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Saturday, October 25, 2008

मुसलमान नहीं, इस्लाम दोषी है.

डॉ. कोनराड एल्स्ट विश्व भर में अपनी तार्किकता और ज्ञान के लिए प्रसिद्धि पा चुके हैं. पूरी दुनिया के अनेक बड़े मंचों से वे अपने पेपर्स पढ़ते रहे हैं. भारतीय राजनीति और साम्प्रदायिक समस्या पर लिखी उनकी पुस्तकें बुद्धिजीवी हलकों में बहुत मकबूल हुई हैं और चर्चा का विषय बनी हैं.

आइये पिछली पोस्ट की अधूरी बात को आगे जारी करते हैं और जानते हैं कि डॉ. एल्स्ट के विचार.


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बौद्धिक स्तर पर हिंदू जल्द ही आजादी की साँस लेने में सक्षम होंगे. वे सनातन धर्म की अनेक मूल्यवान अभिव्यक्तियों को एक बार फ़िर पहचानने और समझने में भी समर्थ होंगे. सनातन धर्म की एकता और अखंडता को उसके मूल रूप में स्थापित करने में वे कामयाब होंगे और जब वे इस वैज्ञानिक तथ्य को दोहराएंगे कि बौद्ध, जैन और सिख धर्म, स्कूलों और सम्प्रदायों के एक ही हिंदू राष्ट्रमंडल के पूर्ण सदस्य हैं तो ऐसा कहने पर उन्हें किसी सांप्रदायिक निशाने पर नहीं रखा जा सकेगा. हिंदू समाज के दुश्मनों द्वारा जिस छद्म-ऐतिहासिक आधार (pseudo-historical basis) पर जातीय और क्षेत्रीय अलगाववाद को बढ़ावा दिया जाता है, वे उसका भण्डाफोड़ करने और हिंदू समाज की एकता और अखंडता को सुनिश्चित करने में पूरी तरह कामयाब रहेंगे. वे हिंदू समाज की बुराइयों को भी वास्तविक तथ्यों के आधार पर सही ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य (historical perspective) में देखने में और उन्हें सार्वभौमिक मानकों (universal standards) के आधार पर परखने में सक्षम होंगे बजाय उन शत्रुतापूर्ण तदर्थ मानकों (hostile ad hoc standards) के जो हिंदू समाज के दुश्मनों द्वारा लागू किए जाते हैं.

एक नवीकृत स्व-जागरूकता से सुसज्जित हिंदू बढ़ते हुए उग्रवादी मुस्लिम विश्व की चुनौती का सामना करने में सक्षम होंगे. अब तक, वामपंथियों की मदद से इस्लाम भारत पर एक प्रकार का आपातकाल थोपने में कामयाब रहा है. इंदिरा गांधी के आपातकाल के दौरान, हर कोई नेहरू की बेटी के स्तुति गान के लिए तो पूर्णतः स्वतंत्र था लेकिन उनकी आलोचना करना एक खतरनाक काम था. सभी भारतीय बुद्धिजीवी इस प्रकरण (जिसके दौरान संविधान संशोधन कर भारत को धर्मनिरपेक्ष समाजवादी गणराज्य बनाया गया था) का उल्लेख रोष के साथ करते हैं. कुछ इसी प्रकार की स्थिति आज देखने में आती है जब हम ये पाते हैं कि इस्लाम को शान्ति और भाईचारे का रिलिजन बताकर उसकी सराहना करने की तो अनुमति है पर इस्लामी इतिहास और सिद्धांतों की छानबीन करना और उसे परखना, या केवल कुछ असुविधाजनक प्रश्न भर पूछना भी सोच से बाहर की बात है. उन किताबों पर जो इस दिशा में कार्य करती हैं, पाबंदी की सम्भावना रहती है और इसमें इन्हीं सेकुलरवादियों का मौन या प्रत्यक्ष अनुमोदन रहता है. अखबारों के संपादकों ने इस्लाम के प्रति आलोचनात्मक लेखन से पूर्ण परहेज बना रखा है. बौद्धिक रूप से इस्लाम को सुरक्षात्मक स्तर पर धकेल कर उसके अंहकार भाव को ठंडा किया जाना काफी आसान है. इसके लिए उन्हीं क़दमों को उठाना होगा जिन्हें ये "आपातकाल" रोकना चाहता है. अगर हिंदू इस्लाम के मूल ग्रंथों का संज्ञान ले लें, वास्तव में जिन सिद्धांतों का ये प्रतिपादन करते हैं उसे समझ लें, पैगम्बर के मिशन और कैरियर की कहानी को जान लें और भारतवर्ष पर इस्लाम के हमलों और प्रभुत्व में इन सिद्धांतों के अनुप्रयोग की असली कहानी को समझ लें, तो वे इस साम्राज्यवादी विचारधारा के यशोगान की अपनी आदत से जल्दी ही छुटकारा पा जायेंगे. इसके अतिरिक्त, यदि वे उन सटीक मनोवैज्ञानिक श्रेणियों का प्रयोग कर, जो हिंदू परम्परा ने विकसित की हैं, इस्लाम के केन्द्रीय ग्रंथों और सिद्धांतों का प्रतिपादन करने वाली चेतना की गुणवत्ता को समझें, तो उन्हें इस्लाम की मानसिक चापलूसी की बीमारी से उबरने में अधिक समय नहीं लगेगा.

यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि इस्लाम बहुत लंबे समय तक नहीं टिकेगा. किसी भी तर्कसंगत भावना, जो कि हिन्दुओं में सहस्त्राब्दियों से विद्यमान है, और जो पश्चिम की आधुनिक संस्कृति और शिक्षा के प्रसार के दौर में केन्द्रीय रूप ले चुकी है, के साथ टकराव में इस्लाम का तर्कहीन, तानाशाहीपूर्ण और आत्म-मुग्ध रवैया कहीं टिक ही नहीं सकता. विज्ञान का यूनिवर्सलिस्ट दृष्टिकोण इस दोषपूर्ण विश्वास के ख़िलाफ़ विद्रोह करता है कि कोई एक आदमी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के रचनाकार से सीधे एक विशेष संदेश प्राप्त कर सकता है, जबकि अन्य सभी लोग ऐसे किसी प्रत्यक्ष संपर्क से बहुत दूर रखे जाते हैं. विज्ञान का आलोचनात्मक दृष्टिकोण इस मांग को अस्वीकार करता है कि हम मुहम्मद के पैगम्बरी के दावे को बगैर किसी सत्यापन के स्वीकार कर लें. इस्लाम के पास विज्ञान और तर्कशीलता की इस चुनौती का कोई उत्तर नहीं है.

इसके अलावा, इस्लामी सक्रियता में वर्तमान उत्थान, चाहे कितना भी खतरनाक क्यों न लगता हो, स्वयं मुस्लिमों को किसी भली दिशा में ले जाने वाला नहीं है. यह दुनिया भर के गैर-मुस्लिमों के खिलाफ लोकप्रिय आक्रामकता भले ही जुटा ले, पर जब किसी राष्ट्र का शासन सँभालने की बात आती है तो यह साम्यवाद से भी बदतर साबित होगा. बेशक इसकी जड़ें लोगों की आत्मा में कहीं अधिक गहरे में जमीं हैं, लेकिन इसका सामना उन भौतिक आवश्यकताओं और लोकप्रिय नजरिये एवं आकांक्षाओं से है, आज जिनका प्रसार आधुनिकता ने विश्व के समस्त देशों में कर दिया है. यहाँ तक कि इस्लामी शासकों को भी, चाहे वे तानाशाह ही क्यों न हों, अपने लोगों की इच्छाओं का ध्यान रखना होता है और इसके लिए उन्हें आधुनिक भौतिक संसाधनों की आवश्यकता होती है, क्योंकि आज के जनसंख्या बहुल देशों में जीवन के लिए आवश्यक आधुनिक बुनियादी सुविधाओं का होना अपरिहार्य बन चुका है. (उल्लेख करना आवश्यक नहीं कि आज आधुनिक हथियारों के प्रति इस्लामी शासकों का लगाव उतना ही है, जितना कि 'काफिर' शासकों का). तो वे आधुनिक प्रौद्योगिकी से मुंह नहीं मोड़ सकते, इसलिए आधुनिक विज्ञान, और इसलिए आधुनिक सोच. हालांकि आधुनिक सोच मानवता की प्रगति में कोई अन्तिम शब्द नहीं है, लेकिन यह इस्लाम के केन्द्रीय विश्वासों को झकझोरने के लिए पर्याप्त है.

तो यहाँ हमने केवल इस्लाम की कमजोरी का प्रदर्शन किया है. संभवतः यह समझदारी और मानवता की संस्कृति के ख़िलाफ़ जीत नहीं सकता. हालांकि यह कुछ और समय के लिए टिका रह सकता है और शायद तब तक अपनी संख्या और सत्ता को बढ़ाना जारी रख सकता है, लेकिन अंततः इसका खंडित होना तय है. यह किस प्रकार टूटेगा यह आंशिक रूप से लोगों के उद्भव पर निर्भर करता है, विशेष रूप से उन जन्म से मुस्लिम लोगों के जो अन्य मुस्लिम समुदाय के साथ मंच पर इस्लाम की सक्रिय आलोचना करते हैं. साथ ही यह निर्भर करता है उन गैर-मुस्लिमों पर जो मुस्लिम समुदाय के साथ सतत संपर्क में हैं, जैसे कि हिंदू, कि वे इस्लाम के केन्द्रीय दावों के प्रति अपने संदेहों को कितनी स्पष्टता और दृढ़ता से प्रकट करते हैं और किस तर्क और मानवीयता के साथ वैकल्पिक विचारों को प्रकट करते हैं. इस्लाम की तर्कसंगत आलोचना इन्सानी सोच को इक ऐसा नाजुक मगर महत्वपूर्ण मोड़ देगी जिससे कतई कन्नी नहीं काटी जा सकेगी. पर अंततः इस्लाम के अवश्यम्भावी पराभव में जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक होगा, तो वह बेहतर (यानी अधिक तर्कसंगत और मानवतावादी) सोच और संस्कृति के प्रति सकारात्मक मानवीय आकर्षण ही रहेगा.

