विषय में जानकारी के बिना नहीं हो सकते. और इस तरह ये कथन भी सरासर झूठ साबित होता है कि "२ मार्च २००८" का रविवारीय अमर उजाला किसी के लिए ब्लॉग जगत की जानकारी लेकर आया.
---------------------------------------------------------
अब एक बात और. ब्लॉगर आईडी और प्रोफाइल कब बने ये तो प्रोफाइल पेज पर अंकित हो जाता है, पर कोई ब्लॉग वास्तव में कब बना, ये पता करने का कोई तरीका नहीं है. पोस्ट की तारीख कुछ साबित नहीं करती कि वो पोस्ट वास्तव में कब लिखी गयी है. आप आज चाहें तो किसी भी बैक डेट में पोस्ट लिखकर पोस्ट कर दें. वो ब्लॉग आर्काइव में उसी पुरानी तिथि में अंकित हो जायेगी. इसी तरह आप पुरानी पोस्ट्स को मिटा भी सकते हैं.

Thursday, September 4, 2008

अभय जी, आतंकवादियों को हीरो साबित करना कहाँ तक सही है?

हिन्दी चिट्ठाजगत में शायद ही कोई हो जो ईस्वामी की विविध विषयों पर गहरी पकड़ और भाषा में विचारों की अद्भुत सम्प्रेक्षणीयता का कायल न हो. मेरी पिछली पोस्ट पर उनके कमेन्ट में भी यह गुण साफ़ झलकते हैं. लेकिन उनकी और श्री अशोक पाण्डेय जी की टिप्पणियां बताती हैं कि मैं स्वयं अपनी बात को ठीक तरह से रखने/समझाने में शायद विफल रहा हूं.

पहले ईस्वामी की बात लेता हूं. सबसे पहले ये बता दूं कि मैंने पहले ही अभय जी के लेखों का प्रिंट आउट निकाल लिया था. इन बीस पेजों को मैं कई बार पढ़ चुका हूं.

अब जरा कुछ तथ्य ठीक किए जाएँ, अभय जी ने तीन नहीं बल्कि चार लेख लिखे हैं और ये चौथा ही लेख है जिसपर मुझे सबसे ज्यादा आपत्ति है क्योंकि उसमें आतंकवादियों का खुलकर समर्थन किया गया है और अहमद यासीन जैसे आतंकवादी सरगना को हीरो बनाकर पेश किया गया है. जरा अभय जी के शब्दों पर गौर कीजिये:
"उनके प्रभाव में आकर सैकड़ों फ़िलीस्तीनी नौजवानों ने अपने को खुद्कुश बम बना कर शहीद कर दिया।"
ये कौन सा तरीका है दहशतगर्दों की हरकतों को देखने का? ये खुद्कुश बम आख़िर कहाँ फटते हैं? रेस्तौरेंट्स में आम नागरिकों के बीच, या स्कूलों में मासूम बच्चों के चीथड़े उड़ाने के लिए. अभय जी की नजरों में ये बड़े शान की बात होगी, लेकिन मैं तो इस मानसिकता पर लानत ही भेजूंगा.

ईस्वामी जी, आपको ये लेख संतुलित लगे हैं, वो आपका नजरिया है. मगर मुझे शक है कि इसमें कहीं आपका इस्राएलियों से कोई व्यक्तिगत इंटरेक्शन तो कोई भूमिका अदा नहीं कर रहा? चीजों को निष्पक्ष होकर देख पाना वाकई कठिन होता है. तठस्थ रहने पर दोनों ही पक्षों की खूबियाँ और खामियां इस कदर दिखाई देंगी कि फ़िर चार-चार लम्बी पोस्ट लिखने की कोई सोचेगा, इसमें मुझे शक है. इस तरह के लेख लिखने के लिए ऊर्जा तभी मिलती है जब किसी एक पक्ष के प्रति आपका झुकाव हो.

