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Thursday, October 9, 2008

शाबाशी दीजिये. आज मैंने तीन क़ानून तोडे.

पिछले पाँच दिन में दो बार रेलवे स्टेशन जाना हुआ और ट्रेनों की लेट लतीफी से दोनों ही बार दो घंटे से अधिक वहां खर्च हुए. स्मोकिंग बैन लागू होने के बाद किसी बड़े सार्वजनिक स्थल पर जाने का पहला मौका था तो मैंने ध्यान से परिसर का मुआयना किया और यह देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि एक भी व्यक्ति सिगरेट के कश लगाता हुआ नहीं दिखा. तो क्या बैन वाकई में प्रभावशाली साबित हो रहा है?

वैसे भारत कोई पहला देश नहीं है जहाँ इस प्रकार का स्मोकिंग बैन अमल में लाया जा रहा हो. फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी समेत यूरोप के कई देशों में सार्वजनिक धूम्रपान पर प्रतिबन्ध है. कुछ इसी प्रकार की रोक संयुक्त राज्य अमेरिका के कुछ राज्यों और दक्षिण अफ्रीका में भी है. आयरलैंड और फ्रांस में तो स्मोकिंग बैन बहुत सफल रहा है. अध्ययन बताते हैं कि जहाँ कहीं भी इस प्रकार की धूम्रपान निषेधक युक्तियाँ लागू की गयी हैं, वहां ह्रदय औरफेफडों से सम्बंधित रोगियों की संख्या में भारी कमी दर्ज की गयी है.

लेकिन हमारे यहाँ इस बैन से परेशान सुट्टा प्रेमी एक ही रट लगाये हैं कि हमारे देश में ऐसे किसी प्रतिबन्ध को ईमानदारी से लागू कर पाना कठिन काम है. तर्क स्वरूप दहेज़ विरोधी कानूनों का हवाला दिया जा रहा है. कहा जा रहा है कि प्रोस्टिट्यूशन और चाइल्ड अब्यूस के खिलाफ क़ानून ने क्या उखाड़ लिया. क्या ये सब बुराइयाँ दूर हो सकीं? कुल मिलाकर भाव ये कि ये नया एंटी स्मोकिंग बैन भी कोई असर नहीं करेगा.

मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ. मेरी समझ में अन्य कानूनों (और उनकी निष्प्रभाविता) की तुलना इस बैन से नहीं की जा सकती. जिन अन्य सामजिक बुराइयों का जिक्र किया जा रहा है वे अत्यन्त गंभीर मसले हैं और दोषी पाए जाने पर उनमें दो से दस वर्ष तक की सजा का प्रावधान है. जाहिर है इन मामलों में ऍफ़ आई आर दर्ज होने से लेकर अन्तिम फ़ैसला आने तक की सम्पूर्ण न्याय प्रक्रिया काफी लम्बी, जटिल और धीमी होती है और ऐसे मौके मिलते हैं जहाँ क़ानून की आँख बचाकर निकल जाने की गुंजाईश बनती हो. दूसरी ओर यह बैन केवल एक चेतावनी स्वरूप जुर्माने का प्रावधान रखता है. अगर कोई निषिद्ध स्थान पर धुआं उड़ाता हुआ धरा गया तो उसे तुंरत अपनी जेब ढीली करनी होगी. इस तरह के उपाय ज्यादा प्रभावकारी हो सकते हैं.

इंग्लेंड के प्रसिद्ध समाचार पत्र 'द इंडीपेंडेंट' ने भारत में स्मोकिंग बैन के सन्दर्भ में अपनी स्टोरी के लिए दक्षिण दिल्ली में कई नौजवानों और नवयुवतियों से बात की. २४ वर्षीय मैनेजमेंट ट्रेनी रुक्मिणी वैश का कहना था कि इस बैन से उनके स्मोक कंसम्पशन पर जरूर असर पडेगा. अभी दिन में आठ सिगरेट सुलगाने वाली रुक्मिणी को आशा है कि यह बैन धूम्रपान के दुष्प्रभावों के संदेश को आम जनता तक ज्यादा बेहतर तरीके से पहुँचाने में सफल होगा. उनकी बहन देवयानी भी इस बैन को एक सही कदम मानती हैं और उम्मीद जताती हैं कि यह उन्हें अपनी स्मोकिंग की आदत, जो अभी दिन में सात-आठ सिगरेट तक सीमित है, को धीरे-धीरे पूरी तरह त्यागने में मददगार साबित होगा.