इस्लाम को हिंदू उत्तर मुख्यतः समझदारी से भरे उस सकारात्मक दृष्टिकोण से ही प्रेरित होना चाहिए जिसकी जड़ें हिंदू मानवतावादी सोच में गहराई से जमी हुई हैं और जिसकी शाखाएं उस आत्मज्ञान से फूटती हैं जो हिंदू परम्परा सदियों से पोषित करती आयी है. उसे, उदाहरण के तौर पर, वर्तमान इस्लामी चढ़ाव के दो सांस्कृतिक घटकों के मध्य एक भेद सावधानीपूर्वक समझना होगा: इनमें से एक तो पश्चिम की न्यूनकारी (reductionist) संस्कृति, जो स्वयं आत्मिक रूप से गरीब है, के बढ़ते दवाब के विरुद्ध आवाज उठाना है, ये एक ऐसी सोच है जिससे शायद हिंदू भी सहमत होंगे. वहीं दूसरी ओर है इस्लामी विश्वास प्रणाली का कट्टर अतिवादी अध्यारोपण. हिन्दुओं को उन मानसिक और सामजिक संरचनाओं को समझना चाहिए जो लोगों को ऐसी तर्कहीन विश्वास प्रणालियों से जुड़ने को प्रेरित करती हैं. उन्हें अपने व्यवहार और सोच में उस सूक्ष्म अन्तर को बनाये रखना होगा जो इस विश्वास प्रणाली में फंसे हुए लोगों और स्वयं इस्लामिक विश्वास प्रणाली के मध्य है. और ऐसा करना आसान, अधिक विश्वसनीय और कम आक्रामक हो जाएगा, यदि वे अपनी स्वयं की संस्कृति पर भी एक समान रूप से गंभीरतापूर्वक दृष्टिपात करें, उन दोनों प्रकार की सोच को तिलांजलि देते हुए जो या तो आत्महीनता या फ़िर आत्मस्तुति का पल्ला पकड़ती हैं, और दुर्भाग्यवश यह स्थिति वर्तमान हिंदू लफ्फाजियों में आम तौर पर प्रचलित है.

यहाँ पर यह भली-भांति समझ लिया जाना चाहिए कि इस्लाम की यह आलोचना एक विश्वास प्रणाली और उससे सम्बंधित व्यवहारिक नियमावली की आलोचना है, ना कि किसी समुदाय के लोगों पर कोई आक्रमण. और यह अपने आप में कोई लक्ष्य भी नहीं है. राजनीतिक स्तर पर यह केवल एक गंभीर समस्या के व्यवहारिक कारणों की पड़ताल में उभरने वाला निष्कर्ष है: भारत में निरंतर जारी रहने वाले सांप्रदायिक तनाव का कारण इस्लाम है. आखिरकार, कोई भी दो समुदाय, धार्मिक अथवा अन्य, कभी आपस में उलझ भी सकते हैं, पर ऐसा कभी-कभार ही होता है, जबकि मुसलमानों और अन्य सभी धर्मावलम्बियों के मध्य तनाव हमेशा तीव्र और लगातार बने रहने वाली स्थिति है. बौद्धिक स्तर पर इस्लाम की यह आलोचना केवल धार्मिक बुनावट की एक केस स्टडी का प्रयास भर है, जो मानव के धार्मिक इतिहास के सामान्य अध्ययन और अन्वेषण का अंग है और जो आने वाले कल की वैश्विक सभ्यता में अविभाज्य मानव शिक्षा के लिए आधार का हिस्सा है. मैं स्वयं इस्लाम या अन्य किसी के ख़िलाफ़ किसी धर्मयुद्ध (crusade) में जीवन पर्यंत लगे रहने का कोई इरादा नहीं रखता. बात सिर्फ़ इतनी है कि हमें कुछ दखलंदाज और कपटपूर्ण विश्वास प्रणालियों के प्रति अपने भ्रम से अपने आप को मुक्त करने की आवश्यकता है और एक बार यह हो गया तो हम सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन के अधिक सकारात्मक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे.

और ठीक ऐसी ही बात सेकुलरवादियों के विरोध पर भी लागू होती है. असल समस्या विचार हैं, लोग नहीं. लेकिन जो लोग लगातार अपनी पूरी ऊर्जा और शक्ति के साथ अपने खोखले विचारों की डुगडुगी बजाते हुए विरोधियों को सिर्फ़ बदनाम करने को ही तत्पर दिखते हैं, तो इन लोगों को इन्हीं की भाषा में समझाने के लिए इनके विचारों की आलोचना के साथ कुछ नेम-टेग्स जोड़ना आवश्यक हो जाता है. इस किताब में मैंने इन सेकुलरवादियों को गहराई में डील किया है और कहीं भी इन्हें बख्शा नहीं है. ये लोग आधुनिकता, तार्किकता और लोकतंत्र के चैम्पियन होने का नाटक करते हैं और इसी वजह से तथ्यों की इनकी तोड़-मरोड़ इन्हें और भी अधिक अलोकतांत्रिक एवं अधिनायकवादी रंग देकर इनके विचारों को अस्वीकार्य बनाती है. इनका पर्दाफाश किया जाना जरूरी है और इस अप्रिय कार्य में मैंने अपना योगदान दे दिया है. मैं यही इरादा रखता हूँ, और ऐसी ही आशा करता हूँ कि इनके विरोध में खड़े होने का यह मेरे लिए अन्तिम अवसर साबित हो. एक बार हिंदू समाज इन हिंदू-विरोधी जोंकों को झाड़ कर अलग कर देगा, यानी इनके मानसिक प्रभाव से अपने आप को मुक्त कर लेगा, तो वह अपने समृद्ध खजाने को और विकसित कर मानवजाति के विकास में समर्पित करने एवं वास्तविक राष्ट्रीय एकता को प्राप्त करने की दिशा में ध्यान केंद्रित कर सकेगा.

