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Thursday, September 11, 2008

दुआओं में भी क्या कमाल का असर होता है. मान गए.

ताजा और मुख्य ख़बर ये है कि लोगों की दुआएं रंग लाईं और अनुराग अन्वेषी जी के मानसिक स्वास्थ्य में सुधार के लक्षण देखे गए. कल तक ज्ञानदत्त पाण्डेय जी पर अनर्गल आरोप लगा रहे अनुराग जी बाद में सिटपिटाते हुए अपने कहे से मुकरने का प्रयास करते पाये गए. लेकिन कमान से निकले तीर और जबान से निकली बात की तरह ही की-बोर्ड से निकली टिप्पणी भी कभी वापिस लौटती है क्या? वो तो सभी ब्लॉगर्स के अवलोकन के लिए टिप्पणी दीर्घा में सदा के लिए सुशोभित हो गयीं हैं. (माने जब तक अनुराग जी इन टिप्पणियों को मिटा नहीं देते तब तक के लिए).

जरा क्रम से इन टिप्पणियों का अवलोकन किया जाए:

टिप्पणी क्रमांक: एक
स्थान: घोस्ट बस्टर ब्लॉग
समय: १० सितम्बर, 11:28 AM (IST)

अनुराग अन्वेषी said...
अरे मेरे प्यारे भूत दा। बहुत तिलमिला गए आप तो। मेरे राग को बेसुरा और बेसुराग ही बना डाला। तो प्यारे भूत दा, मैं सुरागों की बात तो करता ही नहीं, सुराग वह तलाशें जिन्हें सूराख नजर नहीं आती। राग यह पसंद नहीं तो मैं रेलगाड़ी की छुक-छुक तो सुना नहीं सकता हूं। जिसकी शायद आपको आदत सी पड़ गई है। घाट घाट का पानी आपने पीया है या नहीं, यह तो नहीं पता पर लगता है जैसे इलाहाबाद के घाट का पानी जरूर पीया है। (इसका भी कोई सबूत मेरे पास नहीं है, इसलिए अब सबूत मत मांगने लगना) और अंत में मुझे खूब पता है कि घोस्ट बस्टर वर्चस्व की लड़ाई वाले दौर की पैदाइश नहीं है। इसीलिए 'ज्ञान''देनेवालों' से एक निवेदन,मेरे लिखे से यह समझ लें कि पता होते हुए भी घोस्ट का आवरण उतारने की मुझे जरूरत नहीं। जो आवरणों में रहना चाहता है मुझे उसे सामने लाकर क्या हासिल होना है।

टिप्पणी क्रमांक: दो
स्थान: रख्शंदा ब्लॉग
समय: १० सितम्बर, 11:34 AM (IST)

Anonymous said...
रक्षंदा जी देखिये आपके जरा प्रतिवाद पर घोस्ट बस्टर जी कितना पगला कर बौखलायें हैं और क्या झूठ पर झूठ छाप रहे हैं इन्हें इतना टाइम हैं तो भड़ास पर जा के ढुंढ लें जानकारी की कब कब छपी है नहिं तो अपने दोस्त यशवंत जी से पूछ लें शर्म तो इनको आयेगी नहीं, कुश ने कहा, लवली ने कहा की आप हैं, लेकिन फिर भी बकवास किये जा रहे हैं इसी तरह की बकवास अभय के बारे में की, और दावे दे दे के कहा की मैं अपना विवेचन लाउंगा, बकवास करते वक्त सालिम रहे लेकिन तर्क पेश करने के बजाय पीछे हट गये घोस्ट बस्टर एक खुन्नसी बकवासिया है जो अपनी असलियत छिपा कर दूसरों के साफ दामन पर कीचड़ उछालता फिर रहा है, लेकिन जल्द ही इसकी असलियत उजागर होने वाली है क्योंकि अब चिट्ठाजगत के बहुत लोगों को पता है कि यह असल में कौन है,