उत्साह की बात यही है कि इस बैन को आम तौर पर जनता का बहुत जोरदार समर्थन मिला है. समाचार पत्रों में और वेब पर अनेक लेख इसके पक्ष में लिखे जा चुके हैं और अभी भी लगातार सामने आते जा रहे हैं. एस वाय कुरैशी इंडियनएक्सप्रेस में लिखते हैं:

"ये देखते हुए कि रोजाना ५५०० नए भारतीय युवा इस जहरीले शौक को गले लगा रहे हैं, स्वास्थ्य मंत्रालय का यह कदम निश्चित रूप से स्वागत योग्य है. अक्सर इस प्रकार के कदमों का विरोध करने वाले इसे 'मोरल पोलिसिंग' या 'वेल्यु जजमेंट' कहकर लताड़ते हैं. लेकिन देखा जाए तो यह एक बेतुका और बेहूदा तर्क है. यदि इस प्रकार से सोचा जाए तो फ़िर शायद चोर या स्मगलर भी अपने कर्मों को अपना व्यवसाय बताकर उसके खिलाफ उठने वाली आवाज को 'वेल्यु जजमेंट' कहकर खारिज करने के हकदार होने चाहिए. "यह मेरा काम है, किसी को क्या मतलब?" इस किस्म का तर्क दरअसल भ्रामक है. ऐसे तो कहा जा सकता है कि "आत्महत्या भी मेरा काम है, मेरा जीवन, किसी को क्या?" लेकिन आत्महत्या एक आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आता है और उसे उकसावा देना भी. असल में तो तम्बाकू उत्पादों के निर्माताओं और प्रचारकों को प्रति वर्ष लगभग दस लाख भारतीयों की मौत का जिम्मेदार माना जाना चाहिए. मुझे तो आश्चर्य है कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस कानूनी दृष्टिकोण पर विचार क्यों नहीं किया."

दूसरी ओर बैन के विरोध में उठने वाले कुछ स्वर तर्क से परे जाकर तमाम तरह की थोथी दलीलें पेश कर रहे हैं. इस तरह की बात करने वाले लती सुट्टेबाज अपनी जहर फैलाने की आजादी को (नाहक ही) खतरे में पड़ा जानकर किस तरह के मूर्खतापूर्ण तर्क दे रहे हैं उसका उदहारण देखने के लिए कहीं बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं. कुछ मिसाल यहीं ब्लॉग जगत में मौजूद हैं. इनका साफ़ मानना है कि भारतवर्ष में इस प्रकार के प्रतिबन्ध को लागू करना असंभव है क्योंकि हमारे यहाँ भ्रष्टाचार का बोलबाला है और रिश्वत के बूते पर धुँए के छल्ले ऐसे ही उड़ते रहेंगे.

प्रशांत प्रियदर्शी अपने अनुभव बताते हैं कि ट्रेन में सिगरेट पीते हुए इन्हें टी टी ने पकड़ लिया लेकिन एक सिगरेट की रिश्वत लेकर बिना जुर्माने के छोड़ दिया. डॉ अनुराग आर्य को रेलवे स्टेशन पर सिगरेट की तलब उठ आयी. पुलिस वाले को एक सिगरेट थमाकर ये भी क़ानून तोड़ने में सक्षम हो गए. वाह, कितनी महान बात हुई. क्या ऊंचा दर्जा हासिल किया. लेकिन इन दोनों प्रकरणों में असल में बड़ा दोषी कौन दिखता है? ट्रेन का टी टी बाबू या अपने बिहारी बाबू, द आईटी प्रोफेशनल, जो न सिर्फ़ जानते बूझते चलती ट्रेन में सिगरेट जलाकर कानून तोड़ रहे हैं बल्कि सीना ठोंक कर अपने ब्लॉग पर लिख भी रहे हैं कि कैसे रिश्वत के दम पर बच निकले. गजब का साहस है भाई. साहस ही है ना? रेलवे स्टेशन पर डंडा बजाता गरीब पुलिस वाला बड़ा कसूरवार है या उसे रिश्वत दिखाकर प्रतिबंधित जगह पर बेशर्मी से सिगरेट फूंकते आदरणीय डरमेटोलॉजिस्ट महोदय?