दरअसल यह राष्ट्रीय एकता, जिसके कि बारे में भारत में हरेक व्यक्ति बात करता दिखता है, अपने आप में एक बहुत ही स्वाभाविक सी स्थिति है और कोई ऐसी चीज नहीं है जिसकी प्राप्ति किन्हीं विशेष प्रयासों की दरकार रखती हो. बल्कि आवश्यकता तो कुछ चीजों को छोड़ने की है. आवश्यकता है उन हिंदू-विरोधी अलगाववादी सिद्धांतों को धराशायी करने की जिनका निर्माण ही साम्राज्यवादी उद्देश्यों से किया गया है और अब जिन्हें तोड़-मरोड़ पूर्ण बौद्धिक एवं प्रोपेगेंदिस्त प्रयासों द्वारा जिलाए रखा जा रहा है. बस इस कुचक्र को तोड़ना होगा और राष्ट्र अपनी एकता को स्वाभाविक रूप से प्राप्त कर लेगा.

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इस लेख का अनुवाद मेरे अंदाजे से कहीं अधिक कठिन साबित हुआ है. मेरे जैसे सामान्य व्यक्ति के लिए, जिसका हिन्दी और अंग्रेजी दोनों पर ही केवल सामान्य अधिकार भर है, और इस प्रकार के कार्य का कोई अनुभव भी नहीं, इस अनुवाद का कार्य वाकई समय खपाऊ रहा. अनुवाद का स्तर भी सामान्य से ऊपर नहीं उठ सका. फ़िर भी हिन्दी में इस लेख को देते हुए मुझे प्रसन्नता अनुभव हो रही है. वैसे यदि आप अंग्रेजी में कम्फर्टेबल हैं तो मूल लेख को अंग्रेजी में यहाँ पढ़ सकते हैं.


डॉ. एल्स्ट की कुछ किताबें एवं लेख नेट पर भी उपलब्ध हैं. इस साईट को देखें. बहुत बढ़िया सामग्री है.

Friday, October 17, 2008

मार्क्सवाद एक मृतप्रायः आपराधिक विचारधारा है

डॉ. कोनराड एल्स्ट (Dr. Koenraad Elst) का जन्म ७ अगस्त, १९५९ को ल्युवेन, बेल्जियम में एक फ्लेमिश (यानी डच स्पीकिंग बेल्जियन) केथोलिक परिवार में हुआ था. उन्होंने ल्युवेन की केथोलिक यूनिवर्सिटी से दर्शन शास्त्र, चाइनीज और इंडो-इरानियन स्टडी में स्नातक किया. बाद में उसी यूनिवर्सिटी से पी. एच. डी. की उपाधी हासिल की. भारत में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में अपने प्रवास के दौरान वे भारत की साम्प्रदायिक समस्या से परिचित हुए और उन्होंने अपनी पहली किताब अयोध्या विवाद के सन्दर्भ में लिखी. कई बेल्जियन और भारतीय समाचार पत्रों में स्तंभकार के रूप में लिखने के दौरान उन्होंने कई बार भारत का दौरा किया और यहाँ की जातीय-धार्मिक-राजनीतिक विन्यास का अध्ययन करने के क्रम में कई भारतीय नेताओं और विचारकों से इंटरव्यू किए.

डॉ. कोनराड एल्स्ट ने अब तक पन्द्रह किताबें लिखी हैं जो मुख्य रूप से भारतीय राजनीति और साम्प्रदायिकता पर केंद्रित हैं. इसके अलावा उनके अनेक लेख मुख्य समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहे हैं.

प्रस्तुत लेख १९९२ में प्रकाशित उनकी किताब 'अयोध्या एंड आफ्टर, इशूस बेफोर हिंदू सोसायटी' की प्रस्तावना से लिया गया है.