टिप्पणी क्रमांक: तीन
स्थान: घोस्ट बस्टर ब्लॉग
समय: १० सितम्बर, 11:35 AM (IST)

अनुराग अन्वेषी said...
और भूत दा, दुमछल्ला तो छूट ही गया। वह भी लीजिए, प्रगति तो आपकी देख रहा हूं इसलिए कहता हूं लेमनचूस नहीं, ले-मन-चूस।

ये कमेन्ट ज्ञानदत्त जी की १० सितम्बर की पोस्ट "प्रगति का लेमनचूस" की तरफ़ इशारा करते हुए है. इससे ज्यादा साफ़-साफ़ और क्या कह सकते थे ये? लेकिन इनकी हरकत ब्लॉग जगत के सामने रख दिए जाने के बाद कैसे खिसियाये हैं, ये भी देखिये.


टिप्पणी क्रमांक: चार
स्थान: घोस्ट बस्टर ब्लॉग
समय: १० सितम्बर, 04:07 PM (IST)

अनुराग अन्वेषी said...
बधाई हो भूत दा, मैंने किसी का कोई नाम नहीं लिया। पर आपके यहां जिनका नाम मेरे हवाले से उछाला जा रहा है, मेरी प्रतिक्रिया के बाद उन्हीं की प्रतिक्रिया है आपके इस ब्लॉग पर। उन्हें तो इसका अहसास ही नहीं हुआ, पर आपको पता नहीं कैसे उनका नाम सूझ गया? वैसे आपको अपनी पहली पोस्ट तो जरूर याद होगी। न हो तो उसका अंश मैं यहां दे दूं 'एक दिन 'दैनिक भास्कर' में हिन्दी ब्लॉग्स पर लेख पढ़ा. पढ़ कर भूल भी गए पर थोडी सी उत्सुकता तो बढ़ी. दो नाम याद रहे जो उसमें आए थे, शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पाण्डेय. तीन-चार दिन बाद थोडी फुरसत के समय इन नामों को गूगल पर सर्च करने बैठे और एक पूरी नयी दुनिया नजर आयी. थोड़ा सा प्रयास करने के बाद हिन्दी के सारे फॉण्ट लोड कर लिए और फिर फायरफॉक्स और ओपरा में भी हिन्दी ब्लॉग्स ठीक से नजर आने लगे.' तो मेरे प्यारे भूत दा, आपको खुश होना चाहिए कि आपने जिनका आभार माना वह अब आपके पक्ष में खड़े हैं।

वैसे आपको जहां जो साबित करना हो, कर दो। आप मुझे भूत कहोगे तो मैं भूत नहीं हो जाऊंगा, ठीक वैसे ही कि मैं आपको भविष्य कहूं तो भी आप भविष्य नहीं हो सकते। जारी रखें आप। मजे के लिए एक सवाल पूछ रहा हूं सच बताना. आप भूत हो या भूतनी? मैं तो पाठ कर रहा हूं भूत पिशाच निकट नहीं आवै...

अनुराग जी, सारा ब्लॉग जगत जानता है कि आपने किसका नाम लिया है. लेकिन इस तरह के अनर्गल आरोप बिना किसी तर्क के जड़ दिए जाएँ तो कोई भी समझदार और सच्चा इंसान आपकी बुद्धि पर तरस खाकर उसे हंस कर उपेक्षित ही करेगा. यही ज्ञानदत्त जी ने किया है. आप कह रहे हैं कि उन्हें इसका अहसास ही नहीं हुआ. शिवकुमार जी का आपको जवाब में लिखा कमेन्ट बता रहा है कि ज्ञान जी को अहसास नहीं हुआ या वे इसे आपकी मूढ़ता समझकर इग्नोर कर गए, जैसा कि अपेक्षित भी है.