बात किसी व्यक्ति विशेष को पिन पौइंट करने की नहीं है. देखें तो उपरोक्त दोनों उदाहरण उच्च शिक्षित वर्ग से हैं. ये वो समुदाय है जो देश को प्रगति के नए पथ पर ले जाने के लिए जिम्मेदार है. जिसके दम पर हम एक विकसित राष्ट्र बनने का सपना संजोये बैठे हैं. इस वर्ग से आप स्वतः ही आशा कर सकते हैं कि ये लोग न सिर्फ़ क़ानून की उचित जानकारी रखते होंगे बल्कि उसके प्रति सम्मान का भाव भी. लेकिन ठसक के साथ क़ानून को ठेंगा दिखाने का भाव और उससे जुडी सङी हुई झूठी अहंकार भावना भी तो हम भारतीयों की पहचान है. और फ़िर हायपोक्रिसी तो अधिकांश भारतीयों का मध्य नाम है ही. अत्यन्त दुखद और निराशाजनक स्थिति है. कैसे बदलेगी?

Saturday, September 27, 2008

मैं जिंदगी से आँख चुराता चला गया, बस मौत को गले से लगाता चला गया.

कॉलेज का द्वितीय या शायद तृतीय वर्ष था. चार - पाँच मित्र एम् ई वान् वल्केन्बर्ग की नेटवर्क एनालसिस बुक की किसी समस्या में उलझे हुए थे. शर्त थी कि कौन पहले सही हल ढूंढ निकालता है. प्रश्न कुछ ज्यादा ही कठिन रहा होगा, इसलिए ब्रेन स्टोर्मिंग सेशन कुछ लंबा खिंचता जा रहा था. अचानक महफिल में कहीं से एक सिगरेट नमूदार हुई और दो - तीन मित्रों के बीच घूमने लगी. मेरे जैसे नॉन स्मोकर्स के लिए इस धुएँ को इतने नजदीक से बर्दाश्त कर पाना कठिन होता है. तो मैंने इशारे में ही सामान्य विरोध दर्ज किया.

ठीक सामने बैठे मित्र ने एक गहरा कश लेते हुए मुझे कुछ देर घूरा, फ़िर चालू हुए, "देख मेरे भाई! जितना जल्दी हो सके इस आदत को अपना ले, वरना बड़ा नुक्सान उठाएग तू."

दूसरे मित्र ने विद्वत्तापूर्वक संशोधन किया, "और अगर इसका आनंद लेना न भी सीखे तो कम से कम औरों को झेलना तो सीख ही ले."

इन लती लोगों से बहस का कोई मूड नहीं था. तो मैंने सर को जल्दी जल्दी हिला कर बात वहीं समाप्त करने की चेष्टा की. "ठीक है यार, कोशिश करता हूँ. मगर अभी समय लगेगा. तब तक के लिए उस दूसरी बेंच पर बैठने जा रहा हूँ."

सिगरेट के महत्त्व से दूसरा परिचय तब हुआ जब पहला पहला जॉब ज्वाइन किया. मेरे डिपार्टमेंट में शायद ही कोई ऐसा सीनियर हो जो ये शौक ना रखता हो. एक दिन उनमें से एक, जो मुझ पर कुछ विशेष स्नेह रखते थे, ने एक दिन प्रेमपूर्वक समझाया, "भाई तुम अगर स्मोक नहीं करते तो कोई बात नहीं. लेकिन जेब में एक पेकेट जरूर रखा करो. जब मौका मिले, पेश कर दो. सबके साथ मिक्सप होने में बड़ी मदद मिलेगी."

कमाल की बात है. इंसान जिस काम को ख़ुद भला नहीं मानता, उसमें दूसरों को शरीक करने का कितना ख्वाहिशमंद रहता है. खैर मुझे ये हुनर ना आना था, ना आया. ये बात अलग है कि मैंने साथियों से परिचय बढ़ाने के दूसरे बेहतर तरीके तलाश लिए.

खैर, वो तो पुरानी बातें हुईं. स्मोकिंग को लेकर सुकून भरी ताजा ख़बर ये है कि सरकार आने वाले २ अक्टूबर से सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषेध का सख्ती से पालन करवाने को लेकर कमर कस रही है. हालांकि इस बारे में नियम तो कोई ढाई-तीन साल पहले ही बनाया जा चुका था, पर कई लूपहोल्स की वजह से कभी ठीक से लागू नहीं किया जा सका. इस बार संशोधित रूप में इसे ज्यादा प्रभावशाली रूप से लागू किए जाने की योजना है.