मैं हिंदू नहीं हूँ. और निश्चित रूप से मुस्लिम भी नहीं हूँ. तो जब मैंने १९९० के बसंत में अपनी पिछली पुस्तक 'राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद, हिंदू-मुस्लिम विवाद में एक केस स्टडी' लिखना प्रारम्भ की, तब मैं हिंदुओं और मुसलमानों के बीच इस संघर्ष के लिए एक बाहरी व्यक्ति था. लेकिन जैसे जैसे मैं भारत में आज उपस्थित विभिन्न शक्तियों के अनूठे विन्यास में गहराई में उतरता गया, यह उत्तरोत्तर स्पष्ट होता गया कि यह विवाद सिर्फ़ किन्हीं दो समुदायों के बीच एक सामान्य संघर्ष भर नहीं है. यह दो आत्म-हितों के मध्य पनपने वाला सामान्य मतभेद नहीं है. बल्कि यह एक बिल्कुल असमान प्रतियोगियों के बीच आकार लेने वाला एक ऐसा संघर्ष है जिसमें उलझे हुए पक्ष बिल्कुल असमान उद्देश्यों के साथ नजर आते हैं.

इसमें एक ओर एक ऐसा समाज है जो इस देश की सदियों पुरानी सभ्यता का वाहक है, जो सैकडों वर्षों के विदेशी शासन, उत्पीड़न और दमन के चलते बेतरहा कुचला हुआ है, और जिसे क्षेत्रीय और सांस्कृतिक हानियों के साथ-साथ उससे भी कहीं ज्यादा गंभीर नैतिक हानियों को झेलने पर बाध्य होना पड़ा है. ये वो समाज है जो अपने शानदार इतिहास और आत्म सम्मान की विस्मृति का दंश झेलने पर विवश किया गया है. लेकिन जो इस सबके बावजूद भी उन अनेकानेक संस्कृतियों की तुलना में कहीं बेहतर और सक्षम नजर आता है जो मुस्लिम आक्रान्ताओं और यूरोपीय उपनिवेशकों द्वारा पूरी तरह रौंद डाले गए. और इसी कारण आज भी इस समाज के एक बार फ़िर उबर जाने और अपने अस्मिता को पहचानने की सम्भावना प्रबल नजर आती है.

दूसरी ओर एक ऐसा समुदाय है जिसे इस समाज के भीतर कार्य करने की पूरी स्वतंत्रता प्राप्त है लेकिन जिसकी पृथक पहचान की जड़ें इस वृहद् समाज की युगों पुरानी सभ्यता से कहीं बाहर हैं. अधिकांश स्थितियों में इस समुदाय के पूर्वज उसी हिन्दू समाज से बलपूर्वक बाहर खींच निकाले गए और मुस्लिम समाज में शामिल किए गए थे. इन पूर्व हिन्दुओं का हिंदू समाज के प्रति स्वाभाविक अनुराग अपेक्षित ही था, अगर ऐसा होना कुछ राजनीतिज्ञों और कट्टरपंथी धर्मशास्त्रियों के हितों के विपरीत ना होता, जो इन लोगों की एक अलग साम्प्रदायिक पहचान बनाने के लिए कार्य कर रहे थे.

लेकिन हिंदू समाज का यह संघर्ष मुख्य तौर पर मुस्लिम समुदाय के प्रति नहीं है. आज हिंदू समाज के प्रमुख विरोधी इस्लामिक साम्प्रदायिक लीडर्स नहीं हैं, बल्कि उसके अपने अन्दर शामिल उपनिवेशिक मानसिकता वाले शासक हैं. इनमें अँग्रेजी-शिक्षित और अधिकांशतः वामपंथी झुकाव रखने वाला ऐसा आभिजात्य वर्ग शामिल है जो अपने सेकुलर ख़यालात का ढोल पीटता रहता है. यही लोग हैं जो हिंदू समाज पर हिंदू विरोधी नीतियों को थोपते हैं और हिन्दुओं को लगातार नीचा दिखाकर उन्हें हजार वर्षों के दमन के बाद आज भी सर उठाने का मौका नहीं देना चाहते. हिंदू समाज के लिए सर्वाधिक यातना आज कुछ अक्खड और अक्सर हिंसक हो उठने वाले अल्पसंख्यक गुटों के आन्दोलनों से नहीं है, ना ही गैर-हिन्दुओं को प्राप्त कुछ विशेषाधिकारों से है. सबसे बड़ी समस्या इस मानसिक गुलामी, इस हीनता की भावना से है जो वामपंथी बुद्धिजीवी, शिक्षा के क्षेत्र में और मीडिया में अपनी शक्तिशाली स्थिति के माध्यम से, और जनता और राजनीतिक मंच पर अपनी प्रत्यक्ष प्रभाव के चलते, हिंदू मस्तिष्क पर थोपने के लिए प्रयासरत हैं.