अब जरा इसकी तुलना मेरी स्थिति से की जाए. मेरे शक जाहिर करने के जवाब में गालियों से भरपूर कैसी तिलमिलाती हुई पोस्ट सामने आयी. अगर मेरी बात सच्चाई से दूर होती तो ऐसा ओवर रिएक्शन क्यों होता? इसे हंस कर टाला जा सकता था. है कोई सोचने वाला?

मैंने अपने शक के साथ कारण भी गिनाये. कोई मेरे शक की वजहों को काटने वाला सामने नहीं आया, पर मुझे बिना वजह गरियाने वालों की कमी नहीं रही. घोस्ट बस्टर का मर्सिया पढने वालों की भीड़ लग गयी. आज जब अनुराग जी, ज्ञान जी को इस कदर अपमानित कर रहे हैं तो ये सब लोग कहाँ हैं? दोहरे मापदंड के स्वामी ये सब धिम्मी किस कौने में छुपे बैठे हैं? जब अनुराग अन्वेषी बिना किसी सबूत के ज्ञान जी जैसे वरिष्ठ और सर्व सम्माननीय चिट्ठाकार पर यूँ कीचड उछाल रहे हैं तो कोई सामने आकर विरोध क्यों नहीं करता? और जब मैं सारे सबूत देते हुए भी एक अनजान ब्लॉगर के बारे में एक छोटा सा शक जाहिर करता हूँ तो मुझे कोसने वालों की भीड़ लग जाती है. ये दोगलापन क्यों?
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अपनी सफाई देने के प्रयास में रख्शंदा जी से कुछ ऐसी बातें निकल गयी हैं जो किसी बड़े घोटाले की ओर इशारा कर रही हैं और जिनका जवाब देना उन्हें मुश्किल पड़ रहा है. इनका कहना है (और ये बात दुबारा दुहराई गयी है) कि ब्लॉग जगत के बारे में  जानकारी इन्हें "मार्च २००८" के अमर उजाला से मिली और उसके बाद इन्होने भड़ास के यशवंत जी को फोन करके भड़ास से जुड़ने का कार्य किया. तभी इन्होने अपना ब्लॉग भी बनाया. लेकिन इनकी ब्लॉगर प्रोफाइल बता रही है कि इनका ब्लॉग "अक्टूबर २००७" का बना है. फ़िर ये झूठ क्यों बोल रही हैं? है कोई पूछने वाला?

रचना सिंह जी ने इनकी बात को डिफेंड करने की कोशिश की है. उनका कहना है कि अगर कोई व्यक्ति आज केवल जीमेल अकाउंट बना ले और ब्लॉग कुछ महीने बाद बनाये तो उसकी प्रोफाइल पर पुरानी तारीख ही दिखेगी, जबकि ब्लॉग निर्माण बाद का हुआ होगा.

ये बात बिल्कुल असंभव है, रचना जी. मैं अगली पोस्ट में आपको पूर्ण विस्तार से बतलाता हूँ कि क्यों. आपकी और भी शंकाओं का समाधान करना शेष है. जल्दी ही.

Wednesday, September 10, 2008

अनुराग अन्वेषी जी का बेसुरा(ग) अन्वेषण

अपडेट: १० सितम्बर २००८, ०१:१५ दोपहर बाद

तेजी से बदलते घटनाक्रम में दो नयी घटनाएँ जुड़ गयी हैं. पहली तो ये कि कुछ नाटकीय टिप्पणियों के माध्यम से अनुराग अन्वेषी जी ने अपने दिमागी संतुलन के खो जाने की ओर इशारा किया है. इन्होने कहा है कि घोस्ट बस्टर के नाम से दरअसल श्री ज्ञानदत्त पाण्डेय जी लिख रहे हैं. नीचे इनकी टिप्पणियां देखिये और इनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना कीजिये. कुछ ऐसी ही टिप्पणी ये रख्शंदा जी के ब्लॉग पर भी लिख आए हैं.

