जरा क्रम से इन टिप्पणियों का अवलोकन किया जाए:
टिप्पणी क्रमांक: एक
स्थान: घोस्ट बस्टर ब्लॉग
समय: १० सितम्बर, 11:28 AM (IST)
- अरे मेरे प्यारे भूत दा। बहुत तिलमिला गए आप तो। मेरे राग को बेसुरा और बेसुराग ही बना डाला। तो प्यारे भूत दा, मैं सुरागों की बात तो करता ही नहीं, सुराग वह तलाशें जिन्हें सूराख नजर नहीं आती। राग यह पसंद नहीं तो मैं रेलगाड़ी की छुक-छुक तो सुना नहीं सकता हूं। जिसकी शायद आपको आदत सी पड़ गई है। घाट घाट का पानी आपने पीया है या नहीं, यह तो नहीं पता पर लगता है जैसे इलाहाबाद के घाट का पानी जरूर पीया है। (इसका भी कोई सबूत मेरे पास नहीं है, इसलिए अब सबूत मत मांगने लगना) और अंत में मुझे खूब पता है कि घोस्ट बस्टर वर्चस्व की लड़ाई वाले दौर की पैदाइश नहीं है। इसीलिए 'ज्ञान''देनेवालों' से एक निवेदन,मेरे लिखे से यह समझ लें कि पता होते हुए भी घोस्ट का आवरण उतारने की मुझे जरूरत नहीं। जो आवरणों में रहना चाहता है मुझे उसे सामने लाकर क्या हासिल होना है।
टिप्पणी क्रमांक: दो
स्थान: रख्शंदा ब्लॉग
समय: १० सितम्बर, 11:34 AM (IST)
- रक्षंदा जी देखिये आपके जरा प्रतिवाद पर घोस्ट बस्टर जी कितना पगला कर बौखलायें हैं और क्या झूठ पर झूठ छाप रहे हैं इन्हें इतना टाइम हैं तो भड़ास पर जा के ढुंढ लें जानकारी की कब कब छपी है नहिं तो अपने दोस्त यशवंत जी से पूछ लें शर्म तो इनको आयेगी नहीं, कुश ने कहा, लवली ने कहा की आप हैं, लेकिन फिर भी बकवास किये जा रहे हैं इसी तरह की बकवास अभय के बारे में की, और दावे दे दे के कहा की मैं अपना विवेचन लाउंगा, बकवास करते वक्त सालिम रहे लेकिन तर्क पेश करने के बजाय पीछे हट गये घोस्ट बस्टर एक खुन्नसी बकवासिया है जो अपनी असलियत छिपा कर दूसरों के साफ दामन पर कीचड़ उछालता फिर रहा है, लेकिन जल्द ही इसकी असलियत उजागर होने वाली है क्योंकि अब चिट्ठाजगत के बहुत लोगों को पता है कि यह असल में कौन है,
टिप्पणी क्रमांक: तीन
स्थान: घोस्ट बस्टर ब्लॉग
समय: १० सितम्बर, 11:35 AM (IST)
- और भूत दा, दुमछल्ला तो छूट ही गया। वह भी लीजिए, प्रगति तो आपकी देख रहा हूं इसलिए कहता हूं लेमनचूस नहीं, ले-मन-चूस।
ये कमेन्ट ज्ञानदत्त जी की १० सितम्बर की पोस्ट "प्रगति का लेमनचूस" की तरफ़ इशारा करते हुए है. इससे ज्यादा साफ़-साफ़ और क्या कह सकते थे ये? लेकिन इनकी हरकत ब्लॉग जगत के सामने रख दिए जाने के बाद कैसे खिसियाये हैं, ये भी देखिये.
टिप्पणी क्रमांक: चार
स्थान: घोस्ट बस्टर ब्लॉग
समय: १० सितम्बर, 04:07 PM (IST)
- बधाई हो भूत दा, मैंने किसी का कोई नाम नहीं लिया। पर आपके यहां जिनका नाम मेरे हवाले से उछाला जा रहा है, मेरी प्रतिक्रिया के बाद उन्हीं की प्रतिक्रिया है आपके इस ब्लॉग पर। उन्हें तो इसका अहसास ही नहीं हुआ, पर आपको पता नहीं कैसे उनका नाम सूझ गया? वैसे आपको अपनी पहली पोस्ट तो जरूर याद होगी। न हो तो उसका अंश मैं यहां दे दूं 'एक दिन 'दैनिक भास्कर' में हिन्दी ब्लॉग्स पर लेख पढ़ा. पढ़ कर भूल भी गए पर थोडी सी उत्सुकता तो बढ़ी. दो नाम याद रहे जो उसमें आए थे, शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पाण्डेय. तीन-चार दिन बाद थोडी फुरसत के समय इन नामों को गूगल पर सर्च करने बैठे और एक पूरी नयी दुनिया नजर आयी. थोड़ा सा प्रयास करने के बाद हिन्दी के सारे फॉण्ट लोड कर लिए और फिर फायरफॉक्स और ओपरा में भी हिन्दी ब्लॉग्स ठीक से नजर आने लगे.' तो मेरे प्यारे भूत दा, आपको खुश होना चाहिए कि आपने जिनका आभार माना वह अब आपके पक्ष में खड़े हैं।
- वैसे आपको जहां जो साबित करना हो, कर दो। आप मुझे भूत कहोगे तो मैं भूत नहीं हो जाऊंगा, ठीक वैसे ही कि मैं आपको भविष्य कहूं तो भी आप भविष्य नहीं हो सकते। जारी रखें आप। मजे के लिए एक सवाल पूछ रहा हूं सच बताना. आप भूत हो या भूतनी? मैं तो पाठ कर रहा हूं भूत पिशाच निकट नहीं आवै...