इस्लामी कट्टरपंथियों के साथ एक अजीब मिलीभगत में ये वामपंथी बुद्धिजीवी काम करते हैं. नास्तिक वामपंथियों से सामान्य अपेक्षा तो यही होनी चाहिए कि इस्लाम जैसी धार्मिक प्रगति और सुधार विरोधी और हठधर्मी एंटी-युनिवर्सलिस्ट विश्वास प्रणाली के ये तीव्र आलोचक होंगे. लेकिन भारत में ये दोनों गुट आपस में सहर्ष गठजोड़ कर अपने साझा दुश्मन हिंदू धर्म के ख़िलाफ़ लड़ते हुए दिखते हैं. वैसे यदि वामपंथी समझते हैं कि वे मुस्लिमों को अपने समर्थन के बदले उन्हें अपने पक्ष में लाने में सफल रहेंगे, तो वे भारी गलती पर हैं. ये सिर्फ़ एक तरफा गठजोड़ है और बढ़ते हुए इस्लामिक उग्रवाद के साथ साथ हम वामपंथियों को और ज्यादा सुरक्षात्मक होते देख रहे हैं. अभी तक वामपंथियों ने इस्लाम की सेवा में बढ़िया बुद्धिजीवी सेवाएं अर्पित की हैं. इन्होने इस्लामिक द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत को पुरजोर समर्थन देते हुए भारत के टुकड़े करने में मदद की. आजादी के बाद से इन्होने सम्पूर्ण बौद्धिक और शैक्षिक परिदृश्य पर अपनी पकड़ के चलते इस्लाम के ऐतिहासिक रिकॉर्ड और वैचारिक चरित्र की सभी आलोचनाओं को पंगु बनाने का कार्य किया.

लेकिन फ़िर, यह सोचना कि यह पाश्चात्य कुलीन वर्ग केवल इस्लामी सांप्रदायिक डिजाइनों के लिए प्रयोग किया जा रहा है, शायद सतही हो सकता है. यह अभिजात वर्ग इस बात को लेकर पूरी तरह निश्चिंत है कि वह स्वयं इस्लाम के सेल्फ-एसर्शन से कोई खतरा नहीं रखता. और शायद सही भी है: एक बार आधुनिकता के पर्याप्त रूप से पनप जाने के बाद और उसके राजनीति पर प्रभाव जमा लेने के बाद इस्लाम उसके लिए खतरा नहीं बन सकता. (जैसा कि भारत में है, शाह के ईरान के विपरीत). इस्लामिक कट्टरपंथ का पुनरुत्थान हिंदू समाज के लिए एक शारीरिक खतरा हो सकता है, लेकिन हिंदू समाज को गहरी चुनौती और तीव्र घृणा तो वाम झुकाव वाली पश्चिमी (संक्षेप में: नेहरूवादी) स्थापना से ही है.

तो हिंदू समाज के पुनर्जागरण में पहला कार्य तो नेहरूवादी स्थापना को परखने और उसे बेनकाब करने का ही होना होगा, उसके राजनैतिक और ज्यादा मौलिक रूप में उसके बौद्धिक आयाम में. और आज यह कहीं ज्यादा आसान हुआ है. पचास के दशक में जब श्री राम स्वरूप और श्री सीता राम गोयल जैसे लोग साम्यवाद के ख़िलाफ़ एक बौद्धिक लडाई छेड़ रहे थे, तो वे एक व्यापक आकर्षण युक्त एक घने कोहरे से आच्छादित इस इन्ट्रुसिव विचारधारा के विरुद्ध संघर्षरत थे. आज नब्बे के दशक में आसमान कहीं ज्यादा साफ़ हुआ है और हम कभी अभिमानी रहे इन वामपंथियों के ढहते हुए किलों के बीच इनके स्वान सौंग के साक्षी बन रहे हैं. यह एक पूर्वनिर्धारित फ़ैसला ही है कि उनका साम्राज्य उसके अंत के करीब है. अब आवश्यकता सिर्फ़ इस बात की है कि इनके अन्तिम समय को आवश्यकता से अधिक लंबा न खिंचने दिया जाए और इसके बाद उत्पन्न होने वाले निर्वात को भरने की तैयारी रखी जाए.


(अभी जारी है. अगले अंक में समाप्त होगा.)

Saturday, September 27, 2008

मैं जिंदगी से आँख चुराता चला गया, बस मौत को गले से लगाता चला गया.

कॉलेज का द्वितीय या शायद तृतीय वर्ष था. चार - पाँच मित्र एम् ई वान् वल्केन्बर्ग की नेटवर्क एनालसिस बुक की किसी समस्या में उलझे हुए थे. शर्त थी कि कौन पहले सही हल ढूंढ निकालता है. प्रश्न कुछ ज्यादा ही कठिन रहा होगा, इसलिए ब्रेन स्टोर्मिंग सेशन कुछ लंबा खिंचता जा रहा था. अचानक महफिल में कहीं से एक सिगरेट नमूदार हुई और दो - तीन मित्रों के बीच घूमने लगी. मेरे जैसे नॉन स्मोकर्स के लिए इस धुएँ को इतने नजदीक से बर्दाश्त कर पाना कठिन होता है. तो मैंने इशारे में ही सामान्य विरोध दर्ज किया.

ठीक सामने बैठे मित्र ने एक गहरा कश लेते हुए मुझे कुछ देर घूरा, फ़िर चालू हुए, "देख मेरे भाई! जितना जल्दी हो सके इस आदत को अपना ले, वरना बड़ा नुक्सान उठाएग तू."

दूसरे मित्र ने विद्वत्तापूर्वक संशोधन किया, "और अगर इसका आनंद लेना न भी सीखे तो कम से कम औरों को झेलना तो सीख ही ले."

इन लती लोगों से बहस का कोई मूड नहीं था. तो मैंने सर को जल्दी जल्दी हिला कर बात वहीं समाप्त करने की चेष्टा की. "ठीक है यार, कोशिश करता हूँ. मगर अभी समय लगेगा. तब तक के लिए उस दूसरी बेंच पर बैठने जा रहा हूँ."