दूसरी बात यही है कि रख्शंदा जी के ब्लॉग पर अनाम टिप्पणियां (जिनका जिक्र पिछले अपडेट में किया गया है) देने वाले यही अनुराग अन्वेषी जी हैं, इसका पर्दाफाश हो गया है. अपनी नयी टिप्पणी में कोई भी तर्क और मेरे किसी भी सवाल का जवाब देने में ये पूरी तरह विफल रहे हैं. पर इसके बावजूद इनकी भाषा देखिये और प्रिंट मीडिया के गिरते स्तर पर एक बार फ़िर अफ़सोस कीजिये. वहां भी ये ज्ञानदत्त जी की ओर साफ़ इशारा कर रहे हैं.

इनकी तर्क क्षमता देखिये. इन्होने फ़रमाया कि अमर उजाला में २००७ में भड़ास पर कई लेख छपे थे. जब इन लेखों के लिंक मांगे तो क्या कह रहे हैं:
"इन्हें इतना टाइम हैं तो भड़ास पर जा के ढुंढ लें जानकारी की कब कब छपी है नहिं तो अपने दोस्त यशवंत जी से पूछ लें"
जब आप किसी बात की जानकारी दे रहे हैं तो सबूत देना तो आपकी जिम्मेदारी बनती है अनुराग जी, न कि ये पाठक का काम हुआ कि वो लिंक ढूंढता बैठे. चलिए फ़िर भी मैंने भड़ास को अच्छी तरह सर्च किया और मुझे ऐसी कोई भी पोस्ट २००७ की पोस्ट्स में नहीं मिली. अगर कोई ढूंढ कर बता सके तो मैं आभारी रहूँगा.

अब मैं पूछता हूँ. जब मैंने रख्शंदा की आईडी पर शंका जताई (बाकायदा कारण बताते हुए) तो मुझे इतना जलील किया गया. (डॉ. अमर कुमार जी और दिनेशराय द्विवेदी जी की टिप्पणियां देखी जा सकती हैं). आज अनुराग अन्वेषी, ज्ञानदत्त जी जैसे वरिष्ठ और सम्माननीय ब्लॉगर पर खुले आम बिना किसी तर्क के ये घिनौना आरोप लगा रहे हैं तो क्या इनकी भी ख़बर लेने वाला कोई है? या ब्लॉग जगत केवल धिम्मियों की बस्ती बनकर रह गया है?

मैं बिना तर्क के कोई बात नहीं करता. तो अंत में इस बात का भी सबूत पेश कर दूँ कि रख्शंदा जी के अनाम शुभचिंतक टिप्पणीकार अनुराग अन्वेषी जी ही हैं. जरा मेरे ब्लॉग पर अनुराग जी की इस टिप्पणी को देखें, और रख्शंदा जी के ब्लॉग पर इस अनाम टिप्पणी को. एक ही भाषा, एक ही संगीन आरोप और टिप्पणी पोस्ट करने का समय. ११:३४ AM IST वहां और ११:३५ AM IST यहाँ.

है कोई दिमाग से सोचने वाला?

अपडेट: १० सितम्बर २००८, १०:३० प्रातः

एक और काबिले गौर घटनाक्रम कल से घट रहा है. कोई जनाब बार-बार रक्षंदा के ब्लौग पर कमेंट्स में उन्हें ज्यादा जवाब न देने की नसीहत दे रहे हैं. ये कहकर कि आपसे कोई स्पष्टीकरण नहीं माँगा जा रहा है, बस चुप रहिये. ये बहुत समझदारी की सलाह है. क्योंकि जितना ज्यादा अपने बारे में सफाई दी जायेगी, शक की वजहें उतनी ही ज्यादा बढ़ती जायेंगी. अनजाने में कोई न कोई संदेहास्पद बात आपसे निकल जाने का डर बना रहता है.