अनुराग जी, सारा ब्लॉग जगत जानता है कि आपने किसका नाम लिया है. लेकिन इस तरह के अनर्गल आरोप बिना किसी तर्क के जड़ दिए जाएँ तो कोई भी समझदार और सच्चा इंसान आपकी बुद्धि पर तरस खाकर उसे हंस कर उपेक्षित ही करेगा. यही ज्ञानदत्त जी ने किया है. आप कह रहे हैं कि उन्हें इसका अहसास ही नहीं हुआ. शिवकुमार जी का आपको जवाब में लिखा कमेन्ट बता रहा है कि ज्ञान जी को अहसास नहीं हुआ या वे इसे आपकी मूढ़ता समझकर इग्नोर कर गए, जैसा कि अपेक्षित भी है.
अब जरा इसकी तुलना मेरी स्थिति से की जाए. मेरे शक जाहिर करने के जवाब में गालियों से भरपूर कैसी तिलमिलाती हुई पोस्ट सामने आयी. अगर मेरी बात सच्चाई से दूर होती तो ऐसा ओवर रिएक्शन क्यों होता? इसे हंस कर टाला जा सकता था. है कोई सोचने वाला?
मैंने अपने शक के साथ कारण भी गिनाये. कोई मेरे शक की वजहों को काटने वाला सामने नहीं आया, पर मुझे बिना वजह गरियाने वालों की कमी नहीं रही. घोस्ट बस्टर का मर्सिया पढने वालों की भीड़ लग गयी. आज जब अनुराग जी, ज्ञान जी को इस कदर अपमानित कर रहे हैं तो ये सब लोग कहाँ हैं? दोहरे मापदंड के स्वामी ये सब धिम्मी किस कौने में छुपे बैठे हैं? जब अनुराग अन्वेषी बिना किसी सबूत के ज्ञान जी जैसे वरिष्ठ और सर्व सम्माननीय चिट्ठाकार पर यूँ कीचड उछाल रहे हैं तो कोई सामने आकर विरोध क्यों नहीं करता? और जब मैं सारे सबूत देते हुए भी एक अनजान ब्लॉगर के बारे में एक छोटा सा शक जाहिर करता हूँ तो मुझे कोसने वालों की भीड़ लग जाती है. ये दोगलापन क्यों?
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अपनी सफाई देने के प्रयास में रख्शंदा जी से कुछ ऐसी बातें निकल गयी हैं जो किसी बड़े घोटाले की ओर इशारा कर रही हैं और जिनका जवाब देना उन्हें मुश्किल पड़ रहा है. इनका कहना है (और ये बात दुबारा दुहराई गयी है) कि ब्लॉग जगत के बारे में जानकारी इन्हें "मार्च २००८" के अमर उजाला से मिली और उसके बाद इन्होने भड़ास के यशवंत जी को फोन करके भड़ास से जुड़ने का कार्य किया. तभी इन्होने अपना ब्लॉग भी बनाया. लेकिन इनकी ब्लॉगर प्रोफाइल बता रही है कि इनका ब्लॉग "अक्टूबर २००७" का बना है. फ़िर ये झूठ क्यों बोल रही हैं? है कोई पूछने वाला?रचना सिंह जी ने इनकी बात को डिफेंड करने की कोशिश की है. उनका कहना है कि अगर कोई व्यक्ति आज केवल जीमेल अकाउंट बना ले और ब्लॉग कुछ महीने बाद बनाये तो उसकी प्रोफाइल पर पुरानी तारीख ही दिखेगी, जबकि ब्लॉग निर्माण बाद का हुआ होगा.
ये बात बिल्कुल असंभव है, रचना जी. मैं अगली पोस्ट में आपको पूर्ण विस्तार से बतलाता हूँ कि क्यों. आपकी और भी शंकाओं का समाधान करना शेष है. जल्दी ही.