सिगरेट के महत्त्व से दूसरा परिचय तब हुआ जब पहला पहला जॉब ज्वाइन किया. मेरे डिपार्टमेंट में शायद ही कोई ऐसा सीनियर हो जो ये शौक ना रखता हो. एक दिन उनमें से एक, जो मुझ पर कुछ विशेष स्नेह रखते थे, ने एक दिन प्रेमपूर्वक समझाया, "भाई तुम अगर स्मोक नहीं करते तो कोई बात नहीं. लेकिन जेब में एक पेकेट जरूर रखा करो. जब मौका मिले, पेश कर दो. सबके साथ मिक्सप होने में बड़ी मदद मिलेगी."

कमाल की बात है. इंसान जिस काम को ख़ुद भला नहीं मानता, उसमें दूसरों को शरीक करने का कितना ख्वाहिशमंद रहता है. खैर मुझे ये हुनर ना आना था, ना आया. ये बात अलग है कि मैंने साथियों से परिचय बढ़ाने के दूसरे बेहतर तरीके तलाश लिए.

खैर, वो तो पुरानी बातें हुईं. स्मोकिंग को लेकर सुकून भरी ताजा ख़बर ये है कि सरकार आने वाले २ अक्टूबर से सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषेध का सख्ती से पालन करवाने को लेकर कमर कस रही है. हालांकि इस बारे में नियम तो कोई ढाई-तीन साल पहले ही बनाया जा चुका था, पर कई लूपहोल्स की वजह से कभी ठीक से लागू नहीं किया जा सका. इस बार संशोधित रूप में इसे ज्यादा प्रभावशाली रूप से लागू किए जाने की योजना है.

नए नियमों के तहत शॉपिंग मॉल्स, सिनेमा हॉल्स, सभी पब्लिक और प्राइवेट कार्यस्थल, होटल्स, डिस्कोथेक्स, केंटीन, कॉफी हाउस, पब्स, बार्स, एरपोर्ट लौंज एवम् रेलवे स्टेशनों पर भी स्मोकिंग पर पाबंदी रहेगी. स्मोकर्स अगर चाहें तो सड़क पर अपनी तलब मिटा सकते हैं, या फ़िर अपने घरों में, लेकिन अन्य सार्वजनिक स्थलों पर नहीं. सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान करते पकड़े जाने पर २०० रुपए के जुर्माने का प्रावधान है जिसे आगे १००० रुपए तक बढाया जा सकता है.

पुराने नियम में निजी कार्यस्थलों पर विशेष स्मोकिंग जोन्स की अनुमति थी जहाँ स्मोकर्स देव आनंद साहब की स्टाइल में जिंदगी का साथ निभाने के भ्रम में जिंदगी को धुएँ में उडाने के लिए स्वतंत्र थे. लेकिन इस छूट का ग़लत इस्तेमाल होते देखकर अब सभी निजी कार्यस्थलों पर स्मोकिंग पर रोक लगा दी गयी है. जो कम्पनियां कर्मचरियों को स्मोकिंग की अनुमति देंगी, उनपर प्रति स्मोकर ५००० रुपए का जुर्माना होगा.

जाहिर है सिगरेट कम्पनियों को इसपर आपत्ति होनी है. ITC (इंडियन टोबेको कम्पनी) ने इसके खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायलय में याचिका दायर की है. इसके अलावा इंडियन होटल असोसियेशन ने भी अदालत का दरवाजा खटखटाया है. लेकिन खुशी की बात है कि इस बार सरकार बैन को लेकर ज्यादा गंभीर नजर आ रही है और इस तरह की तमाम अड़ंगेबाजी की संभावनाओं को भाँपते हुए उसने सुप्रीम कोर्ट में एक अपील दायर कर बैन को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं की सुनवाई केवल उच्चतम न्यायलय में ही करने की अपील की है.

दूसरी तरफ़ आम जनता की और से सरकार के इस कदम का जबरदस्त स्वागत हुआ है. मुंबई, दिल्ली, चेन्नई और कोलकाता में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार ९२% लोगों ने धूम्रपान निषेध के लिए कड़े क़दमों का स्वागत किया है

फ़िर भी इस बात को लेकर एक बड़ी बहस छिडी हुई है. बैन के पक्षधर और विरोधी तमाम तरह के तर्क दे देकर मैसेज बॉक्स और फोरम्स के पन्नों पर पन्ने रंगे जा रहे हैं. अपन तो बस इस बैन को जल्द से जल्द और सख्ती से लागू किए जाते देखना चाहते हैं. एक कम्युनिटी के रूप में स्मोकर्स के लिए अपने मन में जरा भी इज्जत नहीं. क्योंकि,

१. ये जानते हैं कि धूम्रपान इनके स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है. मगर इन्हें परवाह नहीं.
२. इन्हें पता है कि ये इनके घर के अन्य सदस्यों, जो स्मोक नहीं भी करते, के लिए भी बुरा है, मगर ये आदत से मजबूर हैं.
३. स्मोकिंग से होने वाली विषैली गैसों का उत्पादन पूरे विश्व के पर्यावरण के लिए नुक्सान ही पहुँचाने वाला है, होता रहे इनकी बला से.
४. सार्वजनिक स्थानों पर किसी स्मोकर को धुंआ उडाते देखने का दृश्य अभद्रता का खुला प्रदर्शन लगता है.