कमाल की बात तो ये है कि इस संकट की घड़ी में एक (घोषित रूप में) महिला का साथ देने का पुनीत कर्तव्य निभाने वाले ये सज्जन अपनी ख़ुद की पहचान छुपाकर अनाम कमेन्ट कर रहे हैं. भाई हमारे जैसे दुष्टों का तो समझ में आता है, पर आपके जैसे शरीफ लोग भला क्यों अपने नाम से सामने आकर बात नहीं करते? क्या घोटाला है? इस पूरी कॉन्सपिरेसी में कहीं आप भी तो शामिल नहीं?

एक और मूर्खतापूर्ण तर्क से इन्होंने ब्लॉग जगत को बरगलाने की चेष्टा की है. जब रख्शंदा ने ख़ुद साफ़-साफ़ कहा है कि अमर उजाला के रविवार के परिशिष्ट में पढ़कर उन्होंने भड़ास के बारे में जाना, (रविवारीय परिशिष्ट ०२ मार्च २००८ का है) तो फ़िर पहले छपे किसी और लेख का हवाला क्यों दिया जा रहा है? लोगों को कनफ्यूस करने के लिए ही ना. और ये किस लेख की बात की रही है? यह कब छपा था? जरा विस्तार से बताइए. कोई लिंक विंक दीजिये. अगर भड़ास के बारे में अमर उजाला में इतने लेख छपते रहे तो जरूर भड़ास पर भी इसकी चर्चा जोर शोर से अवश्य हुई होगी. जरा उसका लिंक भड़ास के ही ब्लॉग से दे दीजिये जैसे मैंने दिया है.

और चलिए आपकी इस बात पर एक बार यकीन कर भी लिया जाए कि नवम्बर २००७ में कोई लेख छपा भी था तो जनाब नवम्बर तो अक्टूबर के बाद ही आता है ना. रख्शंदा की आईडी तो अक्टूबर २००७ की है. अगर अक्टूबर २००७ या उससे पहले के भड़ास के बारे में अमर उजाला के लेख की कोई लिंक हो तो बताइए. हम भी जानें क्या लिखा था उस लेख में जो रख्शंदा जी भड़ास की ओर आकर्षित हुईं. जानकारी लेकर आइये साहब. ब्लॉग जगत इन्तजार में है. और अपने नाम के साथ आयेंगे तो और भी बेहतर होगा.

अनुराग जी, पिछली पोस्ट पर आपकी टिप्पणी का शुक्रिया. सचमुच बड़ा मजेदार रहा आपका कमेन्ट पढ़ना. ये देखना भी अच्छा लगा कि चलिए किसी ने तो कोरी भावनाओं में ना बहकर दिमाग से काम लेने की कोशिश की. लेकिन अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि कुल मिलाकर आपके ब्लॉगिंग सम्बंधित तकनीकी ज्ञान ने बहुत प्रभावित नहीं किया.

आप लिखते हैं:
"रख्शंदाजी के प्रफाइल को मैं झांकने गया। वहां मेंशन कि यह ब्लॉग अक्टूबर 2007 में क्रिएट किया गया है। गौर करें कि क्रिएशन का यह समय है ब्लॉगर वहां फीड नहीं करता, बल्कि जब आप ब्लॉग क्रिएट करते हैं तो यह सूचना खुद-ब-खुद वहां आ जाती है। यह अलग बात है कि अक्टूबर में क्रिएट करने के बाद रख्शंदाजी की पहली पोस्ट 7 मार्च 2008 को आई। यह भी देखना रोचक होगा कि इनकी शुरुआती पोस्ट पर टिप्पणियां या तो नहीं है या उनकी संख्या बेहद कम हैं."
बड़ा समय और शक्ति खर्च किए आपने इस अन्वेषण में. लेकिन आपके इस समूचे वक्तव्य से आख़िर निष्कर्ष क्या निकलता है? ये आईडी अक्टूबर २००७ में बनाई गई पर रक्षंदा नाम से इसके इस्तेमाल की जरूरत मार्च २००८ में पडी. बस इतनी बात. इससे क्या साबित होता है? आप को तो पता ही होगा कि आईडी का नाम कभी भी बदला जा सकता है. यह पूरी तरह सम्भव है कि अक्टूबर २००७ मैं इस आईडी को किसी और नाम से बनाया गया हो और मार्च २००८ में इस नाम से बदल दिया गया हो. (मैं सिर्फ़ संभावनाओं की बात कर रहा हूँ, यह नहीं कह रहा कि ऐसा वास्तव में हुआ ही होगा) लेकिन आपका तर्क तो औंधे मुंह गिरता ही है.