आपने और अशोक जी ने भी जोर दिया है कि व्यक्तिगत टीका-टिप्पणी से दूर रहा जाए. मेरा भी बिल्कुल यही मानना है. लेकिन आप गौर करेंगे तो पायेंगे कि व्यक्तिगत कमेन्ट मैंने नहीं बल्कि अभय जी ने मेरी और उछाले हैं. मैंने उनकी पोस्ट पर अपनी पहली टिप्पणी में उनके लेखन पर मार्क्सवादी प्रभाव की ओर इशारा किया था, बदले में उन्होंने मुझपर अपना प्रसिद्ध प्रश्न दाग दिया, "आप ये तो नहीं मानते......" ये किसी के चरित्र पर ऊंगली उठाना नहीं है तो क्या है? अपने एक अन्य कमेन्ट में मैंने उनके लेखों की निष्पक्षता पर शक जाहिर किया तो उन्होंने मुझे मुस्लिम विरोधी, सांप्रदायिक वगैरह कह दिया. दूसरी ओर अगर आप मेरे कमेंट्स या मेरी पिछली पोस्ट में भी ढूंढेंगे तो कोई व्यक्तिगत आरोप नहीं पायेंगे. मूल स्वर तो वामपंथी विचारों के खोखलेपन के विरोध का है, अभय जी तो सिर्फ़ एक प्रतिनिधि चेहरा हैं. पिछली पोस्ट का तल्ख़ शीर्षक भी अभय जी की टोपी उन्हीं के सर पर रखने का सिर्फ़ एक व्यंग्यात्मक प्रयास भर था. मुझे अफ़सोस है कि ये बात ठीक से संप्रेषित नहीं हो सकी. वो मेरी लेखनी की कमजोरी कहलाएगी.
------------------------------------------------------------
अब कुछ बात अभय जी के लेखों और मैं इन्हें स्तरीय क्यों नहीं समझता इस पर.

मध्यपूर्व का ये इस्राइल-अरब विवाद इस कदर विराट रूप ले चुका है कि तीसरे विश्व युद्ध का खतरा पैदा हो गया है. ईरान द्वारा परमाणु बम बनाने की तैयारी के चलते स्थिति कभी भी विस्फोटक रूप ले सकती है. खाड़ी के लगभग सभी मुस्लिम देश इस्राइल को दुनिया के नक्शे से मिटाने से कम पर राजी ही नहीं हैं. ऐसे में इस्राइल आत्मरक्षा के लिए कोई भी बड़ा कदम उठा सकता है, जैसे कि ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमला करना. अगर कहीं ऐसी स्थिति सचमुच बन गयी तो हम सब क्या इसके परिणामों से अछूते रह पायेंगे? इसलिए इस भयावह समस्या को बारीकी से जानना-समझना जरूरी है. अभय जी जब ऐसी पहल करते हैं तो एक आशा बंधती है, मगर बहुत जल्दी निराशा में बदल जाती है.

शुरुआत करें अभय जी के इस बयान से -
"अफ़सोस की बात ये है कि हम पहले तो पढ़ते नहीं, पढ़ते हैं तो और बहुत कुछ पढ़ते है पर इतिहास नहीं पढ़ते और यदि इतिहास भी पढ़ते हैं तो ऐसा इतिहास पढ़ते हैं जो तथ्यों और साक्ष्यों पर नहीं बल्कि क्लेशों, कुण्ठाओं और कोरी कल्पनाओं पर आधारित है।"
जब आप अपनी बात इन शब्दों के साथ शुरू करते हैं और पाठकों को आमंत्रित करते हैं कि आइये हम इस विवाद के विषय में आपकी जानकारियों में इजाफ़ा करें, तो अपने ऊपर कहीं एक बड़ी जिम्मेदारी भी ओढ़ लेते हैं कि पाठक को वाकई तथ्यों की जानकारी साक्ष्यों समेत मुहैया करवाएंगे. लेकिन अभय जी अपने लेखों में जो जानकारी देते हैं क्या कोई साक्ष्य जुटाते हैं? चारों लेखों में हम एक अदद लिंक के लिए तरस जाते हैं. आख़िर किस आधार पर ये सब बातें कही जा रही हैं और इन जानकारियों का मूल स्त्रोत क्या है, ये बताना जरूरी नहीं है क्या? यहीं लेखों की निष्पक्षता सवालों के दायरे में आ जाती है.

(जारी है. अगली बार याहुदी-मुस्लिम समस्या का प्रारंभिक इतिहास और अभय जी का ऐतिहासिक तथ्यों से बचते हुए पतली गली से सरकना)

Monday, September 1, 2008

क्या श्री अभय तिवारी एक प्रो-मुस्लिम प्रोपेगेंडिस्ट हैं?

मध्य पूर्व के इजराइल-अरब विवाद की थोड़ी सी भी जानकारी रखने वाले के लिए अभय जी के इस विषय पर लिखे ब्लॉग लेखों की स्तरहीनता को समझना कोई मुश्किल काम नहीं है. ये लेख न सिर्फ़ पूरी तरह एकतरफा दृष्टिकोण से लिखे गए हैं बल्कि अपनी बात को सही साबित करने के लिए घटियापने के जितने भी उचित मापदंड हो सकते हैं, उन सभी पर पूरी तरह दुरुस्त बैठते हैं. एक सच्ची कुरूप कम्युनिस्टी कुचेष्टा का बढ़िया उदाहरण.