नए नियमों के तहत शॉपिंग मॉल्स, सिनेमा हॉल्स, सभी पब्लिक और प्राइवेट कार्यस्थल, होटल्स, डिस्कोथेक्स, केंटीन, कॉफी हाउस, पब्स, बार्स, एरपोर्ट लौंज एवम् रेलवे स्टेशनों पर भी स्मोकिंग पर पाबंदी रहेगी. स्मोकर्स अगर चाहें तो सड़क पर अपनी तलब मिटा सकते हैं, या फ़िर अपने घरों में, लेकिन अन्य सार्वजनिक स्थलों पर नहीं. सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान करते पकड़े जाने पर २०० रुपए के जुर्माने का प्रावधान है जिसे आगे १००० रुपए तक बढाया जा सकता है.

पुराने नियम में निजी कार्यस्थलों पर विशेष स्मोकिंग जोन्स की अनुमति थी जहाँ स्मोकर्स देव आनंद साहब की स्टाइल में जिंदगी का साथ निभाने के भ्रम में जिंदगी को धुएँ में उडाने के लिए स्वतंत्र थे. लेकिन इस छूट का ग़लत इस्तेमाल होते देखकर अब सभी निजी कार्यस्थलों पर स्मोकिंग पर रोक लगा दी गयी है. जो कम्पनियां कर्मचरियों को स्मोकिंग की अनुमति देंगी, उनपर प्रति स्मोकर ५००० रुपए का जुर्माना होगा.

जाहिर है सिगरेट कम्पनियों को इसपर आपत्ति होनी है. ITC (इंडियन टोबेको कम्पनी) ने इसके खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायलय में याचिका दायर की है. इसके अलावा इंडियन होटल असोसियेशन ने भी अदालत का दरवाजा खटखटाया है. लेकिन खुशी की बात है कि इस बार सरकार बैन को लेकर ज्यादा गंभीर नजर आ रही है और इस तरह की तमाम अड़ंगेबाजी की संभावनाओं को भाँपते हुए उसने सुप्रीम कोर्ट में एक अपील दायर कर बैन को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं की सुनवाई केवल उच्चतम न्यायलय में ही करने की अपील की है.

दूसरी तरफ़ आम जनता की और से सरकार के इस कदम का जबरदस्त स्वागत हुआ है. मुंबई, दिल्ली, चेन्नई और कोलकाता में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार ९२% लोगों ने धूम्रपान निषेध के लिए कड़े क़दमों का स्वागत किया है

फ़िर भी इस बात को लेकर एक बड़ी बहस छिडी हुई है. बैन के पक्षधर और विरोधी तमाम तरह के तर्क दे देकर मैसेज बॉक्स और फोरम्स के पन्नों पर पन्ने रंगे जा रहे हैं. अपन तो बस इस बैन को जल्द से जल्द और सख्ती से लागू किए जाते देखना चाहते हैं. एक कम्युनिटी के रूप में स्मोकर्स के लिए अपने मन में जरा भी इज्जत नहीं. क्योंकि,

१. ये जानते हैं कि धूम्रपान इनके स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है. मगर इन्हें परवाह नहीं.
२. इन्हें पता है कि ये इनके घर के अन्य सदस्यों, जो स्मोक नहीं भी करते, के लिए भी बुरा है, मगर ये आदत से मजबूर हैं.
३. स्मोकिंग से होने वाली विषैली गैसों का उत्पादन पूरे विश्व के पर्यावरण के लिए नुक्सान ही पहुँचाने वाला है, होता रहे इनकी बला से.
४. सार्वजनिक स्थानों पर किसी स्मोकर को धुंआ उडाते देखने का दृश्य अभद्रता का खुला प्रदर्शन लगता है.

यहाँ ये जिक्र करना भी सही होगा कि दुनिया के तमाम देशों में पब्लिक स्मोकिंग पर पूर्ण या आंशिक निषेध है. फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका के कई राज्य, बेल्जियम के अलावा पिछले वर्ष ब्रिटेन में भी संसद द्वारा क़ानून बनाकर इसकी मनाई कर दी गयी है. वहां भी इस नियम के लागू किए जाने को लेकर तमाम तरह की हाय तौबा मचाई गयी थी, संदेह जाहिर किए गए थे, लेकिन स्मोकिंग पर ये बैन न सिर्फ़ लागू हुआ बल्कि बड़ा इफेक्टिव भी साबित हुआ है.

और अंत में बाची करकरिया का ये कथन मुझे बड़ा सही लगता है, "स्मोकिंग मार्क्सवाद की तरह है. युवावस्था में आपको इसका अनुभव करना चाहिए. लेकिन आप महामूर्ख होंगे अगर समय रहते इससे बाहर नहीं निकल आते."

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