अन्वेषी जी, अब जरा रक्षंदा आईडी से आए आज के इस कमेन्ट का भी (खुले दिमाग से) कुछ विश्लेषण कीजिये जिसमें रख्शंदा जी अपनी ब्लॉग यात्रा के प्रारम्भ और "भड़ास" से अपने जुड़ाव की जानकारी दे रही हैं.
".एक बार अख़बार में...हाँ, वो अमर उजाला का रविवार का पन्ना था जिस में मैंने ब्लॉग के बारे में पढ़ा, बस एक ब्लॉग देखा नाम था भड़ास...मैंने देखा इसके बहुत सारे सदस्य हैं,,,मेरी बहन ने कहा क्यों न तुम भी इसकी मेंबर बनकर ब्लोगेर बन जाओ, बस मजाक मजाक में उस ब्लॉग के यशवंत जी को मेल किया और दूसरे दिन ही मेंबर बन गई, अपना ब्लॉग तो बस यूंही बना लिया, जो बहन ने नाम सजेस्ट किया, रख दिया..."
ये घोषणा कर रही हैं कि ब्लॉग जगत की जानकारी इन्हें अमर उजाला के रविवार के अंक से मिली जिसमें भड़ास के बारे में छपा था. उसी से इन्हें अपना ब्लॉग बनाने की भी प्रेरणा मिली. इससे पहले ये ब्लॉग जगत से अनजान थीं. क्या आप जानते हैं कि अमर उजाला की संडे मेग्जिन (संडे आनंद) में ये भड़ास से सम्बंधित लेख कब छपा था? वो तारीख थी ०२ मार्च, २००८. भड़ास पर यशवंत जी की ये पोस्ट देखिये. अब आप जरा मुझे बताइए कि जिस शख्स को ०२ मार्च, २००८ तक ब्लॉग दुनिया की जानकारी ही नहीं थी वह अक्टूबर २००७ में अपना ब्लॉग कैसे बनाकर बैठा था? जरा इसका भी अन्वेषण कीजिये और हम सभी को बताइए.

इस तरह की ढेरों कांट्राडिकटरी बातें क्या इन्हें शक के घेरे में नहीं लातीं? ऐसे में अगर मैंने अपना शक जाहिर किया तो क्या ग़लत किया?

इसके आगे आप मेरे बारे में लिख रहे हैं:
"भूतजी का ब्लॉग '2008 में क्रिएट हुआ है। ध्यान रहे कि यह वही वक्त है जब मोहल्ला और भड़ास अपनी-अपनी पोल खोल रहे थे। यह अलग बात है कि भूतजी की पहली पोस्ट मजदूर दिवस के दिन आई। साथ ही 35 कमेंट भी मिले। यानी, एक स्ट्रैटजी के तहत यह जनाब दूसरों के ब्लॉग पर टिपियाते रहे और पहली पोस्ट में ही चर्चित भी हुए।"
अब आप क्या कहना चाह रहे हैं? क्या आप मुझे भी भड़ास या मोहल्ला से जोड़ कर देख रहे हैं? बड़ा सम्मान बख्शा आपने मुझे, मैं कृतार्थ हुआ. लेकिन अनुराग जी मैं आपको बता दूँ कि मैं मूल रूप से कम्युनिटी ब्लॉग के विचार के ही खिलाफ हूँ. गिरोह्बद्द होकर काम करना और प्रेशर ग्रुप क्रिएट करना सामजिक जीवन की बुराइयाँ हैं और इनसे ब्लॉग जगत को दूर ही रखा जाना चाहिए. आप देख सकते हैं कि अपने ब्लॉग पर भी मैंने किसी कम्युनिटी ब्लॉग का लिंक नहीं लगाया है, सिवाय "चोखेर बाली" के.