यहाँ ये जिक्र करना भी सही होगा कि दुनिया के तमाम देशों में पब्लिक स्मोकिंग पर पूर्ण या आंशिक निषेध है. फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका के कई राज्य, बेल्जियम के अलावा पिछले वर्ष ब्रिटेन में भी संसद द्वारा क़ानून बनाकर इसकी मनाई कर दी गयी है. वहां भी इस नियम के लागू किए जाने को लेकर तमाम तरह की हाय तौबा मचाई गयी थी, संदेह जाहिर किए गए थे, लेकिन स्मोकिंग पर ये बैन न सिर्फ़ लागू हुआ बल्कि बड़ा इफेक्टिव भी साबित हुआ है.

और अंत में बाची करकरिया का ये कथन मुझे बड़ा सही लगता है, "स्मोकिंग मार्क्सवाद की तरह है. युवावस्था में आपको इसका अनुभव करना चाहिए. लेकिन आप महामूर्ख होंगे अगर समय रहते इससे बाहर नहीं निकल आते."

Monday, September 15, 2008

कोई चुप कराओ इस दुष्ट को. ये हमारी दूकान उजाड़ देगा.

कोसी की बाढ़ की विनाशलीला देखी होगी आपने. हेलीकाप्टर से राहत सामग्री गिराई गयी. लोग दो-दो, तीन-तीन दिन से भूखे, आगे फ़िर कब सरकारी मदद आए, कुछ पता नहीं. ऐसे में जिसके हाथ जितना लग सके, झपट लो. पड़ोसी का ख्याल करोगे तो अपने घर-परिवार को कैसे संभालोगे? सब जायज है. सही-ग़लत के फेर में पडोगे, तो भूखे मरोगे. जिनमें ज्यादा दम थी, जिन्होंने आगे जगह बना ली, ज्यादा रोटी-पानी बटोर ले गए.

हजार साल की गुलामी के बाद मुल्क आजाद हुआ. संसाधनों पर अपना कब्जा हुआ. जिन्हें पहले मौका मिला, जिसके बाजुओं में दम था या जिसकी बुद्धि काम कर गयी, उसने जितना बना, हथिया लिया. आगे भी घर-परिवार की दुकानदारी चलती रहे, इसके लिए कोड ऑफ़ कंडक्ट तैयार हो गया. असहज करने वाले प्रश्न न पूछे जाएँ. तर्क-वितर्क से परहेज किया जाए. मूर्खतापूर्ण भावनाओं में लोगों को उलझाये रखा जाए भले ही उनकी आंखों पर पट्टी बांधनी पड़े. और लोग भी कौन? पीढियों से गुलाम, अपनी अस्मिता कब की गुमा चुके रीढविहीन धिम्मी. कोई मुश्किल काम नहीं इन मूर्खों को बरगलाना. बस दुकानदारी चल निकली और चलती रही, आज भी जोर-शोर से चल रही है.

ऐसे में अगर कोई तर्क की बात करे, आपकी असलियत उजागर करे, तो ये आपकी जमी-जमाई दुकान के लिए बड़ा खतरनाक साबित हो सकता है. अगर लोग दिमाग से सोचने लगेंगे, तो फ़िर आपकी क्या गत होगी? तो लोगों को बस अपने झूठ के मकड़जाल में उलझाये रखो.

- 'सिमी' क्या है?
=> कुछ नहीं जी. आइये 'मदनमोहन' जी का ये अद्भुत गीत सुनते हैं.

- ये नकली करेंसी कहाँ से आ रही है? इसके पीछे कौन है और उसका क्या उद्देश्य है?
=> पाकिस्तान और हिंदुस्तान एक ही माँ की दो संतानें हैं. सीमा के दोनों और एक जैसे दिल धड़कते हैं. प्यार ही प्यार है.

- जम्मू में क्या हलचल है? इन लोगों की क्या समस्याएँ हैं जो इतना रोष दिख रहा है?
=> कश्मीर से सेना हटाकर उसे पाकिस्तान के हवाले क्यों नहीं कर दिया जाता?

- गोधरा में क्या हुआ?
=> आपने फैज़ साहब की नयी नज़्म सुनी? आज ही पौड्कास्ट पर चढ़ाई है.

- ये जगह जगह धमाके कर मासूमों के खून से होली क्यों खेली जा रही है? इसके पीछे आख़िर कौन है और उसका क्या उद्देश्य है?
=> "उनके प्रभाव में आकर कई नौजवानों ने अपने आप को खुदकूश बम बनाकर शहीद कर दिया."

अरे बस करो. कोई चुप कराओ इस नीच को. ये उल्टे सीधे प्रश्न पूछकर सारा धार्मिक सौहार्द्य बिगाड़ देगा. (और हमारी दुकानदारी भी)

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