लोग अक्सर महसूस करते हैं, और गाहे बगाहे थोड़ी हिम्मत जुटाकर शिकायत भी कर ही लेते हैं कि ब्लॉग जगत में किसी भी मुद्दे पर सहानुभूति का रुख महिलाओं की और कुछ ज्यादा ही झुका हुआ नजर आता है. बेचारे पुरुषों को अपनी बात ठीक से रखने का मौका ही नहीं मिलता. बस हुल्लड़बाजी में उनकी आवाज दब कर रह जाती है. अब इसमें कितनी सच्चाई है वो तो हम कहने से बचना ही उचित समझते हैं, पर ये जरूर है कि ब्लॉग भी समाज का ही दर्पण है. जो स्थिति विभिन्न मुद्दों पर हमारे आसपास की वास्तविक दुनिया की नजर आती है, कमोबेश वही सब कुछ यहाँ ब्लॉग के आभासी संसार में भी देखने को मिलता है.
बेटियों के ब्लॉग की तर्ज पर बेटों का ब्लॉग भी बनता है, नयापन समझ कर शुरू-शुरू में थोड़ा स्वागत भी होता है, लेकिन बहुत जल्दी ही टाँय-टाँय फिस्स हो जाता है. 'कहाँ से आया किधर गया वो' जैसी हालत हो जाती है. नारी सम्बंधित किसी मुद्दे पर किसी भी किस्म की चर्चा छेड़ने वाले भले ही कितने ही
सज्जन व्यक्ति क्यों न हों, और
कितनी ही ईमानदारी से अपनी बात क्यों न रखें, बहुत जल्दी लोगों के पत्थरों का निशाना बन जाते हैं. हाय, क्या किया जाए, ज़माने का दस्तूर ही ऐसा है.
अपना कुछ ऐसा ही दर्द बयाँ कर रहे हैं श्री रघुनाथ प्रसाद 'गुस्ताख'. ये एक दहेज़ पीड़ित पति हैं. इस अभिव्यक्ति में और भी कई पीडाएं मुखर हुई हैं इनकी, पर क्या कोई इनकी शिकायत पर कान धरने वाला होगा इस ब्लॉग जगत में? मुझे तो बिल्कुल नहीं लगता. बिल्कुल नहीं.
कैसे तुमको लिखूं नमस्ते!
हे पत्नी के पूज्य पिताजी, कैसे तुमको लिखूं नमस्ते.
उल्लू सीधा किया आपने, मुझको अच्छा उल्लू फांसा,
सोने-चांदी के गहने कह, दे डाला सब पीतल-कांसा.
सिक्के जितने दिए दान में, एक-एक सब निकले खोटे,
रजत-थाल फौलादी निकले, एल्म्युनियम के निकले लोटे.
सिलेसिलाए कपड़े लगते, मांगे हुए, महा बेढंगे,
कुर्ते बिल्कुल चोली जैसे, पतलूनें ढीलीं ज्यों लंहगे.
पहने जिनको देख अनारी, नारी जान फब्तियां कसते,
हे पत्नी के पूज्य पिताजी, कैसे तुमको लिखूं नमस्ते. | |
| चूसे हुए आम के जैसी, साठ साल की गाय पुरानी,
अजी दूध की बात छोड़िये, थन से नहीं निकलता पानी.
खटिया साढ़े तीन टांग की, सौ सालों के शाल-दुशाले,
जिनमें पले हुए हैं लाखों खटमल, आफत के परकाले.
खिड़कीदार मसहरी जिसको 'नाईट क्लब' समझे हैं मच्छर,
तकिये को तकिया बोलूँ मैं या चंदन घिसने का पत्थर.
अध्-गंजी हो गयी खोपडी, जिसके ऊपर घिसते-घिसते,
हे पत्नी के पूज्य पिताजी, कैसे तुमको लिखूं नमस्ते. |
सडी सायकिल झनझन करती, घण्टी नहीं बजाये बजती,
दो पुरुषों का भार कभी जो, महासती सा सहन न करती.
घड़ी पुरानी आदम युग की, दिन भर जो चाभी ही खाती,
जिसे देखकर बिना बताये, लोग समझ जाते खैराती.
'सेकेण्ड-हैण्ड' टायर के जूते, वह भी शत-प्रतिशत जापानी,
तलवे जिनके भीतर रहते, बाहर रहती उँगली कानी.
आप 'दशम ग्रह' के फेरे से छूट गए बिल्कुल ही सस्ते,
हे पत्नी के पूज्य पिताजी, कैसे तुमको लिखूं नमस्ते. | |
| वह भी कोई ससुरालय है, जहाँ नहीं सलहज या साली?
यह तो बिल्कुल बात वही है, सुरा-पात्र हो लेकिन खाली.
आप ब्याह से पहले श्रीमन बनते राजस्थानी भामा,
किंतु रचा कर ब्याह सुता का, द्वापर के बन गए सुदामा.
आप 'स-सुर' हैं, तानसेन हैं, मेरे तो लय-सुर हैं मध्यम,
मुझे जमाई कहने वाले, आप भला क्या यम् से हैं कम?
जब भी आप यहाँ आते हैं, दो-दो हफ्ते नहीं खिसकते,
हे पत्नी के पूज्य पिताजी, कैसे तुमको लिखूं नमस्ते. |
'बिन घरनी घर भूत का डेरा' उल्टी हुई आपकी कथनी,
घर मेरा बनवास बन गया, आते ही भुतनी सी पत्नी.
सूर्पणखा जैसी नखवाली, चंडी-मुख, सुरसा सी काया,
जिसे आप अपनी कहते थे, वह 'मछेन्द्र' की निकली माया.
ढोल बजाकर, शोर मचाकर, आप बन गए कन्यादानी,
मैं पत्नी का पकड़ पुछल्ला, बीच भंवर में पीता पानी.
ले लें कन्यादान आप यह, जिसे दिया था हँसते-हँसते,
हे पत्नी के पूज्य पिताजी, कैसे तुमको लिखूं नमस्ते. |
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| मैं मर-मर कर खींचा करता हूँ यह घर की भैंसागाड़ी,
ऊपर से वह हांका करती, कहकर जांगरचोर अनाड़ी.
अब अपना ऋण आप संभालें, मुझ गरीब का छोडें पल्ला,
ब्याज रूप में सौंप रहा हूँ, तीन लल्लियाँ दो-दो लल्ला.
ले लें इनको वरना जिस दिन अन्तर का वैराग्य जगेगा,
उस दिन यह दामाद आपका, पहन लंगोटी दूर भगेगा.
वर्षों से मैं समझाता हूँ, मगर आप क्यों नहीं समझते,
हे पत्नी के पूज्य पिताजी, कैसे तुमको लिखूं नमस्ते.
- रघुनाथ प्रसाद 'गुस्ताख' |