और जैसा कि आप देख ही आए हैं मेरी ये आईडी जनवरी २००८ की बनी है, यानी जब मुझे हिन्दी ब्लॉग्स की जानकारी मिली उससे दो महीने पहले की. पहले दिन से ही ये आईडी इसी नाम से है. आप चाहें तो मैं आपको इस आईडी से एक अंगरेजी ब्लॉग पर किए गए कुछ कमेंट्स का लिंक बता सकता हूँ जो जनवरी २००८ में किए गए थे. हिन्दी के ब्लॉग्स तो काफी बाद फरवरी अंत में जानकारी में आए.

आपके अनुसार मैंने एक स्ट्रेटेजी के तहत और लोगों के ब्लॉग्स पर कमेन्ट किए और अपनी पहली ही पोस्ट में उसका प्रतिफल ३५ कमेंट्स के रूप में पाया. मजेदार बात रही ये भी. अनुराग जी, इन पैंतीस में से आधे से ज्यादा लोग (कहिये तो नाम गिनाऊँ) ऐसे थे जिनके ब्लॉग पर मैंने अपनी पहली पोस्ट लिखने से पहले कभी कोई कमेन्ट किया ही नहीं था. बाकी में से अधिकतर के साथ तो इससे भी बुरा सुलूक किया था और बिना किसी लाग लपेट के अच्छी बुरी कैसी भी टिप्पणियां छोड़ता रहा था. अगर आप मेरी उस दौरान की टिप्पणियां देखें तो पायेंगे कि अधिकांश का स्वर आलोचनात्मक ही था ना कि लल्लो-चप्पो वाला, वाह जी क्या बात है टाइप. फ़िर भी लोगों ने मुझपर अपना स्नेह लुटाया तो वो मेरा सौभाग्य है. शायद ऐसा कमेंट्स की ईमानदारी की वजह से ही रहा होगा.

अब चलिए एक सेकंड को आपका आरोप सत्य मान भी लें कि मैंने ऐसा लोकप्रियता कमाने के लिए किया. (काश, मुझमें सचमुच इतनी बुद्धि होती) तो ये बताइए कि इस भारी कमाई को मैंने किस तरह भुनाया? जब मुझे लोग इतना प्यार दे रहे थे तो मुझे तो हवा में उड़ते हुए रोज एक पोस्ट पेल देनी चाहिए थी. आख़िर आपके ब्लॉग पर ट्रैफिक तो तभी आएगा जब आप नियमित लिखेंगे. १ मई से लेकर ३१ अगस्त तक चार महीनों में कुल नौ पोस्ट मैंने लिखीं. अब आप मुझे समझाइए कि कौन सी स्ट्रेटेजी लेकर मैंने जनवरी में ब्लॉग बनाया और जबकि सबकुछ सोचे समझे अंदाज में आगे बढ़ रहा था उसके बावजूद आठ महीने में केवल नौ पोस्ट लिखीं?

कुल मिलाकर आपकी बात (हास्यास्पद नहीं कहूँगा) हास्यप्रद लगी. मुझे पढ़कर बड़ा मजा आया. कभी आप भी दुबारा इसे पढ़कर देखिये, शायद आप ख़ुद भी मुस्कुरा उठेंगे.
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चलिए, काफी हुआ. अनुराग अन्वेषी जी का बहुत बहुत शुक्रिया जो उन्होंने मुझे ख़ुद अपने बारे में इतनी बकवास करने के लिए उकसाया. मुझे अंदाजा नहीं था कि अपनी हांकने में इतना भी मजा आ सकता है. सचमुच बड़ा आनंद आया.

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