पहली नजर में ही अभय जी की मंशा हमारी समझ में आ गयी और हमने अपने विचार वहां टिपिया दिए. कम्युनिस्टों के काम करने का अपना एक तयशुदा तरीका होता है. अगर कोई आपकी तरफ़ ऊंगली उठाये तो सबसे पहले उसमें एक मुक्का जड़ दो, फ़िर आगे की सोचो. तो हमारी इस "हरकत" का जवाब अभय जी ने अपने पूरे कम्युनिस्टी अंदाज में दिया, याने सीधे-सीधे 'केरेक्टर असेसिनेशन' पर उतर आए, फ़रमाया: "कहीं आप ये तो नहीं मानते हैं कि हर मुसलमान आतंकवादी होता है? क्योंकि यदि ऐसा है तो इस संवाद का कोई अर्थ नहीं!" कितना मासूम सवाल लगता है, मगर दरअसल ये पाठकों के लिए इशारा है कि विरोधी स्वर किसी खास विचारधारा की पृष्ठभूमि से आ रहे हैं और उनपर ध्यान देने की कोई जरूरत नहीं. वाह, क्या बढ़िया हथकंडा है अभय जी.

लेख श्रँखला के चौथे अंक तक पहुँचते पहुँचते अभय जी का सच्चा उद्देश्य उभर कर सामने आ जाता है. अभी तक आतंकवादियों के विरोध में और आम मुस्लिम के पक्ष में होने का दावा करने वाले ये श्रीमान जी अब खुलकर आतंकवादियों के पैरोकार हो जाते हैं. इस अत्यन्त घृणास्पद पोस्ट पर भी हमने अपनी टिप्पणी छोडी. जवाब में अभय जी ने हमें मुस्लिम विरोधी और सांप्रदायिक वगैरह न जाने क्या क्या कह दिया. और करते भी क्या? उधर आदरणीय अफलातून जी भी मैदान में कूद पड़े घोस्ट बस्टिंग मेंटेलिटी को कोसते हुए. मार्क्सवादियों के साथ ये बड़ी समस्या है कि अपने विचारों से असहमत सभी लोग उन्हें "हाफ पेंटीए" ही नजर आते हैं. लेकिन ये लोग इस बात का जवाब कभी नहीं दे पायेंगे कि आज भी आम जनता की नजर में 'कम्युनिस्ट' शब्द एक गाली से ज्यादा क्यों नहीं है?

मार्क्सवादी सोच किस तरह काम करती है ब्लॉग जगत से ही इसका एक और उदाहरण देखिये. कुछ महीने पहले इरान के राष्ट्रपति अहमदीजेनाद भारत यात्रा पर आए थे. इन जनाब पर अपने देश में अल्पसंख्यकों पर जुल्म करने के अलावा चुनाव में धांधली से जीतने तक के ढेरों गंभीर आरोप हैं. लेकिन एक बात के लिए इनकी बड़ी लोकप्रियता भी है. ये श्रीमान जी कई बार कह चुके हैं कि इजराइल को दुनिया के नक्शे से मिटा दिया जाएगा और सभी यहूदियों को मार दिया जायेगा. प्रेटी-वूमन रक्षंदा के फर्जी नाम से ब्लॉग लिखने वाले सज्जन ने भारतीय मीडिया द्वारा अहमदीजेनाद को ज्यादा अहमियत न दिए जाने को लेकर अपनी नाराजगी भरी पोस्ट लिखी. अपने प्रमोद सिंह जी अजदक वाले (पीर मुग्ध सिंह?) उस पोस्ट पर टिपिया आए थे. जरा देख लीजिये. साथ ही अपने मयखाने से झूमते हुए टिप्पणी कर रहे मयखान्वी "मुनीश" जी के भी शब्द देखिये.

खैर इस विवाद का एक अच्छा परिणाम मेरे लिए ये हुआ कि दिनेशराय द्विवेदी जी की टिप्पणी से दिशा लेकर हमने इस विवाद की जड़ तक पहुँचने का फ़ैसला किया और लग गए इजराइल और अरब इतिहास-भूगोल की पड़ताल में. पिछले बीस दिनों में ढाई-तीन सौ वेब पेजेस को पूरी तरह चाटने और दसियों किताबों को खंगालने के बाद अब निश्चत रूप से जानकारी का स्तर बढ़ा है. लेकिन एक बात और भी ज्यादा स्पष्ट हुई है कि अभय तिवारी जी के लेख निश्चित रूप से घटिया थे. (इन लेखों की विवेचना अगली पोस्ट में)

LinkWithin